कटिहार में ‘बैंक’ कर्मियों का महिलाओं ने किया घेराव! बीमा के नाम पर ‘खेल’ का आरोप; पति की मौत के बाद नहीं मिला लाभ, पुलिस ने घंटों बाद छुड़ाया

समाचार के मुख्य बिंदु: अमदाबाद में बैंकिंग व्यवस्था पर फूटा ग्रामीण महिलाओं का गुस्सा

  • बड़ी कार्रवाई: कटिहार के अमदाबाद प्रखंड के नासी टोला गांव में महिलाओं ने बंधन बैंक के कर्मियों को घंटों बंधक बनाए रखा।
  • विवाद की जड़: 1 लाख रुपये के लोन पर करीब 5 हजार रुपये बीमा के नाम पर काटे गए, लेकिन उपभोक्ताओं को न पॉलिसी मिली और न ही कोई जानकारी।
  • दुखद घटना: समूह से जुड़ी नूरानी खातून के पति की मृत्यु के बाद बीमा लाभ से इनकार; बैंक ने कहा— पति का बीमा हुआ ही नहीं था।
  • स्वीकारोक्ति: बैंक अधिकारियों ने माना कि ‘दोनों पक्षों की लापरवाही’ से पति का बीमा नहीं हो पाया, जिससे विवाद गहराया।
  • पुलिस का हस्तक्षेप: अमदाबाद थाने के एसआई सुनील कुमार सिंह ने मौके पर पहुंचकर बैंक कर्मियों को आक्रोशित भीड़ से सुरक्षित निकाला।
  • VOB इनसाइट: ग्रामीण क्षेत्रों में माइक्रोफाइनेंस बैंकों द्वारा ‘बीमा प्रीमियम’ के नाम पर की जाने वाली कटौती अक्सर पारदर्शिता के अभाव में ‘धोखाधड़ी’ का रूप ले लेती है।

कटिहार / अमदाबाद | 25 मार्च, 2026

​बिहार के कटिहार जिले से निजी बैंकिंग क्षेत्र की मनमानी और लापरवाही का एक गंभीर मामला सामने आया है। अमदाबाद प्रखंड के नासी टोला गांव में आज उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब दर्जनों ग्रामीण महिलाओं ने ‘बंधन बैंक’ के कर्मचारियों को घेर लिया और उनके खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, मामला ऋण (Loan) के साथ मिलने वाले जीवन बीमा में कथित धांधली और पारदर्शिता की कमी से जुड़ा है।

5 हजार की कटौती और ‘लापता’ पॉलिसी: क्या है पूरा मामला?

​नासी टोला गांव की महिलाओं का आरोप है कि बंधन बैंक द्वारा समूह के माध्यम से दिए जाने वाले ऋण पर ‘बीमा’ के नाम पर मोटी रकम काटी जाती है। महिलाओं ने बताया कि 1 लाख रुपये के लोन पर बैंक कर्मियों ने लगभग 5 हजार रुपये यह कहकर काट लिए कि इसमें परिवार का जीवन बीमा शामिल है। हालांकि, पैसे काटने के बावजूद न तो महिलाओं को बीमा के कागजात (Policy Documents) दिए गए और न ही उन्हें नियमों के बारे में विस्तार से बताया गया।

​विवाद तब चरम पर पहुँच गया जब समूह की एक सदस्य नूरानी खातून के पति की अचानक मृत्यु हो गई। जब पीड़ित परिवार बीमा के तहत मिलने वाली सहायता राशि के लिए बैंक पहुँचा, तो उन्हें यह कहकर लौटा दिया गया कि उनके पति का बीमा रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं है। इस सूचना के बाद गांव की अन्य महिलाओं में भी असुरक्षा और ठगी का अहसास हुआ, जिसके बाद उन्होंने बैंक कर्मियों से जवाब-तलब किया।

बैंक अधिकारियों का पक्ष: “दोनों ओर से हुई लापरवाही”

​घंटों चले हंगामे और घेराव के बीच बैंक के आरओ (RO) सोनू कुमार और शाखा प्रबंधक विभाष कुमार शर्मा ने मौके पर अपनी बात रखी। अधिकारियों ने स्वीकार किया कि स्थिति तनावपूर्ण है।

  • अधूरा बीमा: बैंक अधिकारियों ने माना कि ऋण लेने वाली महिला का बीमा तो किया गया था, लेकिन तकनीकी कारणों या जानकारी के अभाव में उनके पति का बीमा नहीं हो सका।
  • लापरवाही की स्वीकारोक्ति: अधिकारियों ने ऑन-कैमरा यह स्वीकार किया कि इस पूरी प्रक्रिया में बैंक कर्मियों और उपभोक्ता, दोनों पक्षों की ओर से लापरवाही हुई है, जिसके कारण आज यह नौबत आई है।
  • जांच का आश्वासन: बैंक प्रबंधन ने मामले की आंतरिक जांच करने और प्रभावित परिवार को संभव सहायता दिलाने का भरोसा दिया है।

पुलिस की एंट्री: एसआई सुनील कुमार सिंह ने संभाला मोर्चा

​मामला बढ़ता देख स्थानीय लोगों ने अमदाबाद थाने को सूचना दी। एसआई सुनील कुमार सिंह अतिरिक्त पुलिस बल के साथ नासी टोला पहुँचे। उन्होंने आक्रोशित महिलाओं को समझा-बुझाकर शांत कराया और बंधक बनाए गए बैंक कर्मियों को उनके कब्जे से मुक्त कराया। पुलिस ने ग्रामीणों को आश्वासन दिया है कि यदि बैंक की ओर से किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता पाई जाती है, तो कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

VOB का नजरिया: क्या ‘साइलेंट डिडक्शन’ ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए कैंसर है?

​’द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) का मानना है कि बंधन बैंक जैसी संस्थाओं को अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करने की सख्त जरूरत है।

  1. पारदर्शिता का अभाव: अनपढ़ या कम पढ़ी-लिखी महिलाओं के लोन से ‘बीमा’ के नाम पर पैसे काट लेना और उन्हें रसीद न देना ‘वित्तीय शोषण’ की श्रेणी में आता है।
  2. जवाबदेही की कमी: “दोनों पक्षों की लापरवाही” कहना बैंक की जिम्मेदारी से बचने का एक आसान तरीका है। बीमा करना बैंक एजेंट की जिम्मेदारी है, उपभोक्ता को यह पता भी नहीं होता कि उन्हें कौन-कौन से फॉर्म भरने हैं।
  3. प्रशासनिक हस्तक्षेप: जिला प्रशासन और बैंकिंग लोकपाल को कटिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में चल रहे इन माइक्रोफाइनेंस समूहों के ‘इंश्योरेंस मॉडल’ की ऑडिट करनी चाहिए।

न्याय की प्रतीक्षा में नूरानी खातून

​फिलहाल नासी टोला में शांति है, लेकिन ग्रामीणों ने स्पष्ट किया है कि यदि नूरानी खातून के परिवार को बीमा का हक नहीं मिला और दोषी बैंक कर्मियों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो वे जिला मुख्यालय पर प्रदर्शन करेंगे। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ इस बैंकिंग विवाद और भविष्य में होने वाली जांच की हर अपडेट आप तक सबसे पहले पहुँचाता रहेगा।

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