10 महीने से मानदेय नहीं मिलने पर टीएमबीयू के एमबीए विभाग में बढ़ी परेशानी, आर्थिक संकट से जूझ रहे शिक्षक और कर्मचारी

भागलपुर स्थित तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (टीएमबीयू) के एमबीए विभाग में कार्यरत शिक्षकों और कर्मचारियों की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। विभाग के टीचिंग और नॉन-टीचिंग स्टाफ का आरोप है कि उन्हें पिछले 10 महीनों से मानदेय का भुगतान नहीं किया गया है, जिसके कारण वे गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। नियमित आय बंद होने से कर्मचारियों के सामने परिवार का भरण-पोषण करना चुनौती बन गया है। कई कर्मचारियों का कहना है कि स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अब वे भुखमरी जैसी परिस्थितियों का सामना करने को मजबूर हैं।

एमबीए विभाग में कार्यरत कर्मचारियों के अनुसार, लंबे समय से वेतन या मानदेय नहीं मिलने के कारण उनका दैनिक जीवन प्रभावित हो गया है। घर का किराया, बच्चों की स्कूल फीस, स्वास्थ्य संबंधी खर्च और अन्य जरूरी जरूरतों को पूरा करना दिन-प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि आर्थिक दबाव के कारण मानसिक तनाव भी लगातार बढ़ रहा है।

विभाग के कई फैकल्टी सदस्यों और कर्मचारियों ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए बताया कि पिछले कई महीनों से वे विश्वविद्यालय प्रशासन और विभागीय अधिकारियों के समक्ष अपनी समस्या उठा रहे हैं, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। उनका कहना है कि बार-बार आश्वासन तो मिल रहा है, लेकिन भुगतान की दिशा में कोई ठोस कदम दिखाई नहीं दे रहा।

एमबीए विभाग के फैकल्टी सदस्यों में शामिल डॉ. पंकज कुमार, डॉ. हारिश कुमार, ब्यूटी कुमारी, डॉ. काजी कमरान तथा अन्य कर्मचारियों ने कहा कि लंबे समय से मानदेय लंबित रहने के कारण उनका आर्थिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है। कई लोगों ने अपने निजी खर्चों को पूरा करने के लिए उधार लेना शुरू कर दिया है, जबकि कुछ कर्मचारियों को पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने में गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

कर्मचारियों ने बताया कि लगातार 10 महीनों तक भुगतान नहीं होना किसी भी कर्मचारी के लिए अत्यंत कठिन स्थिति है। उनका कहना है कि वे नियमित रूप से अपनी सेवाएं दे रहे हैं, छात्रों की पढ़ाई और विभागीय कार्यों का संचालन कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें उनके कार्य का पारिश्रमिक नहीं मिल रहा है। इससे कर्मचारियों के मनोबल पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।

कई शिक्षकों का कहना है कि आर्थिक तंगी का असर उनके परिवारों पर भी पड़ने लगा है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है और घर के आवश्यक खर्च पूरे करने में दिक्कत आ रही है। कुछ कर्मचारियों ने यह भी कहा कि परिवार के सदस्यों के इलाज और अन्य आवश्यक जरूरतों के लिए पैसे जुटाना मुश्किल हो गया है।

कर्मचारियों के अनुसार, जब वे अपनी समस्या लेकर विभागीय निदेशक के पास पहुंचते हैं तो उन्हें विश्वविद्यालय प्रशासन से संपर्क करने की सलाह दी जाती है। दूसरी ओर, विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से मामले में सकारात्मक पहल और समाधान का आश्वासन दिया जाता है। हालांकि कर्मचारियों का कहना है कि अब उन्हें केवल आश्वासन नहीं बल्कि वास्तविक भुगतान की आवश्यकता है।

जानकारी के अनुसार, एमबीए विभाग की आय-व्यय व्यवस्था, मानदेय भुगतान और कर्मचारियों की सेवा अवधि विस्तार से जुड़े मामलों की जांच के लिए एक समिति गठित की गई थी। इस समिति ने अपनी जांच पूरी कर फरवरी महीने में रिपोर्ट विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलपति को सौंप दी थी। कर्मचारियों को उम्मीद थी कि रिपोर्ट मिलने के बाद भुगतान प्रक्रिया में तेजी आएगी, लेकिन कई महीने बीत जाने के बावजूद समस्या का समाधान नहीं हो सका।

सूत्रों के अनुसार, जांच रिपोर्ट जमा होने के बाद भुगतान और सेवा विस्तार से जुड़े दस्तावेजों को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया में कुछ प्रशासनिक अड़चनें सामने आईं। इसी कारण मामला लंबित होता चला गया और कर्मचारियों को भुगतान नहीं मिल सका। हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि मामले को गंभीरता से लिया जा रहा है और समाधान के प्रयास जारी हैं।

इस बीच विभाग की निदेशक प्रो. निर्मला कुमारी ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि मानदेय भुगतान और सेवा अवधि विस्तार से संबंधित सभी आवश्यक दस्तावेज काफी पहले ही विश्वविद्यालय प्रशासन को भेज दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि विभाग की ओर से सभी प्रक्रियाएं समय पर पूरी कर दी गई हैं और कर्मियों के भुगतान के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।

प्रो. निर्मला कुमारी ने यह भी कहा कि विभागीय स्तर पर किसी प्रकार की देरी नहीं की गई है। मानदेय भुगतान से संबंधित फाइलें, परफॉर्मेंस रिपोर्ट और अन्य जरूरी कागजात विश्वविद्यालय को उपलब्ध करा दिए गए हैं। अब भुगतान संबंधी अंतिम निर्णय और प्रक्रिया विश्वविद्यालय प्रशासन के स्तर पर पूरी की जानी है।

वहीं कर्मचारियों का कहना है कि विभाग और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच फाइलों के आदान-प्रदान और प्रक्रियागत विवाद का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है। उनका मानना है कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं की देरी का असर उन लोगों पर पड़ रहा है जो अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए मानदेय पर निर्भर हैं।

शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का भी मानना है कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान में कार्यरत शिक्षकों और कर्मचारियों का मानदेय समय पर मिलना बेहद जरूरी है। यदि शिक्षकों और कर्मचारियों को आर्थिक असुरक्षा का सामना करना पड़ेगा तो इसका असर संस्थान की कार्यप्रणाली और शैक्षणिक वातावरण पर भी पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि विश्वविद्यालयों में संविदा या मानदेय आधारित कर्मचारियों के भुगतान में होने वाली देरी एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। इससे न केवल कर्मचारियों का मनोबल प्रभावित होता है, बल्कि संस्थान की छवि पर भी असर पड़ता है। इसलिए ऐसे मामलों का समयबद्ध समाधान आवश्यक है।

फिलहाल एमबीए विभाग के शिक्षक और कर्मचारी विश्वविद्यालय प्रशासन से जल्द से जल्द मानदेय भुगतान की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि शीघ्र समाधान नहीं हुआ तो उन्हें अपनी आवाज बुलंद करने के लिए आगे की रणनीति पर विचार करना पड़ सकता है।

अब सभी की नजर विश्वविद्यालय प्रशासन पर टिकी हुई है। कर्मचारी उम्मीद कर रहे हैं कि लंबित मानदेय का भुगतान जल्द होगा और उन्हें आर्थिक संकट से राहत मिलेगी। वहीं विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने भी यह चुनौती है कि वह इस मामले का शीघ्र समाधान कर कर्मचारियों के बीच बढ़ती नाराजगी को दूर करे।

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