
वॉशिंगटन/तेहरान। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मंच पर गर्जना अब विनाश की ओर मुड़ती दिख रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर जो बयान दिया है, उसने पूरी दुनिया को एक ऐसे अंधेरे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां से वापसी का रास्ता केवल तबाही की ओर जाता है। गुरुवार तड़के व्हाइट हाउस से दिए गए अपने प्राइम टाइम संबोधन में ट्रंप ने कूटनीति के सभी पर्दों को हटाते हुए सीधे तौर पर ईरान को ‘पाषाण युग’ (स्टोन एज) में भेजने की चेतावनी दी है। यह केवल एक जुबानी जंग नहीं, बल्कि एक पूरे देश के भूगोल, अर्थशास्त्र और बुनियादी ढांचे को राख में बदल देने का खुला ऐलान है। 32 दिनों से जारी इस भीषण युद्ध ने अब वह मोड़ ले लिया है जिसकी कल्पना आधुनिक युग में किसी ने नहीं की थी।
व्हाइट हाउस से विनाश की हुंकार: ट्रंप का वो बयान जिसने दुनिया को सन्न कर दिया
डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी जनता और दुनिया को संबोधित करते हुए कहा कि ईरान अब किसी भी तरह का खतरा मोल लेने की स्थिति में नहीं बचा है। उन्होंने दावा किया कि पिछले 32 दिनों के अमेरिकी सैन्य ऑपरेशन ने ईरान की कमर तोड़ दी है। ट्रंप के शब्दों में, “हमने ईरान की नौसेना और वायुसेना को लगभग खत्म कर दिया है। उनके बैलिस्टिक मिसाइल ठिकाने और परमाणु कार्यक्रम अब केवल मलबे के ढेर हैं।”
लेकिन ट्रंप यहीं नहीं रुके। उन्होंने बेहद आक्रामक लहजे में कहा कि अगले दो से तीन हफ्तों के भीतर अमेरिका ईरान पर ऐसा प्रहार करेगा जो उसे उस पाषाण युग में पहुंचा देगा जहां उसे वास्तव में होना चाहिए था। ट्रंप ने साफ किया कि अमेरिका अब इस काम को बहुत जल्दी पूरा करने की दिशा में बढ़ रहा है। हालांकि, इस पूरे संबोधन में ट्रंप ने युद्ध को खत्म करने या शांति वार्ता की किसी भी संभावना का जिक्र नहीं किया, जिससे यह स्पष्ट है कि अमेरिका अब ‘पूर्ण विजय’ या ‘पूर्ण विनाश’ की नीति पर चल रहा है।
क्या होता है ‘पाषाण काल में भेजना’? अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सबसे क्रूर शब्द
युद्ध और कूटनीति की भाषा में ‘सेंडिंग बैक टू स्टोन एज’ (पाषाण युग में भेजना) कोई सामान्य मुहावरा नहीं है। यह एक ऐसी सैन्य रणनीति की ओर इशारा करता है जिसमें दुश्मन देश की केवल सेना को ही नहीं, बल्कि उसके पूरे वजूद को निशाना बनाया जाता है।
- बुनियादी ढांचे का विनाश: इसका अर्थ है किसी देश के बिजली घर, पानी की आपूर्ति प्रणाली, बांध, पुल और संचार व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर देना।
- आर्थिक पतन: उद्योग-धंधों और तेल शोधन कारखानों को निशाना बनाना ताकि देश की अर्थव्यवस्था सौ साल पीछे चली जाए।
- औद्योगिक अक्षमता: फैक्ट्रियों और विनिर्माण केंद्रों को नष्ट कर देना ताकि वह देश अपनी जरूरतों के लिए भी दूसरों का मोहताज हो जाए।
- चिकित्सा और शिक्षा का अंत: अस्पतालों और विश्वविद्यालयों का ढांचा गिर जाने से समाज में अराजकता और आदिम युग जैसी स्थितियां पैदा करना।
ट्रंप की यह धमकी दिखाती है कि अमेरिका अब ईरान को केवल हराना नहीं चाहता, बल्कि उसे एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में खत्म कर देना चाहता है।
सकते में दुनिया: हॉर्मुज जलडमरूमध्य और तेल का संकट
ट्रंप के इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय में गहरी चिंता फैल गई है। जो देश अब तक युद्धविराम की उम्मीद लगाए बैठे थे, उन्हें अब परमाणु युद्ध का डर सताने लगा है। सबसे बड़ा संकट हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर है। दुनिया का एक बड़ा हिस्सा अपने तेल और गैस की आपूर्ति के लिए इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर है। अगर अमेरिका ईरान पर और कड़ा प्रहार करता है, तो ईरान इस मार्ग को पूरी तरह अवरुद्ध कर सकता है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह सकती है।
यूरोपीय देशों और संयुक्त राष्ट्र ने भी इस बयान पर चुप्पी साधी हुई है, जो इस बात का संकेत है कि अमेरिका की इस आक्रामकता के सामने फिलहाल कोई खड़ा होने की स्थिति में नहीं है। तेल की कीमतें आसमान छूने लगी हैं और दुनिया भर के शेयर बाजार लाल निशान में डूब गए हैं।
बिहार पर क्या होगा असर? (विशेष विश्लेषण)
अब सवाल उठता है कि हजारों मील दूर हो रहे इस युद्ध का बिहार और ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ के पाठकों के लिए क्या महत्व है? इसका जवाब गहरा और चिंताजनक है:
- बिहारी मजदूरों की सुरक्षा: खाड़ी देशों (दुबई, कतर, सऊदी अरब) में बिहार के लाखों युवा काम करते हैं। अगर युद्ध फैलता है, तो इन देशों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाएगी। भागलपुर के देवनंदन सिंह जैसी घटनाएं, जिनकी हाल ही में ईरान के हमले में मौत हुई, फिर से दोहराई जा सकती हैं।
- महंगाई की मार: कच्चे तेल की कीमतों में उछाल का सीधा मतलब है पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दामों में भारी बढ़ोतरी। इससे बिहार में माल ढुलाई महंगी होगी और आम आदमी की थाली से सब्जियां और राशन महंगा हो जाएगा।
- अर्थव्यवस्था पर चोट: विदेश से आने वाला पैसा (रेमिटेंस), जो बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, वह इस युद्ध के कारण रुक सकता है।
संतुलित नजरिया: शक्ति प्रदर्शन या मानवता का अंत?
ट्रंप का यह रवैया उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन मानवता के नजरिए से यह बेहद खतरनाक है। ईरान के पास भी कुछ ऐसे हथियार हो सकते हैं जो इस क्षेत्र को श्मशान में बदल दें। ट्रंप का यह कहना कि ईरान अब कोई खतरा नहीं है, एक रणनीतिक जुआ हो सकता है। अगर ईरान ने अंतिम प्रहार के रूप में अपनी पूरी ताकत झोंक दी, तो मध्य-पूर्व का नक्शा हमेशा के लिए बदल जाएगा।
दूसरी ओर, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के नाम पर एक पूरे देश की नागरिक आबादी को पाषाण युग में भेजने की धमकी देना अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है। क्या दुनिया एक और हिरोशिमा या नागासाकी देखने की ओर बढ़ रही है? ट्रंप का ‘दो-तीन हफ्तों’ का अल्टीमेटम किसी बड़े तूफान से पहले की शांति लग रहा है।
निष्कर्ष: समाधान की जगह गहराता संकट
डोनाल्ड ट्रंप के इस संबोधन ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले दिन बेहद भयावह होने वाले हैं। युद्ध अब केवल दो देशों के बीच नहीं, बल्कि आधुनिक सभ्यता और आदिम विनाश के बीच का मुकाबला बन गया है। ट्रंप ने काम जल्दी पूरा करने की बात तो कही है, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि इस ‘काम’ की कीमत कितनी मासूम जानें चुकाएंगी।
द वॉयस ऑफ बिहार की टीम इस अंतरराष्ट्रीय संकट पर अपनी नजर बनाए हुए है। हम उम्मीद करते हैं कि विश्व शक्तियां इस पागलपन को रोकने के लिए आगे आएंगी, वरना पाषाण युग की ओर केवल ईरान नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था और शांति व्यवस्था बढ़ जाएगी। यह वक्त केवल ईरान के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए परीक्षा की घड़ी है।


