नई दिल्ली: ट्रांसजेंडर्स, सेक्स वर्कर्स और समलैंगिक पुरुषों के रक्तदान पर लगी पाबंदी को लेकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है। सरकार ने अपने हलफनामे में कहा है कि यह प्रतिबंध किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है, बल्कि मरीजों की सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए लगाया गया है।
दरअसल, 2017 में केंद्र सरकार ने रक्तदान से संबंधित नई गाइडलाइन जारी की थी, जिसके तहत ट्रांसजेंडर्स, समलैंगिक पुरुषों और सेक्स वर्कर्स को ब्लड डोनेट करने की अनुमति नहीं दी गई। इस फैसले को चुनौती देते हुए शरीफ डी. रंगनेकर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।
याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के साथ-साथ राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO) और राष्ट्रीय रक्ताधान परिषद को नोटिस जारी किया था। अब केंद्र सरकार ने इस मामले में अपना हलफनामा दाखिल कर प्रतिबंध को सही ठहराया है।
सरकार ने कहा है कि यह फैसला विभिन्न हेल्थ रिसर्च और वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर लिया गया है। इन अध्ययनों के मुताबिक ट्रांसजेंडर्स, सेक्स वर्कर्स और समलैंगिक पुरुषों द्वारा दान किए गए रक्त से HIV, हेपेटाइटिस-बी और हेपेटाइटिस-सी जैसे संक्रमण फैलने का जोखिम आम लोगों की तुलना में 6 से 13 गुना अधिक पाया गया है।
सरकार के अनुसार, यदि ऐसे रक्त का ट्रांसफ्यूजन किसी मरीज को किया जाता है तो संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए मरीजों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए यह नियम बनाया गया है।
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ कर रही है। केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी अदालत में पक्ष रख रही हैं।
वहीं याचिकाकर्ता का कहना है कि 2017 की गाइडलाइन संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के तहत मिले समानता, गरिमा और जीवन के अधिकार का उल्लंघन करती है। याचिका में यह भी कहा गया है कि बिना व्यक्तिगत जांच के किसी पूरे वर्ग को रक्तदान से रोकना मानवाधिकारों के खिलाफ है।
सरकार ने अपने जवाब में कहा है कि यह प्रतिबंध केवल भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में इसी तरह की सावधानियां अपनाई जाती हैं। फिलहाल इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है।


