
मुंबई। पत्नी पर विवाहेत्तर संबंध का संदेह मात्र नाबालिग बच्चे की डीएनए जांच का कानूनी आधार नहीं हो सकता। बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है। अदालत ने परिवार न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पति की मांग पर 12 वर्षीय बेटे की डीएनए जांच का निर्देश दिया गया था।
न्यायमूर्ति आरएम जोशी ने अपने 1 जुलाई के आदेश में कहा,
“सिर्फ इसलिए कि कोई पुरुष अपनी पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाकर तलाक मांग रहा है, यह परिस्थिति इतनी असाधारण नहीं है कि बच्चे की आनुवांशिक जांच (डीएनए टेस्ट) का आदेश दिया जाए।”
आदेश की प्रति बुधवार को मिली
यह आदेश उस याचिका पर पारित किया गया है, जिसे याचिकाकर्ता की अलग रह रही पत्नी और उनके नाबालिग पुत्र ने दायर किया था। हाईकोर्ट की यह टिप्पणी पारिवारिक विवादों में बच्चों की निजता और अधिकारों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मिसाल मानी जा रही है।
डीएनए जांच असाधारण परिस्थितियों में ही
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि डीएनए जांच जैसे संवेदनशील मामलों में केवल अत्यंत आवश्यक और असाधारण परिस्थितियों में ही अनुमति दी जानी चाहिए। ऐसा न हो तो इससे बच्चे की मानसिक स्थिति, निजता और सामाजिक पहचान पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।


