भाषा विवाद पर बोले महाराष्ट्र से आए श्रद्धालु — “यह राजनीतिक स्टंट है, हम सब मिल-जुलकर रहते हैं”

भागलपुर। श्रावणी मास में सुल्तानगंज से देवघर तक की पवित्र कांवर यात्रा में जहां आस्था की गूंज सुनाई दे रही है, वहीं इस बार भाषा विवाद की राजनीतिक गूंज भी चर्चा में है। लेकिन इस मुद्दे पर महाराष्ट्र से आए श्रद्धालुओं ने स्पष्ट और संतुलित जवाब देकर मिसाल पेश की है।

“हम सब साथ हैं, भाषा की कोई दीवार नहीं”

सुल्तानगंज के अजगैबीनाथ गंगा घाट पर रुके महाराष्ट्र से आए कांवड़ियों ने मीडिया से बातचीत में कहा कि महाराष्ट्र में हिंदी भाषी लोगों के साथ कोई भेदभाव नहीं है और जो कुछ भी दिखाया जा रहा है, वह महज राजनीतिक नाटक है।

“महाराष्ट्र में मराठी और हिंदी भाषी एक साथ रहते हैं, काम करते हैं और त्योहार मनाते हैं। जो लोग चुनाव जीतने के लिए भाषा को मुद्दा बना रहे हैं, वे जनता को गुमराह कर रहे हैं।” — श्रद्धालु, महाराष्ट्र से

कांवड़ियों ने राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे जैसे नेताओं पर इशारों-इशारों में आरोप लगाते हुए कहा कि भाषा का विवाद आगामी महानगरपालिका चुनाव के लिए गढ़ी गई स्क्रिप्ट है, जबकि धरातल पर ऐसा कोई तनाव नहीं है।

बोल बम की राह में एकता की मिसाल

यात्रा के दौरान देखा गया कि बिहार, झारखंड, यूपी और महाराष्ट्र के श्रद्धालु एक साथ “बोल बम” के जयघोष करते हुए पदयात्रा कर रहे थे। एक मराठी श्रद्धालु ने कहा, “हम सब एक साथ चल रहे हैं — यही है असली भारत।”

“हिंदी एकता का सूत्रधार” — डॉ. मृणाल शेखर

बिहार से महाराष्ट्र की स्वास्थ्य सेवा टीम में कार्यरत डॉ. मृणाल शेखर ने कहा कि भाषा का विवाद पूरी तरह राजनीतिक हथकंडा है।

“हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है और यह पूरे देश को जोड़ने का काम करती है। मराठी हो या भोजपुरी, सभी भाषाएं हमारी सांस्कृतिक संपत्ति हैं, परंतु हिंदी वह सूत्र है जो हम सबको एकता के धागे में पिरोती है।” — डॉ. मृणाल शेखर

उन्होंने नेताओं से अपील की कि लोगों को जोड़ने की राजनीति करें, न कि समाज में विभाजन पैदा करें।

भक्ति की राह में कोई भाषा बाधा नहीं

श्रावणी मेले में यह दृश्य आम रहा कि मराठी, भोजपुरी, हिंदी और बंगाली भाषी श्रद्धालु एक साथ कांवर लेकर निकल रहे हैं। बोल बम के नारों के बीच भाषा की दीवारें टूटती दिखीं और आस्था की एकता का संदेश हर दिशा में गूंजता रहा।


कांवर यात्रा न सिर्फ धार्मिक एकता, बल्कि राष्ट्रीय एकजुटता का प्रतीक बनकर उभरी है। राजनीति चाहे भाषा को हथियार बनाए, लेकिन आमजन ने यह दिखा दिया कि भारत को बांटने की नहीं, जोड़ने की ज़रूरत है।


 

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