भागलपुर | 02 मार्च, 2026: कहते हैं कि माँ का प्रेम काल और जंजीरों से परे होता है, लेकिन भागलपुर के कैम्प जेल के बाहर जो मंजर दिखा, उसने कानून की किताबों और मानवीय संवेदनाओं के बीच की गहरी खाई को उजागर कर दिया। एनडीपीएस (NDPS) मामले में एक साल से बंद दो सगे भाइयों के लिए उनकी माँ का निधन एक ऐसा पहाड़ बनकर टूटा, जिसका दर्द अब ताउम्र उनके सीने में सुलगता रहेगा।
माँ की अंतिम पुकार: “एक बार बेटों को दिखा दो”
बबरगंज थाना क्षेत्र के शिवलोक कॉलोनी (मोहद्दीनगर) निवासी पुरुषोत्तम और रवि कुमार पिछले एक साल से जेल की सलाखों के पीछे हैं। उनकी माँ लंबे समय से बीमार थीं और उनकी सिर्फ एक ही अंतिम इच्छा थी—अपने बेटों का चेहरा आखिरी बार देखना।
- दुखों का पहाड़: शनिवार दोपहर माँ ने अंतिम सांस ली।
- परिजनों का संकल्प: माँ की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए परिजनों ने एक साहसिक और भावुक फैसला लिया। वे माँ की अर्थी को श्मशान ले जाने के बजाय सीधे कैम्प जेल के गेट पर ले आए।
कानून का ‘हवाला’ और घंटों का इंतजार
जेल के लोहे के दरवाजों के सामने जब माँ की अर्थी पहुँची, तो वहां सन्नाटा पसर गया। परिजनों ने जेल प्रशासन से मिन्नतें कीं कि बेटों को माँ का आखिरी दीदार करने दिया जाए।
- प्रक्रिया की बाधा: प्रशासन ने कानूनी प्रक्रियाओं और कोर्ट की अनुमति का हवाला देते हुए हाथ खड़े कर दिए। परिजनों को अगली सुबह तक इंतजार करने को कहा गया।
- हंगामा और आक्रोश: घंटों तक अर्थी के साथ इंतजार करने के बाद परिजनों का सब्र टूट गया। जेल गेट पर ही नारेबाजी और प्रदर्शन शुरू हो गया। परिजनों का सवाल वाजिब था—”क्या एक मृत माँ को अपने बेटों से मिलने के लिए भी अगली सुबह की तारीख चाहिए?”
आखिरकार झुका प्रशासन: सलाखों के भीतर पहुँची अर्थी
भारी विरोध और माहौल बिगड़ता देख आखिरकार प्रशासन का रुख नरम पड़ा। विशेष अनुमति के तहत:
- जेल का गेट खुला और माँ की अर्थी को भीतर ले जाया गया।
- सलाखों के पीछे बंद पुरुषोत्तम और रवि ने अपनी माँ के पैर छुए और उन्हें अंतिम विदाई दी।
- वहां मौजूद हर शख्स की आँखें उस वक्त नम थीं, जब जेल के कड़े पहरे के बीच बेटों की सिसकियां गूंज रही थीं।
VOB का नजरिया: क्या ‘नियमों’ में संवेदना की जगह नहीं?
भागलपुर की यह घटना एक बड़ा सवाल खड़ा करती है। बेशक कानून अपना काम करता है और एनडीपीएस जैसे मामलों में सख्ती जरूरी है, लेकिन क्या किसी कैदी के मौलिक मानवीय अधिकार (जैसे माता-पिता की मृत्यु पर अंतिम दर्शन) को ‘प्रक्रिया’ के नाम पर घंटों लटकाया जाना सही है? जिस माँ ने जीते जी बेटों का इंतजार किया, उसे मरकर भी जेल के गेट पर इंतजार करना पड़ा। यह व्यवस्था पर एक गंभीर टिप्पणी है।


