पटना। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने बिहार विधानसभा चुनाव के लिए सीट शेयरिंग का औपचारिक ऐलान कर दिया है। इसके तहत जदयू और भाजपा 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी, जबकि छोटे सहयोगी दलों को शेष सीटें दी गई हैं। सीट बंटवारे में जातिगत वोट बैंक और दलों के ऐतिहासिक प्रदर्शन को आधार बनाया गया है।
चिराग पासवान बने बड़े विजेता
केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को इस बार 29 विधानसभा सीटें मिली हैं। उनका राजनीतिक लाभ मुख्यतः पासवान जाति के वोट बैंक और लोकसभा व विधानसभा चुनावों में हासिल किए गए वोट प्रतिशत से जुड़ा है।
- बिहार में पासवान जाति की आबादी 5.31 प्रतिशत, लगभग 69 लाख 45 हजार है।
- लोकसभा चुनाव 2024 में LJP को 6.47% वोट, 2020 विधानसभा चुनाव में 5.66% वोट मिला था।
- 2015 और 2010 में पार्टी के वोट प्रतिशत क्रमशः 4.8% और 6.74% थे।
- जातिगत आधार और पांच सांसद होने की वजह से चिराग पासवान ने गठबंधन में भारी दबदबा बनाया और 29 सीट हासिल की।
विशेष रूप से यह भी ध्यान देने योग्य है कि 2020 में LJP ने 134 सीटों पर चुनाव लड़ा और केवल एक विधायक जीत पाया, बाद में चिराग को जदयू में शामिल कर राज्यसभा भेजा गया।
हम पार्टी को नुकसान
हम पार्टी (HAM) के प्रमुख जीतन राम मांझी मुसहर जाति से आते हैं, जिनकी बिहार में आबादी 3.08 प्रतिशत यानी लगभग 40 लाख 35 हजार है।
- 2024 लोकसभा चुनाव में HAM को 0.08% वोट,
- 2020 विधानसभा चुनाव में 0.9% वोट मिला।
- वर्तमान में पार्टी के पास 4 विधायक, एक सांसद, एक केंद्रीय मंत्री और एक विधान परिषद की सीट है।
- इस बार एनडीए ने HAM को 6 सीटें दीं, जबकि 2020 में पार्टी ने 7 सीटों पर चुनाव लड़ा था।
इस तरह, मांझी की हैसियत और सीटों की संख्या घट गई है।
उपेंद्र कुशवाहा की स्थिति
राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा को भी एनडीए ने महत्व दिया।
- कुशवाहा जाति की आबादी 4.201 प्रतिशत, लगभग 55 लाख।
- पार्टी को 2020 में 1.77% वोट मिले थे, जबकि 104 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे।
- पिछली हार और राज्यसभा सदस्यता के बावजूद, गठबंधन ने कुशवाहा को सीटें देकर जातिगत वोट बैंक की रक्षा की।
जदयू और भाजपा की हिस्सेदारी में कमी
2020 के मुकाबले इस बार:
- जदयू: 115 → 101 सीटें (14 सीटों की कमी)
- भाजपा: 110 → 101 सीटें (9 सीटों की कमी)
सीटों की कमी बड़े दलों के लिए छोटे सहयोगी दलों और जातिगत समीकरणों के दबाव का परिणाम मानी जा रही है।
विश्लेषण
वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडे का कहना है कि इस बार सीट शेयरिंग फार्मूले की बजाय जातिगत वोट बैंक और गठबंधन में छोटे दलों के दबाव पर आधारित रही।
- चिराग पासवान को फायदा हुआ,
- मांझी की स्थिति कमजोर हुई,
- जदयू और भाजपा ने समझौते के तहत अपनी सीटों में कटौती की।
अर्थात, सीट बंटवारे से एनडीए का सामरिक संतुलन तो बना है, लेकिन बड़े दलों को सहयोगियों के दबाव में कुछ समझौते करने पड़े हैं।
एनडीए की सीट शेयरिंग ने बिहार विधानसभा चुनाव के समीकरणों को नए सिरे से तय किया है। छोटे दलों और जातिगत समीकरणों के महत्व ने बड़े दलों को अपनी हिस्सेदारी कम करने पर मजबूर किया। चिराग पासवान गठबंधन के बड़े जीतने वाले हैं, जबकि मांझी और अन्य बड़े दलों के लिए चुनौती बढ़ गई है।


