अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच, अमेरिका को अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगियों से बड़ा झटका लगा है। फ्रांस, इटली और स्पेन ने अमेरिकी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन में शामिल होने से इनकार कर दिया है।
फ्रांस और इटली: कूटनीति को तरजीह
पेरिस ने स्पष्ट किया है कि वह अपनी सेना को अमेरिकी कमान के अधीन नहीं रखेगा और युद्ध की बजाय कूटनीति का सहारा लेना चाहिए। रोम की सरकार ने भी लाल सागर मिशन में शामिल होने से मना करते हुए कहा कि वह केवल रक्षात्मक कार्रवाई का समर्थन करती है। स्पेन ने अमेरिकी नेतृत्व वाले किसी भी एकतरफा सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनने से इंकार किया है।
तुर्की और सऊदी अरब: नाटो और खाड़ी देशों का रुख
नाटो सदस्य तुर्की ने अमेरिका की युद्ध नीतियों की आलोचना करते हुए तटस्थ रहने का निर्णय लिया है। वहीं, सऊदी अरब ने भी अपनी सीमाओं की सुरक्षा और क्षेत्रीय शांति को प्राथमिकता देते हुए युद्ध में सीधे शामिल होने से इंकार किया है। यह अमेरिका की मिडिल ईस्ट रणनीति के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
कूटनीति और संप्रभुता को प्राथमिकता
इन देशों का तर्क है कि मसले हथियारों के बजाय कूटनीति से हल किए जाने चाहिए। फ्रांस और इटली अपनी सैन्य संप्रभुता को लेकर सचेत हैं, और स्पेन ने भी अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र की सहमति के बिना किसी भी सैन्य कदम का विरोध किया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका की आक्रामक नीतियां वैश्विक अर्थव्यवस्था और समुद्री व्यापार के लिए जोखिम बढ़ा सकती हैं।
अमेरिकी गठबंधन में बढ़ती चुनौतियां
फ्रांस, तुर्की और सऊदी अरब जैसे सहयोगियों के पीछे हटने के बाद अमेरिका के लिए ईरान पर दबाव बनाना और समुद्री रास्तों की सुरक्षा करना मुश्किल हो जाएगा। अंतरराष्ट्रीय मंच पर अमेरिका की साख पर सवाल उठ रहे हैं और विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर अन्य देश भी पीछे हटते हैं तो अमेरिका को मिडिल ईस्ट में अकेले ही अपनी रणनीति अपनानी पड़ सकती है।


