स्पीकर के खिलाफ पर्दे के पीछे क्या चल रहा?ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर राहुल अखिलेश ने क्यूँ नहीं किया हस्ताक्षर…? 

नई दिल्ली: लोकसभा में मंगलवार को उस समय सियासी हलचल तेज हो गई जब विपक्षी दलों ने स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस सौंप दिया। विपक्ष ने उन पर सदन की कार्यवाही पक्षपातपूर्ण तरीके से चलाने और महिला सांसदों के खिलाफ झूठे आरोपों को बढ़ावा देने का गंभीर आरोप लगाया है। आइएनडीआइए गठबंधन के करीब 120 सांसदों ने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं, हालांकि तृणमूल कांग्रेस ने फिलहाल इससे दूरी बनाए रखी है।

स्पीकर ओम बिरला ने नोटिस को लोकसभा सचिवालय को भेज दिया है और कहा है कि प्रक्रिया पूरी होने तक वह सदन की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लेंगे।


विपक्ष ने बताए अविश्वास के चार प्रमुख आधार

महासचिव को सौंपे गए नोटिस में विपक्ष ने अविश्वास के पीछे चार मुख्य कारण गिनाए हैं—

  1. सदन का एकतरफा संचालन – नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को महत्वपूर्ण मुद्दों पर बोलने से रोका गया।
  2. सांसदों का निलंबन – बजट सत्र के दौरान आठ विपक्षी सांसदों को निलंबित करना मनमाना कदम बताया गया।
  3. आपत्तिजनक बयान पर चुप्पी – भाजपा के एक सांसद द्वारा पूर्व प्रधानमंत्रियों पर की गई टिप्पणी पर स्पीकर की ओर से कोई कार्रवाई न होना।
  4. महिला सांसदों पर आरोप – कांग्रेस की महिला सांसदों पर प्रधानमंत्री पर हमले की साजिश के आरोप को झूठा और अपमानजनक बताया गया।

राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने क्यों नहीं किए हस्ताक्षर?

इस प्रस्ताव पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव के हस्ताक्षर नहीं हैं। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार राहुल गांधी ने अपने संवैधानिक पद की गरिमा को ध्यान में रखते हुए हस्ताक्षर से दूरी बनाई। अखिलेश यादव ने भी इसी तर्क के आधार पर साइन नहीं किए।

नोटिस देने से पहले कांग्रेस नेता के.सी. वेणुगोपाल ने स्पीकर से मुलाकात कर गतिरोध टालने की कोशिश की थी, लेकिन जब बजट चर्चा से पूर्व राहुल गांधी को बोलने की अनुमति नहीं मिली, तब विपक्ष ने यह कदम उठाया।


आगे क्या होगी प्रक्रिया?

नियमों के अनुसार लोकसभा सचिवालय इस नोटिस की वैधता की जांच करेगा। यदि यह नियमानुसार पाया गया तो इसे सदन में चर्चा और मतदान के लिए रखा जाएगा। संसदीय परंपरा के तहत प्रस्ताव लंबित रहने तक स्पीकर आसन पर नहीं बैठेंगे।

हालांकि एनडीए के पास लोकसभा में स्पष्ट बहुमत है, इसलिए प्रस्ताव के पारित होने की संभावना कम मानी जा रही है। इससे पहले भी तीन बार लोकसभा अध्यक्षों के खिलाफ ऐसे प्रस्ताव लाए गए, लेकिन सभी असफल रहे थे। विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटनाक्रम से संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव और बढ़ सकता है।


 

  • Related Posts