रक्तबीज कौन था, जिसके वध के लिए मां पार्वती को लेना पड़ा महाकाली का विकराल रूप

‘चंड मुंड संहारे शोणित बीज हरे ‘ मां दुर्गा की आरती करते समय आप इस पंक्ति को जरूर पढ़ते होंगे. लेकिन इस पर आपका ध्यान नहीं गया होगा. इस पंक्ति का अर्थ है- चंड-मुंड (शीश) का संहार किया और शोणित (रक्तबीज) को हर लिया यानी रक्तबीज का वध किया.

देवी दुर्गा को शक्ति का साक्षात स्वरूप माना जाता है. माता रानी अपने भक्तों पर दयादृष्टि रखती हैं,लेकिन दुष्ट और दुराचारियों पर विध्वंस भी करती हैं. महिषासुर अतिबलशाली दैत्य था, जिसका संहार देवता भी नहीं कर सके. इसलिए देवी दुर्गा का जन्म हुआ.

धार्मिक ग्रंथों में मां दुर्गा के जन्म या अवतरण को लेकर कई मत हैं. लेकिन सर्वमान्य मत यही है कि, मां दुर्गा का अवतरण दैत्यों के संहार के लिए हुआ था.  नवरात्रि में हम नवदुर्गा यानी मां दुर्गा के नौ अवतारों की पूजा करते हैं. लेकिन जब दैत्यों के संहार के लिए मां दुर्गा का जन्म हो चुका था, तो फिर क्यों मां दुर्गा को कई अवतार लेने पड़े. आइये जानते हैं इसके बारे में.

दैत्यों के संहार के लिए मां दुर्गा के लिए कई अवतार

महिषासुर, धूम्रविलोन, शुंभ-निशुंभ आदि ये सभी दैत्य हैं, जिनके वध के लिए मां दुर्गा ने अलग-अलग अवतार लिए. इन सभी दैत्यों में रक्तबीज सबसे बलशाली दैत्य था, जिसका वध करना देवताओं के लिए भी आसान नहीं था. दुर्गा सप्तशती के आठवें अध्याय और मार्कंडेय पुराण में रक्तबीज के बारे में विस्तारपूर्वक बतलाया गया है.

रक्तबीज कैसे बना बलशाली

रक्तबीज ने अपने कठोर तब से शिवजी को प्रसन्न कर उनसे वरदान प्राप्त किया था कि, जहां-जहां उसके रक्त की बूंदे गिरेंगी, उससे उसी की तरह एक नया रक्तबीज पैदा हो जाएगा. इसलिए युद्ध में जब भी देवता उस पर प्रहार करते उसकी रक्त की बूंदों से नए रक्तबीज दैत्य का जन्म हो जाता. इसलिए सभी देवता मिलकर भी उसका अंत नहीं कर सके और धीरे-धीरे रक्तबीज का दुराचार बढ़ने लगा.

रक्तबीज के माता-पिता कौन थे?

पौराणिक धार्मिक कथाओं के अनुसार, महर्षि कश्यप और दिति के गर्भ से रक्तबीज उत्पन्न हुआ था. कहा जाता है कि, पूर्व जन्म में रक्तबीज असुर सम्राट रंभ था. एक बार सम्राट रंभ तपस्या में लीन था, तभी इन्द्र ने उसे छलपूर्वक मार दिया. इस तरह से रक्तबीज के रूप में ही सम्राट रंभ का पुनर्जन्म हुआ. उसने फिर से घोर तपस्या की और वरदान प्राप्त किया कि, उसके शरीर की एक बूंद भी धरती पर गिरे तो उससे नया रक्तबीज उत्पन्न हो जाए.

रक्तबीज का क्या अर्थ है?

रक्त का अर्थ लाल या खून से हैं और बीज का अर्थ जीव से है. इस तरह से रक्तबीज का अर्थ है खून से उत्पन्न होने वाला एक नया जीव. धार्मिक मान्यता के अनुसार, आज से लाखों वर्ष पूर्व रक्तबीज नाम का एक दैत्य था, जोक बहुत शक्तिशाली था.

कैसे हुआ रक्तबीज का अंत?

ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।।

इस मंत्र का अर्थ है, जो अपने भक्तों को जन्म-मरण आदि संसार के बंधन से दूर करती हैं. उन मोक्षदायिनी मंगलदेवी का नाम मंगला है और जो प्रलयकाल में संपूर्ण सृष्टि को अपना ग्रास बना ले, वह काली है.

रक्तबीज के संहार के लिए ही मां दुर्गा का अवतरण हुआ. मां दुर्गा और रक्तबीज के बीच युद्ध हुआ. मां दुर्गा जैसे ही उसके अंगों को काटने लगी तो उसके रक्त से नए दैत्य रक्तबीज का जन्म होने लगा. इस तरह से रक्बीज दैत्य की सेना खड़ी हो गई. आखिरकार मां ने देवी चंडिका को आदेश दिया कि, जब वह रक्तबीज पर प्रहार करे तो वह उसका रक्त पी जाए. इससे नया रक्तबीज उत्पन्न नहीं होगा.

इसके बाद मां पार्वती ने भद्रकाली का रूप धारण किया. मां पार्वती के इस रूप को संहार का प्रतीक माना जाता है. इस रूप में मां की बड़ी-बड़ी आंखें, शरीर का रंग काला, लंबी जीभ, आंखों में तेज, गले में मुंडमाला और दैत्यों के हटे हाथ थे. मां काली के इस रूप को समातन धर्म में अन्य सभी देवी-देवताओं में विकराल माना जाता है.

जहां-जहां रक्तबीज का रक्त गिरता मां उसे पी जाती और इससे नया दैत्य उत्पन्न नहीं हो पाता. कहा जाता है कि इस अवतार में मां का रूप बहुत विकराल हो गया था और उन्होंने कई राक्षसों को निगल भी लिया था. इस तरह से मां दुर्गा ने रक्तबीज का संहार किया.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि voiceofbihar.in किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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