- सुशासन के दावों की खुली पोल: दरिगांव के मलांव गांव में सरकारी उदासीनता की शर्मनाक तस्वीर; जन्मजात दिव्यांग सुधीर 10 साल से योजनाओं से वंचित
- कंधे पर बोझ या जिम्मेदारी?: फर्नीचर मिस्त्री पिता संतोश शर्मा बेटे को पीठ पर लादकर लगा रहे दफ्तरों के चक्कर; आर्थिक तंगी ने तोड़ दी कमर
- कागजों में सिमटा अधिकार: 10 साल पहले बन गया था दिव्यांगता प्रमाण पत्र, फिर भी नहीं मिली फूटी कौड़ी; अधिकारी देते रहे सिर्फ आश्वासन
द वॉयस ऑफ बिहार (रोहतास/सासाराम)
रोहतास जिले में सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई कितनी गहरी है, इसकी बानगी दरिगांव थाना क्षेत्र के मलांव गांव में देखने को मिली है। यहां प्रशासन की संवेदनहीनता के कारण एक लाचार पिता अपने 15 वर्षीय दिव्यांग बेटे को कंधे पर ढोने को मजबूर है। सुशासन के दौर में भी सुधीर शर्मा (15 वर्ष) पिछले 10 सालों से सरकारी मदद की बाट जोह रहा है।
10 साल पहले बना सर्टिफिकेट, लाभ ‘जीरो’
मलांव निवासी संतोष शर्मा का पुत्र सुधीर जन्म से ही दिव्यांग है। जागरूकता दिखाते हुए परिजनों ने करीब 10 साल पहले ही उसका दिव्यांगता प्रमाण पत्र (Disability Certificate) बनवा लिया था।
- विडंबना: प्रमाण पत्र होने के बावजूद आज तक सुधीर को न तो दिव्यांग पेंशन का लाभ मिला और न ही चलने-फिरने के लिए कोई सहायक उपकरण (ट्राइसाइकिल/व्हीलचेयर) उपलब्ध कराया गया।
कंधे पर बेटा और आंखों में उम्मीद
सहायक साधनों के अभाव में सुधीर चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ है। ऐसे में उसके पिता संतोष शर्मा उसे अपने कंधे पर उठाकर सरकारी दफ्तरों और अस्पतालों के चक्कर लगाने को विवश हैं।
- आर्थिक तंगी: संतोष शर्मा फर्नीचर का काम करके किसी तरह परिवार का भरण-पोषण करते हैं। उन्होंने बताया कि आर्थिक तंगी के कारण वे खुद से बेटे के लिए महंगे उपकरण नहीं खरीद सकते, इसलिए सरकारी मदद ही उनकी आखिरी उम्मीद है।
अधिकारी देते रहे सिर्फ तारीख पे तारीख
पीड़ित पिता का आरोप है कि उन्होंने स्थानीय जनप्रतिनिधियों से लेकर संबंधित विभागों के अधिकारियों तक कई बार गुहार लगाई, लेकिन हर जगह से उन्हें सिर्फ कोरे आश्वासन मिले, ठोस कार्रवाई कभी नहीं हुई।
यह मामला सीधे तौर पर समाज कल्याण विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। जब प्रमाण पत्र वर्षों पहले बन चुका है, तो आखिर लालफीताशाही की वजह से एक दिव्यांग बच्चे का अधिकार क्यों मारा जा रहा है?


