वॉशिंगटन/नई दिल्ली | 26 फरवरी, 2026 भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों में एक बड़ी दरार आती दिख रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने भारतीय सौर (सोलर) उत्पादों के आयात पर 125.87% (करीब 126%) का भारी-भरकम प्रारंभिक प्रतिपूर्ति शुल्क (Countervailing Duty – CVD) लगाने की घोषणा की है। अमेरिका का आरोप है कि भारत सरकार अपने सौर निर्माताओं को ‘अनुचित सब्सिडी’ दे रही है, जिससे अमेरिकी घरेलू कंपनियों को बाजार में टिकना मुश्किल हो रहा है।
सिर्फ भारत नहीं, पड़ोसी देश भी निशाने पर
अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने केवल भारत ही नहीं, बल्कि अन्य एशियाई देशों पर भी इसी तरह की कार्रवाई की है:
- इंडोनेशिया: 86% से 143% तक का शुल्क।
- लाओस: करीब 81% की शुरुआती ड्यूटी।
- दोहरा बोझ: यह शुल्क 24 फरवरी से सभी देशों पर घोषित 10% बेस टैरिफ के अतिरिक्त होगा, जो अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा पिछले टैरिफ को असंवैधानिक बताने के बाद लागू किया गया है।
भारतीय सौर उद्योग पर ‘बिजली’ बनकर गिरी खबर
इस घोषणा का असर भारतीय शेयर बाजार और निर्यातकों पर तत्काल देखने को मिला है:
- शेयरों में भारी गिरावट: घोषणा के बाद Waaree Energies के शेयर 14-15%, Premier Energies के 14-18% और Vikram Solar के शेयर 8% तक टूट गए।
- बाजार से बाहर होने का खतरा: विशेषज्ञों का मानना है कि इस शुल्क के बाद भारतीय सोलर पैनल अमेरिकी पैनलों की तुलना में 30% अधिक महंगे हो जाएंगे, जिससे अमेरिकी बाजार में उनकी मांग लगभग खत्म हो सकती है।
- घरेलू बाजार पर दबाव: निर्यात रुकने से भारतीय कंपनियों के पास भारी स्टॉक जमा हो जाएगा, जिससे घरेलू बाजार में ‘ओवर-सप्लाई’ की स्थिति पैदा हो सकती है और कीमतों में भारी गिरावट आ सकती है।
ट्रेड डील पर मंडराया खतरा
यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारत और अमेरिका एक बड़े द्विपक्षीय व्यापार समझौते के अंतिम चरण में थे।
- बैठक स्थगित: इस फैसले के बाद भारत और अमेरिकी अधिकारियों के बीच होने वाली प्रस्तावित बैठक को टाल दिया गया है।
- रणनीतिक बदलाव: अमेरिका अब अपनी सौर आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) के लिए चीन पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ उन देशों को भी रोक रहा है जो कथित तौर पर सब्सिडी के सहारे अमेरिकी उद्योगों को नुकसान पहुँचा रहे हैं।
VOB का नजरिया: ‘आत्मनिर्भर भारत’ बनाम ‘अमेरिका फर्स्ट’
अमेरिका भारत के सौर निर्यात का सबसे बड़ा खरीदार रहा है, जो हाल के वर्षों में 9 गुना तक बढ़ा है। ट्रंप की इस नीति ने स्पष्ट कर दिया है कि व्यापारिक समझौतों से पहले उनके लिए अपनी घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बचाना प्राथमिकता है। भारतीय कंपनियों के लिए अब एकमात्र रास्ता अमेरिका के भीतर ही अपनी यूनिट्स लगाना या यूरोप और मध्य-पूर्व जैसे वैकल्पिक बाजारों की तलाश करना बचा है।
ब्यूरो रिपोर्ट, द वॉयस ऑफ बिहार (VOB)।


