खबर के मुख्य बिंदु:
- वैश्विक मार: अमेरिका-ईरान तनाव के चलते भागलपुर सिल्क इंडस्ट्री को लगा ₹25 करोड़ का तगड़ा झटका।
- बड़ा नुकसान: शनिवार रात को ही रद्द हुआ करोड़ों का ऑर्डर; खाड़ी देशों और अमेरिका जाने वाला था माल।
- बंद होते लूम: बुनकर इलाकों में पसरा सन्नाटा, कई घरों में बंद हुए पावरलूम और हैंडलूम।
- संकट का सिलसिला: कोरोना और बांग्लादेश संकट के बाद अब युद्ध की आहट ने तोड़ी कमर।
भागलपुर: दुनिया के किसी कोने में जब बारूद की गंध फैलती है, तो उसकी मार बिहार के गरीब बुनकरों की रोजी-रोटी पर पड़ती है। ‘सिल्क सिटी’ के नाम से मशहूर भागलपुर आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति और युद्ध की आग में झुलस रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने सात समंदर पार भागलपुर के सिल्क व्यापार की कमर तोड़ दी है। शनिवार की रात यहाँ के निर्यातकों और बुनकरों के लिए काली साबित हुई, जब अचानक ₹25 करोड़ का एक बड़ा ऑर्डर रद्द कर दिया गया।
शनिवार की रात और ₹25 करोड़ का ‘झटका’
स्थानीय बुनकर हेमंत कुमार और आलोक कुमार की आंखों में भविष्य को लेकर डर साफ देखा जा सकता है। उन्होंने बताया कि सिल्क सिटी अभी धीरे-धीरे संभल ही रही थी कि अंतरराष्ट्रीय बाजार से बुरी खबर आ गई।
- ऑर्डर कैंसिलेशन: अमेरिका और खाड़ी देशों के बीच बढ़ते तनाव और युद्ध की आशंका के चलते विदेशी खरीदारों ने ₹25 करोड़ के आर्डर को होल्ड या कैंसिल कर दिया है।
- निर्यात पर असर: भागलपुर से तैयार माल बड़े पैमाने पर अमेरिका और मध्य-पूर्व (Middle East) देशों में जाता है। अमेरिकी नीतियों और बढ़ते टैरिफ ने इस संकट को और गहरा दिया है।
लूमों पर लटका ताला, पलायन की तैयारी
जब हमारी टीम ने बुनकर इलाकों का दौरा किया, तो कई घरों से लूम चलने की ‘खट-खट’ आवाज गायब थी।
- दोहरी मार: पहले बांग्लादेश की खराब स्थिति ने वहां का बाजार बंद कर दिया, और अब अमेरिका-ईरान संकट ने रही-सही कसर पूरी कर दी।
- बेच रहे हैं मशीनें: हालात इतने बदतर हो गए हैं कि कई बुनकर अपने लूम (मशीनें) बेचकर दूसरे राज्यों में मजदूरी करने जाने की योजना बना रहे हैं।
- खतरे में अस्तित्व: तसर, मुगा, कोटा, मटका, मलवरी और अरंडी जैसे विश्व प्रसिद्ध सिल्क कपड़े अब थान में ही धूल फांक रहे हैं।
बुनकरों की जुबानी: “कब तक लड़ेंगे मुश्किलों से?”
”कोरोना के बाद लगा था कि दिन फिरेंगे, लेकिन कभी पड़ोसी देश में जंग होती है तो कभी सात समंदर पार। हर बार मार हम गरीबों पर ही पड़ती है। अगर सरकार ने मदद नहीं की, तो सिल्क सिटी का नाम सिर्फ इतिहास के पन्नों में रह जाएगा।” — हेमंत कुमार, स्थानीय बुनकर
VOB का नजरिया: वैश्विक संकट और स्थानीय समाधान की दरकार
भागलपुर का सिल्क उद्योग केवल व्यापार नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की विरासत है। अंतरराष्ट्रीय तनाव हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन स्थानीय स्तर पर सरकार को बुनकरों के लिए ‘क्रेडिट गारंटी’ या ‘अल्टरनेट मार्केट’ (वैकल्पिक बाजार) की व्यवस्था करनी होगी। अगर ₹25 करोड़ का नुकसान बुनकरों के मत्थे मढ़ा गया, तो बिहार से मेधा के साथ-साथ हुनर का भी बड़ा पलायन होगा। क्या ‘आत्मनिर्भर भारत’ का सपना इन बंद होते लूमों के बीच सच हो पाएगा?


