
पटना। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर राजधानी पटना स्थित बापू टावर में एक ऐसा कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसने पर्यावरण संरक्षण, सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक सहभागिता के महत्व को एक साथ प्रस्तुत किया। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के क्षेत्रीय कार्यालय, पटना द्वारा आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में वृत्तचित्र प्रदर्शन, पर्यावरण विषयक व्याख्यान श्रृंखला और अर्ध-शास्त्रीय संगीत प्रस्तुति के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के संदेश को प्रभावी ढंग से लोगों तक पहुंचाया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शिक्षाविदों, पर्यावरणविदों, विद्यार्थियों, संस्कृति प्रेमियों और आम नागरिकों ने भाग लेकर पर्यावरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की।
विश्व पर्यावरण दिवस हर वर्ष पर्यावरणीय चुनौतियों और उनके समाधान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से मनाया जाता है। इसी क्रम में आयोजित इस कार्यक्रम ने पर्यावरणीय मुद्दों को केवल चर्चा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि कला, संस्कृति और समाज के विभिन्न आयामों को जोड़ते हुए लोगों को प्रकृति संरक्षण के लिए प्रेरित किया। आयोजन का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के प्रति सामुदायिक भागीदारी को प्रोत्साहित करना तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए सकारात्मक संवाद का वातावरण तैयार करना था।
कार्यक्रम का उद्घाटन आईसीसीआर क्षेत्रीय कार्यालय, पटना की क्षेत्रीय निदेशक स्वधा रिज़वी, भारतीय विदेश सेवा की अधिकारी तथा सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एवं कथक नृत्यांगना नीलम चौधरी की उपस्थिति में हुआ। इस अवसर पर बापू टावर के उपनिदेशक ललित कुमार सहित कई गणमान्य अतिथि मौजूद रहे। उद्घाटन सत्र के दौरान वक्ताओं ने पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और समाज की सामूहिक जिम्मेदारियों पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है, बल्कि इसमें आम लोगों की सक्रिय भागीदारी भी उतनी ही आवश्यक है।
कार्यक्रम का सबसे प्रमुख आकर्षण “जब नदी जागी” नामक वृत्तचित्र का प्रदर्शन रहा। यह वृत्तचित्र बिहार के सीतामढ़ी जिले की लखनदेई नदी के पुनर्जीवन की प्रेरणादायक कहानी पर आधारित था। फिल्म में दिखाया गया कि किस प्रकार स्थानीय समुदायों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न हितधारकों ने मिलकर नदी को पुनर्जीवित करने के लिए सामूहिक प्रयास किए। वर्षों से उपेक्षा और पर्यावरणीय क्षरण का सामना कर रही नदी को बचाने के लिए लोगों ने जिस समर्पण और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया, वह दर्शकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना।
वृत्तचित्र ने यह संदेश दिया कि यदि समाज और प्रशासन मिलकर कार्य करें तो प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और पुनर्स्थापन संभव है। फिल्म के माध्यम से नदी के पारिस्थितिक महत्व, जल संरक्षण की आवश्यकता और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में नदियों की भूमिका को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। प्रदर्शन के बाद उपस्थित लोगों ने इस पहल की सराहना की और इसे पर्यावरण जागरूकता बढ़ाने का एक प्रभावी माध्यम बताया।
वृत्तचित्र प्रदर्शन के बाद आयोजित विचार-विमर्श सत्र ने कार्यक्रम को और अधिक सार्थक बना दिया। इस सत्र में लखनदेई नदी संघर्ष समिति के अध्यक्ष एवं प्रख्यात पुरातत्वविद रामशरण अग्रवाल, प्रसिद्ध लेखिका आशा प्रभात तथा सामाजिक कार्यकर्ता प्रोफेसर आनंद किशोर ने अपने विचार साझा किए। वक्ताओं ने पर्यावरण संरक्षण, नदी संरक्षण, सांस्कृतिक धरोहरों के महत्व और पारिस्थितिक पहलों में सामुदायिक भागीदारी की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा की।
चर्चा के दौरान वक्ताओं ने कहा कि पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान केवल नीतिगत स्तर पर नहीं बल्कि सामाजिक स्तर पर भी खोजा जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यदि नागरिक अपने प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित करें तो पर्यावरणीय संकटों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। नदी संरक्षण जैसे अभियानों में स्थानीय लोगों की भागीदारी को उन्होंने सफलता की कुंजी बताया।
विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल वैज्ञानिक या तकनीकी विषय नहीं है, बल्कि यह संस्कृति, परंपरा और सामाजिक मूल्यों से भी जुड़ा हुआ है। भारतीय सभ्यता में नदियों, जंगलों और प्रकृति के अन्य तत्वों को विशेष महत्व दिया गया है। ऐसे में आधुनिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है।
कार्यक्रम का सांस्कृतिक पक्ष भी उतना ही आकर्षक और प्रभावशाली रहा। प्रसिद्ध कलाकार राजीव सिन्हा और उनके समूह द्वारा प्रस्तुत अर्ध-शास्त्रीय संगीत कार्यक्रम “साज़-ए-फ़िज़ा” ने उपस्थित दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। प्रकृति, लय और सामंजस्य के भावों से प्रेरित इस प्रस्तुति ने पर्यावरणीय संतुलन और शांति के संदेश को कलात्मक रूप में प्रस्तुत किया। संगीत के माध्यम से प्रकृति और मानव जीवन के गहरे संबंधों को दर्शाया गया, जिसने कार्यक्रम को एक भावनात्मक और चिंतनशील आयाम प्रदान किया।
संगीत प्रस्तुति के दौरान कलाकारों ने अपनी भावपूर्ण रचनाओं और उत्कृष्ट प्रस्तुति से यह संदेश दिया कि प्रकृति केवल जीवन का आधार नहीं, बल्कि कला और संस्कृति की भी प्रेरणा है। दर्शकों ने इस प्रस्तुति की भरपूर सराहना की और इसे कार्यक्रम का यादगार हिस्सा बताया। सांस्कृतिक कार्यक्रम ने यह सिद्ध किया कि कला और संगीत समाज में सकारात्मक संदेश पहुंचाने का प्रभावी माध्यम बन सकते हैं।
कार्यक्रम में 100 से अधिक लोगों की भागीदारी ने यह स्पष्ट किया कि पर्यावरणीय मुद्दों के प्रति लोगों की रुचि लगातार बढ़ रही है। विद्यार्थियों, शिक्षकों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और संस्कृति प्रेमियों की सक्रिय उपस्थिति ने आयोजन को व्यापक सामाजिक समर्थन प्रदान किया। यह सहभागिता इस बात का संकेत है कि पर्यावरण संरक्षण आज केवल एक सरकारी एजेंडा नहीं, बल्कि समाज की साझा चिंता बन चुका है।
आईसीसीआर क्षेत्रीय कार्यालय, पटना ने इस आयोजन के माध्यम से यह संदेश दिया कि संस्कृति, कला और बौद्धिक विमर्श समाज में जागरूकता फैलाने के प्रभावी साधन हैं। संस्था ने राष्ट्रीय और सामाजिक महत्व के विषयों पर संवाद को बढ़ावा देने की अपनी प्रतिबद्धता को एक बार फिर मजबूत किया। कार्यक्रम ने पर्यावरणीय चेतना को बढ़ावा देने तथा प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए सामूहिक जिम्मेदारी निभाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। समापन अवसर पर उपस्थित लोगों से पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों में सक्रिय भागीदारी निभाने का आह्वान किया गया। वक्ताओं ने कहा कि विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक दिवस नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारे दायित्वों को याद दिलाने का अवसर है। उन्होंने सभी नागरिकों से जल, जंगल और जमीन के संरक्षण के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर प्रयास करने की अपील की।
बापू टावर में आयोजित यह कार्यक्रम इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण बनकर सामने आया कि जब पर्यावरण, संस्कृति और समाज एक मंच पर आते हैं, तो जागरूकता का संदेश अधिक प्रभावी और व्यापक रूप से लोगों तक पहुंचता है। लखनदेई नदी के पुनर्जीवन की प्रेरक कहानी, विशेषज्ञों के विचार और संगीत की मधुर प्रस्तुति ने विश्व पर्यावरण दिवस के इस आयोजन को यादगार बना दिया। यह कार्यक्रम न केवल पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करता है, बल्कि समाज को प्रकृति के साथ संतुलित और जिम्मेदार संबंध स्थापित करने की दिशा में प्रेरित भी करता है।


