
भागलपुर (बिहार), 15 जुलाई — बिहार के भागलपुर जिले के सबौर प्रखंड स्थित मसाढूं गांव से एक ऐसी सामाजिक सच्चाई सामने आई है जो न केवल प्रशासनिक संवेदनहीनता पर सवाल खड़े करती है, बल्कि ग्रामीण भारत की जटिल समस्याओं को भी उजागर करती है। गंगा नदी के कटाव और 2024 की विनाशकारी बाढ़ ने इस गांव को इस कदर प्रभावित किया है कि अब यह “कुंवारों की बस्ती” कहलाने लगा है।
कटाव और विस्थापन ने छीना विवाह का भरोसा
गांव के निवासी विशुनदेव मंडल बताते हैं कि बाढ़ ने न केवल घर-बार उजाड़ा, बल्कि बेटे-बेटियों के तय रिश्ते भी टूट गए। नए रिश्ते आने पूरी तरह से बंद हो चुके हैं। उन्होंने कहा, “जब हमारे पास खुद रहने का ठिकाना नहीं है, तो कौन बेटी देगा? समधी कहां से आएंगे?”
गांव के कई युवाओं की उम्र शादी के लिए पार हो चुकी है, लेकिन रिश्ते नहीं बन पा रहे। ग्रामीणों के अनुसार, दहेज देने लायक ज़मीन या संपत्ति नहीं बची, जिससे लड़कियों के लिए रिश्ते मिलना और कठिन हो गया है। यह सिर्फ एक आर्थिक या भौगोलिक संकट नहीं, बल्कि सामाजिक असुरक्षा और उपेक्षा की त्रासदी है।
सामाजिक आपातकाल जैसे हालात
ममलखा पंचायत के मुखिया अभिषेक मंडल ने भी हालात पर चिंता जताते हुए कहा, “यह केवल बाढ़ या पुनर्वास की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक आपातकाल जैसी स्थिति है। अगर सरकार ने अब भी पुनर्वास और विशेष सहायता योजना नहीं चलाई, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहराएगा।”
उनका कहना है कि गंगा के किनारे बसे मसाढूं जैसे सैकड़ों गांव ऐसे ही हालात से जूझ रहे हैं जहां प्राकृतिक आपदा अब सामाजिक विघटन का रूप ले चुकी है।
सिर्फ प्रकृति नहीं, नीतियों की असफलता भी जिम्मेदार
मसाढूं गांव का संकट केवल प्राकृतिक मार की कहानी नहीं है, बल्कि यह पुनर्वास योजनाओं की विफलता और प्रशासनिक लापरवाही का भी परिणाम है। जब घर छिनते हैं, तो सिर्फ दीवारें नहीं गिरतीं, पूरा सामाजिक ताना-बाना बिखर जाता है — और जब रिश्तों का भरोसा भी टूट जाए, तो यह सिर्फ आपदा नहीं, सामाजिक संहार बन जाता है।


