द वॉयस ऑफ बिहार | नई दिल्ली/डेस्क
देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने महिलाओं और नाबालिगों की सुरक्षा को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल पेश की है। बुधवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी युवती के निजी अंग (Private Parts) को पकड़ना और उसके कपड़ों (नाड़ा) के साथ छेड़छाड़ करना ‘दुष्कर्म के प्रयास’ (Attempt to Rape) की श्रेणी में आता है। अदालत ने इसे अपराध की महज ‘तैयारी’ मानने से इनकार कर दिया और इलाहाबाद हाईकोर्ट के पुराने फैसले को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि ऐसी हरकत दुष्कर्म की कोशिश नहीं, बल्कि सिर्फ ‘तैयारी’ (Preparation) थी।
- हाईकोर्ट की गलती: शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने तय आपराधिक कानून के सिद्धांतों की गलत व्याख्या की है।
- समन बहाल: सुप्रीम कोर्ट ने कासगंज के विशेष जज द्वारा जून 2023 में आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 (दुष्कर्म के प्रयास) के तहत जारी किए गए मूल समन को फिर से बहाल कर दिया है।
क्या था पूरा मामला?
यह घटना 10 नवंबर 2021 की है, जब कासगंज इलाके में एक महिला अपनी 14 वर्षीय नाबालिग बेटी के साथ रिश्तेदार के घर से लौट रही थी।
- धोखाधड़ी: रास्ते में गांव के ही तीन युवकों ने लड़की को बाइक से घर छोड़ने की बात कही और उसे साथ ले गए।
- दरिंदगी: सुनसान रास्ते पर आरोपियों ने लड़की के निजी अंगों के साथ छेड़छाड़ की और उसके कपड़ों का नाड़ा खींच दिया।
- बचाव: लड़की की चीख सुनकर जब दो स्थानीय लोग मौके पर पहुंचे, तो आरोपी वहां से भाग निकले।
कानूनी नजरिए से क्यों अहम है यह फैसला?
अक्सर कानूनी पेचीदगियों में यह बहस होती है कि ‘अपराध की तैयारी’ और ‘अपराध का प्रयास’ के बीच की रेखा कहां खत्म होती है।
- तैयारी बनाम प्रयास: सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर कोई व्यक्ति पीड़ित के निजी अंगों तक पहुंचता है और कपड़ों से छेड़छाड़ करता है, तो वह ‘तैयारी’ के चरण को पार कर चुका है और यह सीधे तौर पर दुष्कर्म का प्रयास है।
- पॉक्सो और आईपीसी: चूंकि पीड़िता नाबालिग थी, इसलिए इस फैसले से पॉक्सो एक्ट के तहत चल रहे मामलों में भी अभियोजन (Prosecution) को मजबूती मिलेगी।
यह फैसला देशभर की निचली अदालतों के लिए एक नजीर साबित होगा, जहां अक्सर साक्ष्यों और धाराओं की व्याख्या में अपराधियों को राहत मिल जाती थी।
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