बिहार में सांस्कृतिक पुनर्जागरण की पहल, ‘गुरु-शिष्य परंपरा योजना’ से कला को मिलेगा नया जीवन

पटना, 19 जुलाई।बिहार सरकार ने राज्य की लोककला, शास्त्रीय परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में कला, संस्कृति एवं युवा विभाग द्वारा शुरू की गई मुख्यमंत्री गुरु-शिष्य परंपरा योजना के माध्यम से अब विलुप्तप्राय कलाओं को संरक्षित करने और नई पीढ़ी को उनसे जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

राज्य की सांस्कृतिक आत्मा को फिर से जीवंत करने की कोशिश

बिहार की लोकगाथाएं, लोकनाट्य, लोकनृत्य, पारंपरिक चित्रकला, लोकसंगीत और दुर्लभ वाद्ययंत्र जैसे क्षेत्रों में इस योजना के तहत गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से दो वर्षों का प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। इसके लिए वित्तीय वर्ष 2025-26 में 1.11 करोड़ रुपये की प्रशासनिक स्वीकृति दी गई है।

गुरु-शिष्य परंपरा के तहत मिलेगा प्रशिक्षण

इस योजना के तहत 20 अनुभवी गुरु, 20 संगतकार, और 160 युवा शिष्य चुने जाएंगे।
प्रशिक्षण अवधि में:

  • प्रत्येक गुरु को 15,000 रुपये प्रति माह
  • संगतकार को 7,500 रुपये प्रति माह
  • शिष्यों को 3,000 रुपये प्रति माह की छात्रवृत्ति प्रदान की जाएगी।
    यह प्रोत्साहन राशि सीधे बैंक खातों में भेजी जाएगी। शिष्यों को हर महीने कम-से-कम 12 दिन प्रशिक्षण में उपस्थित रहना अनिवार्य होगा।

दीक्षांत समारोह में कलाकारों को मिलेगा मंच और सम्मान

प्रशिक्षण के समापन पर एक भव्य दीक्षांत समारोह आयोजित किया जाएगा, जिसमें शिष्य अपने गुरुओं से अर्जित कला का सार्वजनिक प्रदर्शन करेंगे और उन्हें सम्मानित किया जाएगा। यह समारोह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान का उत्सव होगा।

ग्रामीण और कस्बाई प्रतिभाओं को मिलेगा मंच

इस योजना के माध्यम से सरकार की कोशिश है कि ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में छिपी कलात्मक प्रतिभाओं को सामने लाया जाए और उन्हें संरक्षण, मंच और सम्मान दिया जाए। इससे वरिष्ठ कलाकारों को आर्थिक संबल मिलेगा और कलाओं की पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण सुनिश्चित किया जा सकेगा।

मूल उद्देश्य: कला का संरक्षण, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक सशक्तिकरण

राज्य सरकार का मानना है कि यह योजना केवल एक वित्तीय प्रोत्साहन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक समावेश की दिशा में एक सशक्त कदम है। यह बिहार को उसकी मूल सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने और युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने में सहायक बनेगी।


 

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