वैशाली में SHO समेत 5 पुलिसकर्मियों पर SC/ST एक्ट के तहत केस, मारपीट और मूंछ उखाड़ने का आरोप; इलाके में तनाव

वैशाली, 2 मई 2026। बिहार के वैशाली जिले से पुलिस पर गंभीर आरोपों से जुड़ा एक मामला सामने आया है, जिसने कानून-व्यवस्था और पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। राघोपुर थाना क्षेत्र में थाना प्रभारी (SHO) अवधेश कुमार समेत पांच पुलिसकर्मियों के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया गया है। आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने एक सामाजिक कार्यकर्ता के साथ न केवल मारपीट की, बल्कि उन्हें जातिसूचक गालियां दीं और अपमानित करने के लिए उनकी मूंछ उखाड़ने का भी प्रयास किया।

यह मामला हाजीपुर स्थित एससी/एसटी विशेष न्यायालय में दायर परिवाद के माध्यम से सामने आया है। पीड़ित मेथुर भगत, जो एक सामाजिक कार्यकर्ता बताए जा रहे हैं, ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हुए पुलिस पर गंभीर उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं। इस घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल है और लोगों के बीच पुलिस के व्यवहार को लेकर नाराजगी देखी जा रही है।

मामले की शुरुआत एक घरेलू विवाद से हुई थी। जानकारी के अनुसार, पीड़ित के पुत्र सुबोध भगत की पत्नी और पड़ोसी मनु भगत के बीच किसी बात को लेकर मामूली कहासुनी हो गई थी। उस समय पीड़ित घर पर मौजूद नहीं थे। जब वे लौटे तो उन्होंने दोनों पक्षों को समझाकर विवाद शांत करने की कोशिश की। इसी दौरान उनके पुत्र ने स्थिति को देखते हुए राघोपुर थाना को सूचना दे दी।

आरोप है कि सूचना मिलने के बाद थाना प्रभारी अवधेश कुमार, मो. परवेज और अन्य पुलिसकर्मी मौके पर पहुंचे, लेकिन विवाद को सुलझाने के बजाय उन्होंने कथित रूप से गाली-गलौज शुरू कर दी। परिवाद के अनुसार, पुलिस ने पीड़ित, उनके बेटे और बहू को जबरन वाहन में बैठाकर थाने ले जाया गया। वहां स्थिति और गंभीर हो गई।

पीड़ित का आरोप है कि थाने में पुलिस ने उनके बेटे को डराकर उनके खिलाफ ही मामला दर्ज करवा दिया। जब पीड़ित ने इसे पारिवारिक मामला बताते हुए समझौते की बात कही, तो पुलिसकर्मियों ने कथित रूप से उनके साथ मारपीट शुरू कर दी। आरोपों के अनुसार, उन्हें लाठी से कई बार पीटा गया और जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करते हुए अपमानित किया गया।

सबसे गंभीर आरोप यह है कि पुलिसकर्मियों ने उन्हें अपमानित करने के उद्देश्य से उनकी मूंछ उखाड़ने का प्रयास किया। इसके अलावा, परिवाद में यह भी कहा गया है कि उन्हें लॉकअप में बंद कर 20 हजार रुपये की मांग की गई। जब पीड़ित की पत्नी किसी तरह पैसे लेकर थाने पहुंचीं, तब जाकर उन्हें जमानत देकर छोड़ा गया।

इस घटना के बाद पीड़ित ने न्याय के लिए एससी/एसटी विशेष न्यायालय का रुख किया है। अब इस मामले में न्यायालय द्वारा संज्ञान लिए जाने और आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू होने का इंतजार किया जा रहा है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो सकती है।

इस घटना ने पुलिस की भूमिका और जिम्मेदारी को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। आमतौर पर पुलिस से उम्मीद की जाती है कि वह विवादों को सुलझाने और कानून व्यवस्था बनाए रखने का काम करेगी, लेकिन ऐसे आरोप सामने आने से जनता का भरोसा प्रभावित होता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह की घटनाओं से समाज में डर और असंतोष का माहौल बनता है।

इलाके में इस घटना को लेकर तनाव बना हुआ है। हालांकि प्रशासन की ओर से स्थिति को नियंत्रित करने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन लोगों में आक्रोश देखा जा रहा है। कई सामाजिक संगठनों ने भी इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।

विशेषज्ञों का मानना है कि एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामलों को बेहद गंभीरता से लिया जाता है। इस कानून का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को उत्पीड़न से बचाना और उन्हें न्याय दिलाना है। ऐसे में यदि पुलिस पर ही इस तरह के आरोप लगते हैं, तो यह और भी चिंताजनक हो जाता है।

पुलिस विभाग की ओर से अभी तक इस मामले में कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। हालांकि, सूत्रों के अनुसार, विभाग इस मामले की आंतरिक जांच भी कर सकता है। यदि जांच में आरोपों की पुष्टि होती है, तो संबंधित अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।

फिलहाल यह मामला न्यायालय के विचाराधीन है और आने वाले दिनों में इसमें कई अहम खुलासे हो सकते हैं। इस बीच, प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह स्थिति को शांत बनाए रखे और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करे, ताकि पीड़ित को न्याय मिल सके और जनता का विश्वास बहाल हो सके।

कुल मिलाकर, वैशाली का यह मामला केवल एक घटना नहीं, बल्कि पुलिस और जनता के बीच भरोसे की परीक्षा बन गया है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि न्यायालय और प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाते हैं और दोषियों के खिलाफ कैसी कार्रवाई होती है।

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