पटना में ‘इतिहास की खिड़की’ खुली! 84 बुद्धों की दुर्लभ पांडुलिपियों और 1857 के ‘उर्दू डेथ वारंट’ ने बटोरीं सुर्खियाँ

HIGHLIGHTS

  • विरासत का प्रदर्शन: “बिहार की बौद्धिक परंपरा: पांडुलिपि, चित्र एवं अभिलेख” विषय पर भव्य प्रदर्शनी का आयोजन।
  • डिजिटल खजाना: 36 विषयों पर आधारित 72 पांडुलिपियों के डिजिटल अभिलेख प्रदर्शित किए गए।
  • मुख्य आकर्षण: 84 बुद्ध एवं सिद्धों की 5 चित्रित पांडुलिपियां और 1748 की सचित्र ‘भागवत पुराण’।
  • आजादी की यादें: 1857 के विद्रोह के दौरान उर्दू में जारी फांसी के प्रमाण-पत्र और ब्रिटिश पत्राचार सार्वजनिक।

पटना | 16 मार्च, 2026

​बिहार केवल एक राज्य नहीं, बल्कि सदियों से ज्ञान और प्रज्ञा का वैश्विक केंद्र रहा है। सोमवार को पटना के अभिलेखागार भवन में इसकी जीवंत झलक देखने को मिली। बिहार राज्य अभिलेखागार, खुदाबख्श लाइब्रेरी और बिहार संग्रहालय के साझा प्रयास से आयोजित इस प्रदर्शनी ने यह साबित कर दिया कि हमारे पूर्वजों का ज्ञान केवल धर्म तक सीमित नहीं था, बल्कि वह तंत्र, विज्ञान और दर्शन का अद्भुत संगम था।

दुर्लभ पांडुलिपियों का ‘महाकुंभ’

​प्रदर्शनी में 36 विषयों पर केंद्रित 72 पांडुलिपियों के डिजिटल अभिलेखों को शामिल किया गया है। यहाँ केवल किताबों का ढेर नहीं, बल्कि विषयों का अनोखा मिलन दिखा, जैसे तंत्र के साथ जीवन, इतिहास के साथ कविता और दर्शन के साथ धर्म का जुड़ाव।

प्रदर्शनी के कुछ अनमोल रत्न:

पांडुलिपि/अभिलेख

अनुमानित काल/वर्ष

मुख्य विशेषता

84 बुद्ध एवं सिद्ध

प्राचीन

5 अत्यंत दुर्लभ चित्रित पांडुलिपियां

भागवत पुराण

1748

खुदाबख्श लाइब्रेरी के दुर्लभ चित्रांकित फोलियो

पद्मावत (सचित्र)

1669-70

सूफी काव्य की कलात्मक और चित्रांकित प्रस्तुति

श्रीमद्भगवद्गीता

1797

कृष्ण द्वारा अर्जुन को उपदेश देते हुए सजीव दृश्य

रामायण

1778

राम, सीता और लक्ष्मण से संबंधित ऐतिहासिक चित्र

1857 का गवाह: जब उर्दू में दी गई ‘फांसी’

​इतिहास प्रेमियों के लिए सबसे चौंकाने वाला और भावुक कर देने वाला हिस्सा ब्रिटिश प्रशासन के वे आधिकारिक दस्तावेज रहे, जो 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की गवाही देते हैं। प्रदर्शनी में पहली बार उन अभिलेखों को रखा गया जिनमें विद्रोहियों को दी गई सजा, कारावास और मृत्युदंड के आदेश शामिल हैं। विशेष रूप से उर्दू में जारी किए गए फांसी के प्रमाण-पत्र उस दौर के न्याय और संघर्ष की एक धुंधली लेकिन सशक्त तस्वीर पेश करते हैं।

राहुल सांकृत्यायन और तिब्बत का कनेक्शन

​प्रदर्शनी के दौरान यह भी बताया गया कि पटना संग्रहालय की बिहार रिसर्च सोसाइटी में लगभग 10 हजार प्राचीन पांडुलिपियों का विशाल भंडार है। इनमें से अधिकतर पांडुलिपियां ‘महापंडित’ राहुल सांकृत्यायन द्वारा तिब्बत की दुर्गम यात्राओं के बाद बिहार लाई गई थीं। यह संग्रह आज भी दुनिया भर के शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र है।

VOB का नजरिया: क्या ‘डिजिटल’ होने से बचेगा हमारा गौरव?

​’द वॉयस ऑफ बिहार’ इस पहल की सराहना करता है। जेडी वीमेन्स कॉलेज की छात्राओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति यह बताती है कि आज की पीढ़ी इंस्टाग्राम के रील से बाहर निकलकर अपनी जड़ों को टटोलने में रुचि रखती है। इन पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण न केवल इन्हें सुरक्षित रखेगा, बल्कि दुनिया भर के विद्वानों के लिए बिहार के ‘नॉलेज हब’ के द्वार भी खोलेगा।

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