
पटना | 28 जुलाई 2025: बिहार की राजधानी पटना में पुलिसिया अत्याचार का एक चौंकाने वाला मामला प्रकाश में आया है, जिसमें धनरूआ थाना के तत्कालीन थानाध्यक्ष दीनानाथ सिंह, दो अन्य पुलिस अधिकारियों और लगभग 15 सिपाहियों के खिलाफ कोर्ट के आदेश पर प्राथमिकी दर्ज की गई है। यह कार्रवाई तीन साल बाद न्यायालय के हस्तक्षेप से संभव हो सकी।
क्या है पूरा मामला?
पीड़ित मयंक चौधरी, निवासी बिरंचीपर (धनरूआ), ने आरोप लगाया कि 24 अगस्त 2022 की रात को करीब 10 बजे, तत्कालीन थानाध्यक्ष दीनानाथ सिंह, अवर निरीक्षक विकास कुमार, सहायक अवर निरीक्षक विजय कुमार एवं अन्य पुलिसबल उनके घर पहुंचे और जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करते हुए उनके पिता समेत परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मारपीट की।
पिता की पिटाई, रुपये की लूट और धमकी
मयंक चौधरी ने आरोप लगाया कि पुलिसवालों ने रायफल के बट से उनके पिता की पिटाई की, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए। इसी दौरान घर में रखे 60 हजार रुपये भी जबरन ले लिए गए। घायलावस्था में उनके पिता को अनुमंडल अस्पताल ले जाया गया, फिर स्थिति बिगड़ने पर पीएमसीएच में भर्ती कराया गया।
शिकायतों के बावजूद तीन साल तक कार्रवाई नहीं
मयंक का कहना है कि घटना के बाद उन्होंने अनुसूचित जाति थाना, पटना आईजी, एसएसपी, डीजीपी, और कमजोर वर्ग के पुलिस महानिदेशक तक लगातार आवेदन दिए, लेकिन कहीं से न्याय नहीं मिला। डीएसपी के हस्तक्षेप पर उनके पिता को छोड़ा गया, लेकिन थाने में जबरन लिखवाया गया कि सिर खुद की गलती से फूटा है।
कोर्ट की शरण में जाने पर मिला न्यायिक आदेश
थक-हारकर मयंक चौधरी ने मसौढ़ी व्यवहार न्यायालय में परिवाद पत्र दाखिल किया। न्यायालय ने साक्ष्यों के आधार पर संज्ञान लेते हुए संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ SC-ST अत्याचार निवारण अधिनियम, आर्म्स एक्ट, लूट, मारपीट आदि धाराओं में प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया।
FIR दर्ज, जांच की प्रक्रिया शुरू
धनरूआ के वर्तमान थानाध्यक्ष शुभेन्द्र कुमार ने पुष्टि की कि न्यायालय के आदेश के आलोक में प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है। उन्होंने कहा,
“वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशन में मामले की आगे की जांच की जाएगी।”
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
यह मामला बिहार पुलिस व्यवस्था की जवाबदेही, जातीय न्याय, और न्यायालयीय हस्तक्षेप की भूमिका को उजागर करता है। तीन वर्षों तक न्याय के लिए संघर्ष करने के बाद मयंक चौधरी को जो राहत मिली है, वह आम नागरिकों की न्याय व्यवस्था में आस्था को पुनर्स्थापित करती है।


