जहरीली शराब का कहर या साजिश? मोतिहारी में संदिग्ध मौतों से हड़कंप, 5 की मौत, 15 बीमार

मोतिहारी में ‘ज़हरीले जाम’ का तांडव: मौत का आंकड़ा बढ़कर 5 हुआ, संपत साह ने भी तोड़ा दम, कई की आंखों में छाया हमेशा के लिए अंधेरा

मोतिहारी/तुरकौलिया। बिहार में पूर्ण शराबबंदी के दावों के बीच मौत का व्यापार करने वाले सिंडिकेट ने एक बार फिर कोहराम मचा दिया है। पूर्वी चंपारण जिले के मोतिहारी में ज़हरीली शराब के सेवन से होने वाली मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। शुक्रवार दोपहर तक इस त्रासदी में जान गंवाने वालों की संख्या बढ़कर 5 हो गई है। ताज़ा जानकारी के अनुसार, पांचवें मृतक के रूप में संपत साह की पहचान हुई है, जिन्होंने अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। 3 अप्रैल 2026 की यह दोपहर मोतिहारी के उन गांवों के लिए मातम की ऐसी दास्तां लेकर आई है, जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। ज़हर की इस बोतल ने न केवल घरों के चिराग बुझाए हैं, बल्कि कई लोगों को ताउम्र के लिए अंधा बना दिया है।

रघुनाथपुर से शंकर सरैया तक पसरा सन्नाटा: अर्थियों का बोझ

​घटना का केंद्र तुरकौलिया प्रखंड का रघुनाथपुर गांव और आसपास का शंकर सरैया इलाका है। मौत का यह खूनी खेल दो दिनों से जारी है। गुरुवार को एक व्यक्ति की संदिग्ध स्थिति में मौत हुई थी, जिसके बाद शुक्रवार सुबह तक यह आंकड़ा चार पहुँचा और अब पांचवें व्यक्ति संपत साह की मौत ने प्रशासन के हाथ-पांव फुला दिए हैं। मृतकों की शिनाख्त परसौना दलित बस्ती के परिछन मांझी (55), शंकर सरैया के प्रमोद यादव (32), जयसिंहपुर फुलवार के चंदू कुमार (22), हीरालाल और अब संपत साह के रूप में हुई है।

​परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। गांव की गलियों में सिसकियों के साथ-साथ भारी आक्रोश भी है। मृतकों के परिवार का सीधा आरोप है कि इन सभी ने गांव में ही बिकने वाली ‘लोकल’ यानी कच्ची शराब का सेवन किया था। शराब पीने के कुछ ही घंटों बाद इन लोगों की तबीयत बिगड़ने लगी और अस्पताल पहुँचते-पहुँचते शरीर में फैले ज़हर ने अपना काम तमाम कर दिया।

सदर अस्पताल में हाहाकार: आंखों की रोशनी छीन ले गया ज़हर

​मोतिहारी सदर अस्पताल इस वक्त किसी युद्धक्षेत्र के अस्पताल जैसा मंजर पेश कर रहा है। यहां करीब 15 लोग अभी भी इलाजरत हैं, जिनमें से दो की स्थिति अत्यंत नाजुक बनी हुई है। डॉक्टरों के अनुसार, मरीजों में सिरदर्द, लगातार उल्टी, शरीर में जकड़न और कमजोरी जैसे लक्षण दिख रहे हैं। सबसे भयावह स्थिति उन लोगों की है जिनकी आंखों की रोशनी चली गई है। ज़हरीली शराब में मौजूद मिथाइल अल्कोहल ने सीधे ऑप्टिक नर्व पर हमला किया है, जिससे कई मरीज अब अपने सामने खड़े परिजनों को भी नहीं पहचान पा रहे हैं।

​अस्पताल में भर्ती मरीजों के परिजनों का कहना है कि प्रशासन मौतों के आंकड़ों को दबाने की कोशिश कर रहा है। सूत्रों की मानें तो कई लोग बदनामी और पुलिसिया कार्रवाई के डर से निजी क्लीनिकों में छिपकर इलाज करा रहे हैं, जिससे बीमारों की वास्तविक संख्या 20 के पार हो सकती है। रघुनाथपुर दलित बस्ती में तो स्थिति और भी गंभीर है, जहां गरीबी और ज़हर के इस घातक कॉकटेल ने पूरे मोहल्ले को दहशत में डाल दिया है।

पुलिस का ‘ऑपरेशन क्लीन’: सप्लायरों के सिंडिकेट पर चोट

​घटना की खबर आग की तरह फैलते ही पुलिस प्रशासन अलर्ट मोड में आ गया। सदर डीएसपी दिलीप कुमार ने स्वयं कमान संभालते हुए तुरकौलिया के विभिन्न ठिकानों पर छापेमारी का नेतृत्व किया। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए ज़हर के इस नेटवर्क से जुड़े मुख्य सप्लायरों को दबोच लिया है। गिरफ्तार किए गए लोगों में हीरालाल राय और जम्बू बैठा प्रमुख हैं, जिन्हें इस कांड का मास्टरमाइंड माना जा रहा है।

​पुलिस ने अब तक लगभग एक दर्जन संदिग्धों को हिरासत में लिया है। डीएसपी दिलीप कुमार के अनुसार, ज़हरीली शराब की जिस चेन ने इन मौतों को अंजाम दिया, उसके अधिकांश कड़ियों को पकड़ लिया गया है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि यह कच्ची शराब कहां निर्मित की जा रही थी और इसमें किस तरह के रसायनों का मिश्रण किया गया था। छापेमारी के दौरान कुछ संदिग्ध तरल पदार्थ भी बरामद किए गए हैं, जिन्हें फॉरेंसिक जांच के लिए लैब भेजा जा रहा है।

लापरवाही पर गाज: चौकीदार सस्पेंड, थानेदार रडार पर (विशेष विश्लेषण)

​इस त्रासदी के बाद प्रशासनिक चूक का पहलू भी साफ नजर आ रहा है। बिहार में शराबबंदी को जमीनी स्तर पर लागू करने की जिम्मेदारी स्थानीय चौकीदार और बीट पुलिस की होती है। डीएसपी ने कर्तव्यहीनता और सूचना तंत्र की विफलता के आरोप में संबंधित इलाके के चौकीदार को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। यह कार्रवाई एक संदेश है, लेकिन क्या यह पर्याप्त है?

  1. खुफिया तंत्र का फेलियर: जब गांव में सरेआम शराब की सप्लाई हो रही थी, तो इसकी भनक स्थानीय थाने को क्यों नहीं लगी? क्या हीरालाल राय और जम्बू बैठा जैसे अपराधी बिना किसी स्थानीय संरक्षण के इतना बड़ा अवैध धंधा चला रहे थे?
  2. समानांतर सत्ता: शराबबंदी के बाद बिहार के ग्रामीण इलाकों में कच्ची शराब की एक समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी हो गई है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ की पड़ताल के अनुसार, पुलिस की सख्ती केवल सड़कों पर दिखने वाली ब्रांडेड बोतलों तक सीमित रह जाती है, जबकि गांवों के भीतर चल रही कच्ची शराब की भट्टियां मौत का सामान तैयार कर रही हैं।
  3. सिस्टम का भ्रष्टाचार: चौकीदार का निलंबन अक्सर एक ‘बलि का बकरा’ ढूंढने जैसी प्रक्रिया होती है। जब तक थाना स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक शराब माफियाओं के हौसले बुलंद रहेंगे।

राजनीतिक गलियारों में उबाल: विपक्ष ने घेरा

​मोतिहारी शराब कांड ने बिहार की राजनीति में भी उबाल ला दिया है। विपक्ष ने इस घटना को ‘प्रशासनिक हत्या’ करार देते हुए मुख्यमंत्री की शराबबंदी नीति पर करारा प्रहार किया है। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि शराबबंदी केवल कागजों पर है, जबकि धरातल पर ज़हरीली शराब का नेटवर्क फल-फूल रहा है जो केवल गरीबों की जान ले रहा है। सरकार से मांग की जा रही है कि मृतकों के परिवारों को मुआवजा दिया जाए और दोषियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा चलाकर स्पीडी ट्रायल किया जाए।

​उधर, सत्ता पक्ष के नेताओं का कहना है कि कानून अपना काम कर रहा है और अपराधियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। सप्लायरों की गिरफ्तारी इस बात का सबूत है कि सरकार कार्रवाई में कोई कोताही नहीं बरत रही है। हालांकि, जनता के बीच इस तर्क को लेकर अविश्वास है, क्योंकि ऐसी घटनाएं बिहार के अलग-अलग जिलों से रह-रहकर सामने आती रहती हैं।

संतुलित नजरिया: शराबबंदी की चुनौती और समाज की भूमिका

​शराबबंदी कानून के अपने सामाजिक लाभ रहे हैं, विशेषकर महिलाओं और बच्चों के प्रति होने वाली घरेलू हिंसा में कमी आई है। लेकिन ज़हरीली शराब की ये घटनाएं कानून के क्रियान्वयन में मौजूद छेदों को उजागर करती हैं। पुलिस केवल तभी सक्रिय होती है जब लाशें गिरने लगती हैं। अगर यही सक्रियता सूचना मिलने के स्तर पर दिखाई जाए, तो परिछन मांझी या संपत साह जैसे लोग आज जीवित होते।

जहरीली शराब का कहर या साजिश? मोतिहारी में संदिग्ध मौतों से हड़कंप, 5 की मौत, 15 बीमार
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​दूसरी ओर, समाज को भी जागरूक होने की जरूरत है। ज़हरीली शराब का खतरा केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, यह पूरे परिवार को आर्थिक और सामाजिक रूप से तबाह कर देता है। जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इस अवैध कारोबार का सामूहिक बहिष्कार नहीं करेंगे और पुलिस का सहयोग नहीं करेंगे, तब तक शराब माफिया किसी न किसी रूप में सक्रिय रहेंगे।

निष्कर्ष: न्याय की आस और भविष्य की चेतावनी

​मोतिहारी के पांच मृतकों के परिवारों की चीखें बिहार के सुशासन पर एक बड़ा सवालिया निशान हैं। संपत साह की मौत ने इस त्रासदी को और गहरा कर दिया है। हीरालाल राय और जम्बू बैठा की गिरफ्तारी न्याय की दिशा में पहला कदम तो है, लेकिन असली जीत तब होगी जब उन सफेदपोश चेहरों को भी बेनकाब किया जाएगा जो इन सप्लायरों के पीछे खड़े होते हैं।

द वॉयस ऑफ बिहार की टीम इस पूरी घटना पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है। हम मृतकों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त करते हैं और प्रशासन से मांग करते हैं कि इस कांड के अनुसंधान में किसी भी तरह की राजनीतिक दखलंदाजी न हो। मोतिहारी के इन पांच परिवारों को इंसाफ मिले और ज़हरीले ज़हर के इन व्यापारियों को ऐसी सजा हो कि दोबारा कोई ‘कातिल बोतल’ बेचने की हिम्मत न कर सके। 3 अप्रैल की यह तारीख मोतिहारी के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में याद रखी जाएगी।

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