चंपारण में भ्रष्टाचार पर ‘निगरानी’ का प्रहार! ₹30,000 घूस लेते धरे गए डेयरी फील्ड ऑफिसर; ‘समग्र विकास योजना’ में मांग रहे थे ‘कट मनी’

HIGHLIGHTS:

  • बड़ी कार्रवाई: निगरानी अन्वेषण ब्यूरो (Vigilance Bureau) ने डेयरी फील्ड अधिकारी अनुराग अभिषेक को रंगे हाथ दबोचा।
  • घूस का खेल: पशु खरीद अनुदान (Subsidy) के बदले मांगी थी ₹30,000 की रिश्वत।
  • शिकायतकर्ता: मटिअरिया के बबलू कुमार की शिकायत पर बिछाया गया था ‘निगरानी’ का जाल।
  • योजना: ‘समग्र विकास योजना 2025-26’ में भ्रष्टाचार का खुलासा।

चंपारण में ‘निगरानी’ का जाल: दफ्तर में ही धरे गए साहब!

पटना: बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ नीतीश सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का असर एक बार फिर जमीन पर दिखा है। पश्चिम चंपारण के जिला डेयरी विकास कार्यालय में तैनात डेयरी फील्ड ऑफिसर अनुराग अभिषेक (उर्फ अनुराग कुमार) को शनिवार को निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की विशेष टीम ने ₹30,000 की रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार कर लिया। ‘साहब’ को अंदाजा भी नहीं था कि जिस नोटों की गड्डी पर वो हाथ साफ कर रहे हैं, उस पर पहले से ही निगरानी विभाग की नजर थी।

जब किसान ने ठाना— “रिश्वत नहीं, सजा दिलाऊंगा!”

​शिकायतकर्ता बबलू कुमार ने हाल ही में समग्र विकास योजना 2025-26 के तहत पशुओं की खरीद की थी। इस पर मिलने वाले सरकारी अनुदान (Subsidy) की राशि को रिलीज करने के लिए अनुराग अभिषेक लगातार पैसों की डिमांड कर रहे थे।

  • परेशान किसान: बबलू ने थक-हारकर पटना स्थित निगरानी ब्यूरो का दरवाजा खटखटाया।
  • सटीक जाल: ब्यूरो ने मामले के सत्यापन के बाद शुक्रवार को रणनीति तैयार की और शनिवार को जैसे ही बबलू ने पैसे अधिकारी को थमाए, निगरानी की टीम ने उन्हें कार्यालय परिसर से ही दबोच लिया।

निगरानी की टीम ले गई पटना, अब होगी ‘कड़ी पूछताछ’

​गिरफ्तारी के बाद अधिकारी के पास से रिश्वत की रकम बरामद कर ली गई है। टीम उन्हें लेकर पटना रवाना हो गई है, जहाँ निगरानी की विशेष अदालत में उन्हें पेश किया जाएगा। इस गिरफ्तारी के बाद पश्चिम चंपारण के डेयरी विकास कार्यालय में हड़कंप मच गया है।

VOB का नजरिया: विकास की योजनाओं में कब तक लगेगा ‘घूस का दीमक’?

सरकार ‘समग्र विकास योजना’ जैसी स्कीमें इसलिए लाती है ताकि किसानों की आय बढ़े, लेकिन अनुराग अभिषेक जैसे अधिकारी इस विकास को अपनी ‘अतिरिक्त कमाई’ का जरिया बना लेते हैं। ₹30,000 एक किसान के लिए बड़ी रकम है, जिसे अधिकारी महज एक साइन के बदले डकारना चाहते थे। निगरानी विभाग की यह सक्रियता सराहनीय है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हर किसान को ‘अनुदान’ पाने के लिए ‘जंग’ लड़नी होगी?

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