भागलपुर में बृजभूषण शरण सिंह और धनंजय सिंह ने भरी हुंकार; वीर कुंवर सिंह की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर किया नमन

भागलपुर। बिहार की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक राजधानी कहे जाने वाले भागलपुर में गुरुवार, 23 अप्रैल 2026 का दिन केवल कैलेंडर की एक तारीख भर नहीं रहा, बल्कि यह उस गौरवशाली इतिहास के पुनर्जीवन का गवाह बना जिसने 1857 में ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी। अवसर था बाबू वीर कुंवर सिंह के विजयोत्सव का, और इस उपलक्ष्य में सिल्क सिटी की सड़कों पर उत्तर प्रदेश की राजनीति के दो कद्दावर चेहरे—गोंडा के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह और जौनपुर के पूर्व सांसद धनंजय सिंह—एक साथ नजर आए। इन दोनों नेताओं के भागलपुर आगमन ने विजयोत्सव की चमक को न केवल दोगुना कर दिया, बल्कि सीमा पार के राजनैतिक और सामाजिक संबंधों को भी एक नई ऊर्जा प्रदान की।

​अस्सी बरस की उम्र में तलवार उठाकर गंगा की लहरों में अपना हाथ समर्पित करने वाले जगदीशपुर के राजा की याद में आयोजित इस कार्यक्रम ने पूरे शहर को केसरिया रंग और देशभक्ति के नारों से सराबोर कर दिया। जीरो माइल से लेकर टाउन हॉल तक, हर तरफ केवल वीर कुंवर सिंह की वीरता के किस्से और उनके सिद्धांतों पर चलने का संकल्प सुनाई दे रहा था।

भव्य स्वागत और जीरो माइल पर श्रद्धा की अभिव्यक्ति

​जैसे ही बृजभूषण शरण सिंह और धनंजय सिंह का काफिला भागलपुर की सीमा में दाखिल हुआ, समर्थकों और आयोजकों के उत्साह का बांध टूट गया। शहर के प्रवेश द्वार पर ही गगनभेदी नारों के साथ उनका भव्य स्वागत किया गया। इस आयोजन की कमान बाबू वीर कुंवर सिंह सामाजिक परिषद के हाथों में थी। परिषद के अध्यक्ष डॉ. संजय सिंह, उपाध्यक्ष डॉ. अजय कुमार सिंह, कोषाध्यक्ष रणजीत सिंह और कार्यक्रम प्रभारी डॉ. राजीव सिंह ने दोनों अतिथियों की अगवानी की।

​स्वागत की रस्मों के बाद काफिला सीधे जीरो माइल चौक पहुँचा, जहाँ बाबू वीर कुंवर सिंह की अश्वारोही प्रतिमा स्थापित है। यहाँ का नजारा किसी युद्ध के मैदान में विजय के बाद होने वाले उत्सव जैसा था। बृजभूषण शरण सिंह और धनंजय सिंह ने बारी-बारी से प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। माल्यार्पण के उन क्षणों में वहां मौजूद भीड़ ने ‘बाबू वीर कुंवर सिंह अमर रहें’ के नारे लगाए, जिससे पूरा वातावरण गुंजायमान हो उठा। दोनों नेताओं ने सिर झुकाकर उस महानायक के शौर्य और बलिदान को नमन किया, जिन्होंने अपनी ढलती उम्र को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि उसे राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए एक ढाल की तरह इस्तेमाल किया।

टाउन हॉल में वैचारिक विमर्श: इतिहास से भविष्य की सीख

​माल्यार्पण के पश्चात यह विशाल जनसमूह शहर के हृदय स्थल टाउन हॉल (नगर भवन) की ओर बढ़ा। यहाँ आयोजित विजयोत्सव सभा में पैर रखने तक की जगह शेष नहीं थी। मंच पर बृजभूषण शरण सिंह और धनंजय सिंह के बैठते ही सभागार तालियों की गूँज से भर उठा। सभा को संबोधित करते हुए दोनों नेताओं ने बाबू वीर कुंवर सिंह की जीवनी और उनके राजनैतिक-सामाजिक योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला।

​बृजभूषण शरण सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि वीर कुंवर सिंह केवल बिहार के नहीं, बल्कि पूरे भारत के उस स्वाभिमान का प्रतीक हैं जो कभी झुकना नहीं जानता। उन्होंने जोर देकर कहा कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अगर जगदीशपुर की तलवार नहीं चमकी होती, तो शायद आजादी की लड़ाई का इतिहास कुछ और ही होता। उन्होंने कुंवर सिंह के सामरिक कौशल और उनकी उस रणनीति की चर्चा की, जिसने तत्कालीन ब्रिटिश जनरलों को बार-बार हार मानने पर मजबूर किया था।

​धनंजय सिंह ने भी युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि बाबू वीर कुंवर सिंह का जीवन हमें सिखाता है कि वीरता का संबंध शरीर की ताकत से अधिक मन के संकल्प से होता है। अस्सी वर्ष की आयु में जब लोग विश्राम की सोचते हैं, तब कुंवर सिंह ने घोड़े पर सवार होकर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। उन्होंने कहा कि आज के युवाओं को कुंवर सिंह के समावेशी नेतृत्व से सीखना चाहिए, जिनकी सेना में हर वर्ग और समुदाय के लोग शामिल थे।

जगदीशपुर के राजा: अदम्य साहस की अनकही गाथा

​कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने इतिहास के उन पन्नों को भी पलटा जो आज भी बिहार के बच्चों की कहानियों में जिंदा हैं। बाबू वीर कुंवर सिंह शाहाबाद (वर्तमान भोजपुर) क्षेत्र के जगदीशपुर रियासत के राजा थे। 1857 के विद्रोह के समय वे अपनी रियासत और अपने लोगों के हक के लिए उठ खड़े हुए।

​इतिहास की वह घटना जब वे अपनी सेना के साथ गंगा पार कर रहे थे और अंग्रेजों की एक गोली उनकी बांह में लग गई थी, उसका जिक्र होते ही टाउन हॉल में सन्नाटा पसर गया। जहर फैलने के डर से उन्होंने स्वयं अपनी ही तलवार से अपनी बांह काटकर गंगा को अर्पित कर दी थी। वक्ताओं ने कहा कि यह केवल एक अंग का बलिदान नहीं था, बल्कि यह उस अटूट निष्ठा का परिचय था जो अपनी मातृभूमि के प्रति थी। 23 अप्रैल 1858 को उन्होंने जगदीशपुर में यूनियन जैक उतारकर अपना विजय ध्वज फहराया था, और इसीलिए आज का दिन पूरे देश में विजयोत्सव के रूप में मनाया जाता है।

राजनैतिक और सामाजिक मायने: यूपी-बिहार का साझा विरासत

​भागलपुर के इस आयोजन में उत्तर प्रदेश के दो बड़े नेताओं की मौजूदगी के गहरे मायने निकाले जा रहे हैं। बृजभूषण शरण सिंह और धनंजय सिंह, दोनों ही अपनी-अपनी क्षेत्रों में मजबूत सामाजिक आधार रखते हैं। उनका बिहार आना यह संदेश देता है कि बाबू वीर कुंवर सिंह की विरासत किसी भौगोलिक सीमा में बंधी नहीं है। यह क्षत्रिय समाज और समग्र हिंदू समाज के लिए एक गौरव का क्षण था, जहाँ उत्तर प्रदेश और बिहार के नेतृत्व ने एक मंच से ‘एकता’ और ‘स्वाभिमान’ की बात की।

​आयोजन समिति के सदस्यों ने बताया कि इन नेताओं का भागलपुर आना यहाँ के युवाओं के लिए प्रेरणा का काम करेगा। भागलपुर और आसपास के जिलों (बांका, मुंगेर, पूर्णिया) से आए हजारों लोगों ने इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया। शहर के मुख्य मार्गों पर तोरण द्वार बनाए गए थे और चिलचिलाती धूप के बावजूद लोगों का हुजूम कम नहीं हुआ।

सांस्कृतिक वैभव और स्थानीय नेतृत्व की सक्रियता

​विजयोत्सव समारोह में केवल भाषण ही नहीं हुए, बल्कि सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से भी कुंवर सिंह को याद किया गया। स्थानीय कलाकारों ने वीर रस की कविताओं और गीतों से लोगों में जोश भर दिया। डॉ. संजय सिंह और डॉ. राजीव सिंह ने अतिथियों को स्मृति चिह्न और अंग वस्त्र भेंट कर सम्मानित किया। परिषद के पदाधिकारियों ने कहा कि बाबू वीर कुंवर सिंह सामाजिक परिषद का उद्देश्य ही यही है कि नई पीढ़ी को अपने पूर्वजों के गौरवशाली इतिहास से परिचित कराया जाए।

​इस दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। शहर के जीरो माइल से लेकर टाउन हॉल तक पुलिस बल की तैनाती थी ताकि यातायात व्यवस्था बाधित न हो। भागलपुर के नागरिकों ने भी इस शोभायात्रा और सभा का दिल खोलकर स्वागत किया। कई स्थानों पर लोगों ने अतिथियों पर फूल बरसाकर अपनी खुशी जाहिर की।

  • ये भी पढ़े..

    असम विमान हादसे में भोजपुर का लाल दानिश आलम शहीद, इकलौते बेटे की शहादत से परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़

    Share Add as a preferred…

    नागौद राजघराने के गोलीकांड में नया विवाद, आरोपी सुनीता सिंह का कथित वीडियो वायरल, पुलिस पर उठे सवाल

    Share Add as a preferred…