बिहार में राज्यसभा की सीटों को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भीतर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। दरअसल, बिहार कोटे से राज्यसभा की 5 सीटें 9 अप्रैल 2026 को खाली होने जा रही हैं, जिसे लेकर अभी से सहयोगी दलों के बीच दावेदारी शुरू हो गई है।
इसी कड़ी में हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के संरक्षक और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने अपनी पार्टी के लिए एक राज्यसभा सीट की मांग रखी थी। हालांकि, राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने इस मांग को अनुचित बताते हुए सार्वजनिक रूप से आपत्ति जताई। इसके बाद अब जीतन राम मांझी ने कुशवाहा के बयान पर पलटवार किया है।
“कुशवाहा को मेरी मांग पर ऐतराज नहीं जताना चाहिए था” – जीतन राम मांझी
केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने साफ शब्दों में कहा कि उपेंद्र कुशवाहा को इस मुद्दे पर बोलने से बचना चाहिए था। उन्होंने कहा—
“उपेंद्र कुशवाहा एक परिपक्व राजनेता हैं, लेकिन उन्हें मेरी मांग पर ऐतराज नहीं जताना चाहिए था। उन्हें इस विषय पर चुप रहना चाहिए।”
मांझी ने आगे कहा कि कुशवाहा खुद पहले ही राज्यसभा जा चुके हैं और उन्हें राजनीति में पर्याप्त अवसर और लाभ मिल चुका है।
“जिन्हें लाभ मिल चुका है, उन्हें दूसरों की मांग पर बोलने का हक नहीं”
जीतन राम मांझी ने व्यक्तिगत संदर्भ देते हुए कहा—
“उनकी पत्नी विधायक हैं और उनका बेटा बिहार सरकार में मंत्री है। ऐसे में उन्हें दूसरों की वैध राजनीतिक मांगों पर टिप्पणी करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। उन्हें राजनीतिक लाभ मिल चुका है।”
मांझी का यह बयान सिर्फ व्यक्तिगत नाराजगी नहीं, बल्कि NDA के भीतर सीट बंटवारे और शक्ति संतुलन को लेकर गहराते मतभेदों की ओर भी इशारा करता है।
NDA के भीतर बढ़ सकता है तनाव
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जैसे-जैसे राज्यसभा चुनाव की तारीख नजदीक आएगी, NDA के सहयोगी दलों के बीच अपनी-अपनी हिस्सेदारी को लेकर दबाव और तेज होगा। इस बयानबाजी से यह साफ संकेत मिल रहा है कि गठबंधन के अंदर सब कुछ सामान्य नहीं है।
HAM (S) का राजनीतिक सफर
हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) बिहार की एक दलित-केंद्रित क्षेत्रीय पार्टी है, जिसकी स्थापना 2015 में जीतन राम मांझी ने जनता दल (यूनाइटेड) से अलग होने के बाद की थी। मांझी बिहार के प्रमुख महादलित नेताओं में गिने जाते हैं और वे वर्ष 2014 से 2015 के बीच कुछ समय के लिए बिहार के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं।
इसके बाद से उन्होंने HAM (S) को हाशिए पर पड़े और वंचित वर्गों की एक मजबूत राजनीतिक आवाज के रूप में स्थापित किया। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले HAM (S) ने भाजपा के नेतृत्व वाले NDA में शामिल होने का फैसला किया था।
लोकसभा चुनावों में NDA की जीत के बाद जीतन राम मांझी को केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल किया गया, जिससे पार्टी का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया।


