समाचार के मुख्य बिंदु: तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय की बड़ी सफाई
- अफवाह पर लगाम: टीएमबीयू (TMBU) प्रशासन ने शिक्षकों के प्रमोशन से जुड़ी विभिन्न समाचार पत्रों में छपी खबरों को पूरी तरह भ्रामक और निराधार बताया।
- कुलसचिव का बयान: प्रो. रामाशीष पूर्वे ने स्पष्ट किया कि पूर्व कुलपति द्वारा प्रमोशन फाइलों पर हस्ताक्षर करने की खबर ‘सत्य से परे’ है।
- मीडिया को हिदायत: विश्वविद्यालय ने कहा— बिना आधिकारिक पुष्टि के खबरें प्रकाशित करना दुर्भाग्यपूर्ण; तथ्यों की जांच अनिवार्य।
- भ्रम की स्थिति: 25 मार्च 2026 के अखबारों में छपी खबर ने शिक्षकों और कर्मचारियों के बीच खलबली मचा दी थी।
- VOB इनसाइट: टीएमबीयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में प्रशासनिक पारदर्शिता और मीडिया की जिम्मेदारी का यह मामला अब चर्चा का विषय बन गया है।
भागलपुर | 25 मार्च, 2026
तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (TMBU) के गलियारों में आज उस वक्त हड़कंप मच गया जब विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित एक प्रमुख खबर को सिरे से खारिज कर दिया। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, कुलसचिव प्रो. रामाशीष पूर्वे ने शिक्षकों के प्रमोशन से जुड़ी चल रही चर्चाओं पर पूर्ण विराम लगाते हुए इसे ‘बेबुनियाद’ करार दिया है।
क्या था विवाद और कुलसचिव ने क्या कहा?
विभिन्न हिन्दी समाचार पत्रों के भागलपुर संस्करण में 25 मार्च 2026 को एक खबर प्रकाशित हुई थी। इसमें दावा किया गया था कि विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति ने शिक्षकों के प्रमोशन से संबंधित उन फाइलों पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, जिन्हें रेफरी (Referee) को भेजा जाना है।
इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए कुलसचिव प्रो. रामाशीष पूर्वे ने आधिकारिक खंडन जारी किया है। उनके वक्तव्य के मुख्य अंश यहाँ दिए गए हैं:
- दावा गलत: पूर्व कुलपति द्वारा प्रमोशन फाइलों पर हस्ताक्षर करने की खबर पूरी तरह बेबुनियाद है।
- आधिकारिक सूचना का अभाव: विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस मामले में कभी भी कोई आधिकारिक जानकारी प्रसारित नहीं की थी।
- अफवाह से नुकसान: ऐसी भ्रामक खबरों से विश्वविद्यालय की छवि धूमिल होती है और कर्मचारियों के बीच अनावश्यक भ्रम पैदा होता है।
विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा मीडिया के लिए जारी दिशा-निर्देश
विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस घटना को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताते हुए मीडिया हाउस और संवाददाताओं के लिए कुछ महत्वपूर्ण बिंदु स्पष्ट किए हैं:
- आधिकारिक पुष्टि अनिवार्य: टीएमबीयू से संबंधित किसी भी खबर के प्रकाशन से पूर्व विश्वविद्यालय के अधिकृत अधिकारियों से उसकी पुष्टि करना जरूरी है।
- तथ्यों की शुद्धता: बिना किसी दस्तावेजी प्रमाण या आधिकारिक प्रेस रिलीज के संवेदनशील मुद्दों (जैसे पदोन्नति या वित्तीय मामले) पर खबर चलाना पत्रकारिता के मानकों के विपरीत है।
- खंडन का महत्व: विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में ऐसी गलतियों की पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए।
VOB का नजरिया: क्या ‘पुष्टि’ के बिना खबर चलाना सही है?
’द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) का मानना है कि टीएमबीयू और मीडिया के बीच का यह टकराव पत्रकारिता की नैतिकता पर गंभीर सवाल उठाता है।
- शिक्षकों का भविष्य: प्रमोशन का मुद्दा शिक्षकों के करियर से जुड़ा एक अत्यंत संवेदनशील विषय है। ऐसी खबरों से उनके मन में झूठी उम्मीद या अनावश्यक डर पैदा होता है।
- प्रशासनिक जवाबदेही: विश्वविद्यालय प्रशासन को भी चाहिए कि वे समय-समय पर प्रमोशन और अन्य प्रक्रियाओं की वर्तमान स्थिति साझा करते रहें ताकि अफवाहों को फैलने का मौका न मिले।
- विश्वसनीयता का संकट: अगर बड़े समाचार पत्र बिना पुष्टि के खबरें छापेंगे, तो पाठकों का उन पर से भरोसा कम हो सकता है।
पारदर्शिता और सावधानी की जरूरत
टीएमबीयू प्रशासन के इस कड़े खंडन के बाद अब गेंद उन मीडिया संस्थानों के पाले में है जिन्होंने यह खबर प्रकाशित की थी। विश्वविद्यालय अब अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं को और अधिक पारदर्शी बनाने पर जोर दे रहा है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ टीएमबीयू में शिक्षकों के प्रमोशन की ‘वास्तविक स्थिति’ और इस विवाद के बाद होने वाली प्रशासनिक कार्रवाई की हर खबर आप तक पहुँचाता रहेगा।


