
- भागलपुर प्रशासन के महत्वपूर्ण अंग एसडीएम कार्यालय में पटना से आई निगरानी विभाग की टीम ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक अचूक और गुप्त कार्रवाई को अंजाम दिया है।
- नाथनगर आपूर्ति कार्यालय के एक कर्मी से उसकी सेवा संपुष्टि की फाइल आगे बढ़ाने के एवज में सत्तर हजार रुपये की मोटी घूस मांगी जा रही थी।
- निगरानी विभाग के डीएसपी विद्यांचल प्रसाद के नेतृत्व में बिछाए गए जाल में एसडीएम कार्यालय के स्टेनो प्रेम कुमार और लिपिक मयंक कुमार रंगे हाथ फंस गए।
- इस अचानक हुई छापेमारी के बाद पूरे कलेक्ट्रेट परिसर और प्रशासनिक महकमे में अफरातफरी मच गई, जिसके बाद टीम दोनों आरोपियों को अपने साथ पटना ले गई।
भागलपुर (द वॉयस ऑफ बिहार)।
प्रशासनिक महकमे के भीतर पनपते भ्रष्टाचार पर निगरानी का सीधा प्रहार
भागलपुर जिला प्रशासन के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण केंद्रों में शुमार एसडीएम कार्यालय आज उस वक्त एक बड़े विवाद का केंद्र बन गया, जब वहां भ्रष्टाचार के एक गहरे सिंडिकेट का पर्दाफाश हुआ। आम जनता और निचले स्तर के कर्मचारी अक्सर न्याय और प्रशासनिक कार्यों की उम्मीद में इस कार्यालय की सीढ़ियां चढ़ते हैं, लेकिन इसी छत के नीचे फाइलें खिसकाने के नाम पर रिश्वतखोरी का एक समानांतर तंत्र चल रहा था। पटना से आई निगरानी विभाग की टीम ने एक गुप्त सूचना और पुख्ता योजना के तहत सीधे कार्यालय के भीतर धावा बोला। इस छापेमारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भ्रष्टाचार की जड़ें व्यवस्था के भीतर कितनी गहराई तक पैठ बना चुकी हैं। एक ऐसे कार्यालय में जहां से पूरे अनुमंडल की कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक कार्यों की निगरानी होती है, वहां कर्मचारियों द्वारा सरेआम घूस की मांग करना प्रशासनिक ढांचे की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
नाथनगर आपूर्ति कार्यालय के कर्मी की पीड़ा और व्यवस्था का दबाव
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत नाथनगर आपूर्ति कार्यालय में पदस्थापित एक कर्मचारी अभिजीत कुमार की पीड़ा से होती है। अभिजीत कुमार अपनी सेवा संपुष्टि (सर्विस कंफर्मेशन) को लेकर लंबे समय से एसडीएम कार्यालय के चक्कर काट रहे थे। सरकारी नियमावली के तहत सेवा संपुष्टि एक सामान्य और अधिकारिक प्रक्रिया है, जो समय पर पूरी होनी चाहिए। लेकिन लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के गठजोड़ ने इस सामान्य सी प्रक्रिया को उगाही का हथियार बना लिया। एसडीएम कार्यालय में बैठे स्टेनो प्रेम कुमार और लिपिक मयंक कुमार ने फाइल को आगे बढ़ाने और उस पर आवश्यक मुहर लगाने के एवज में अभिजीत से सत्तर हजार रुपये की भारी भरकम रिश्वत की मांग कर दी। बार-बार मिन्नतें करने के बावजूद जब दोनों कर्मी बिना पैसे के काम करने को तैयार नहीं हुए, तो अभिजीत के सामने एक बड़ा मानसिक और आर्थिक संकट खड़ा हो गया।
पटना मुख्यालय में शिकायत और जाल बिछाने की गुप्त रणनीति
अभिजीत कुमार ने भ्रष्ट तंत्र के सामने घुटने टेकने के बजाय व्यवस्था से सीधे टकराने का साहस दिखाया। उन्होंने रिश्वत देने से साफ इनकार करते हुए पटना स्थित निगरानी अन्वेषण ब्यूरो (विजिलेंस डिपार्टमेंट) के मुख्यालय का रुख किया। वहां पहुंचकर उन्होंने एसडीएम कार्यालय के इन दोनों लिपिकों की पूरी कहानी और उनके द्वारा बनाए जा रहे लगातार दबाव की लिखित शिकायत दर्ज कराई। निगरानी विभाग ने इस शिकायत को बेहद गंभीरता से लिया और सबसे पहले एक प्रारंभिक जांच दल भेजकर इस बात की पुष्टि की कि क्या वाकई एसडीएम कार्यालय में घूस की मांग की जा रही है। जब सत्यापन के दौरान यह बात पूरी तरह से सच साबित हुई कि प्रेम कुमार और मयंक कुमार सत्तर हजार रुपये के बिना फाइल नहीं बढ़ाएंगे, तब पटना मुख्यालय में एक उच्च स्तरीय टीम का गठन किया गया और एक अचूक ट्रैप (जाल) बिछाने की गुप्त रणनीति तैयार की गई।
डीएसपी विद्यांचल प्रसाद का नेतृत्व और भागलपुर में टीम की आमद
इस पूरी छापेमारी और गिरफ्तारी अभियान की कमान निगरानी विभाग के तेजतर्रार डीएसपी विद्यांचल प्रसाद को सौंपी गई। उनके नेतृत्व में एक विशेष टीम बिना किसी शोर-शराबे के पटना से भागलपुर के लिए रवाना हुई। भागलपुर पहुंचने के बाद टीम ने बेहद सावधानी से अपनी रूपरेखा को अंतिम रूप दिया। स्थानीय पुलिस या प्रशासन के किसी भी अधिकारी को इस बात की भनक तक नहीं लगने दी गई कि एसडीएम कार्यालय में कोई इतनी बड़ी कार्रवाई होने वाली है। रणनीति के तहत रिश्वत के सत्तर हजार रुपये के नोटों पर एक खास तरह का केमिकल लगाया गया, जिसका रंग पानी के संपर्क में आते ही लाल हो जाता है। इसके बाद टीम के सदस्य सादे लिबास में एसडीएम कार्यालय के आसपास और भीतर आम फरियादियों की तरह फैल गए, ताकि जब लेन-देन हो तो आरोपियों को भागने का कोई मौका न मिल सके।
रिश्वत के लेन-देन का सटीक क्षण और रंगे हाथ गिरफ्तारी
योजना के एकदम तय समय के अनुसार, अभिजीत कुमार केमिकल लगे सत्तर हजार रुपये लेकर एसडीएम कार्यालय के उस कक्ष में दाखिल हुए जहां स्टेनो प्रेम कुमार और लिपिक मयंक कुमार मौजूद थे। अभिजीत ने जैसे ही फाइल के काम को लेकर बातचीत शुरू की और पैसे देने की पेशकश की, वहां एक चालाकी भरा खेल खेला गया। स्टेनो प्रेम कुमार ने खुद पैसे सीधे अपने हाथ में लेने के बजाय वहां मौजूद लिपिक मयंक कुमार को वह रकम पकड़ने का इशारा किया। जैसे ही मयंक कुमार ने रिश्वत के नोटों की वह गड्डी अपने हाथों में ली, सादे लिबास में पहले से मुस्तैद निगरानी विभाग की टीम ने बिजली की फुर्ती से दोनों को दबोच लिया। मौके पर ही एक गिलास पानी में केमिकल डालकर मयंक कुमार के हाथ धुलवाए गए, जिससे पानी का रंग तुरंत लाल हो गया। यह इस बात का अकाट्य वैज्ञानिक प्रमाण था कि रिश्वत की रकम उसी ने स्वीकार की थी। प्रेम कुमार को भी इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड और बराबर का भागीदार मानते हुए तत्काल प्रभाव से हिरासत में ले लिया गया।
कार्यालय में मची अफरातफरी और फाइलों की सघन जांच
जैसे ही निगरानी टीम ने दोनों कर्मियों की बांहें पकड़ीं और उन्हें अपनी गिरफ्त में लिया, एसडीएम कार्यालय परिसर में एक पल के लिए भारी सन्नाटा पसर गया और उसके तुरंत बाद वहां अफरातफरी मच गई। अन्य कर्मचारी और वहां मौजूद आम लोग समझ ही नहीं पाए कि अचानक क्या हो गया है। जब लोगों को पता चला कि पटना की विजिलेंस टीम ने रिश्वत लेते रंगे हाथ दो लोगों को गिरफ्तार किया है, तो कई अन्य कर्मचारी अपनी-अपनी कुर्सियां छोड़कर इधर-उधर खिसकने लगे। टीम ने दोनों आरोपियों को एक कमरे में बैठाकर उनके टेबल और अलमारियों की भी सघन तलाशी ली। इस दौरान अभिजीत कुमार की सेवा संपुष्टि से जुड़ी वह फाइल भी बरामद कर ली गई, जिसे रोककर इस पूरी उगाही की साजिश रची गई थी। टीम ने पूरी जब्ती सूची तैयार की और कार्यालय के दस्तावेजों को साक्ष्य के तौर पर सुरक्षित कर लिया।
आरोपियों की पटना रवानगी और प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही
गिरफ्तारी से जुड़ी तमाम कागजी औपचारिकताएं और रिकवरी मेमो तैयार करने के बाद, डीएसपी विद्यांचल प्रसाद की टीम मयंक कुमार और प्रेम कुमार को कड़ी सुरक्षा के बीच लेकर पटना के लिए रवाना हो गई। वहां उन पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी और उन्हें विशेष निगरानी अदालत के समक्ष पेश किया जाएगा। इस घटना ने एक बार फिर से इस बहस को जन्म दे दिया है कि निचले स्तर पर काम करने वाले कर्मचारी किस तरह से सरकारी कामकाज को अपनी जागीर समझ बैठते हैं। यह एक संतुलित प्रशासन की जिम्मेदारी होती है कि वह अपने मातहत कर्मचारियों की कार्यप्रणाली पर नजर रखे। निगरानी विभाग की इस त्वरित और सफल कार्रवाई ने जरूर भ्रष्ट कर्मचारियों के मन में एक खौफ पैदा किया है, लेकिन इसके साथ ही यह घटना इस बात की ओर भी इशारा करती है कि जब तक विभागीय स्तर पर फाइलों के निस्तारण की एक पारदर्शी और समयबद्ध व्यवस्था लागू नहीं की जाती, तब तक ऐसे भ्रष्टाचार पर पूरी तरह से लगाम लगाना एक बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य बना रहेगा।


