बिहार की खेती में ‘पिंक रिवोल्यूशन’! 30% भागीदारी से सशक्त हो रहीं महिला किसान; मशरूम से लेकर ड्रैगन फ्रूट तक दीदियों का बोलबाला

HIGHLIGHTS: खेती की नई ‘शक्ति’

  • 30% का संकल्प: कृषि अनुदान की सभी प्रमुख योजनाओं में न्यूनतम 30% महिला लाभुकों का चयन अनिवार्य।
  • PM किसान डेटा: बिहार की 26,37,646 महिलाएं सीधे पा रही हैं ‘सम्मान निधि’ का लाभ।
  • फोकस क्रॉप्स: मशरूम, मखाना, स्ट्रॉबेरी और ड्रैगन फ्रूट जैसी नकदी फसलों में महिलाओं की बढ़ती धाक।
  • बड़ा प्रभाव: 86 लाख किसानों में से लगभग एक-तिहाई महिलाएं अब बिहार की कृषि का मजबूत स्तंभ।

पटना | 17 मार्च, 2026

​बिहार की ‘हरित क्रांति’ अब महिलाओं के कंधों पर सवार होकर आगे बढ़ रही है। राज्य सरकार ने अपनी कृषि नीतियों में बड़ा बदलाव करते हुए महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत की हिस्सेदारी सुनिश्चित कर दी है। अब खेती केवल हल चलाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि बिजनेस और स्वरोजगार का जरिया बन गई है, जिसकी कमान बिहार की बेटियां और बहुएं संभाल रही हैं।

📊 आंकड़ों में महिला सशक्तिकरण: पीएम किसान से बागवानी तक

योजना का नाम

कुल लाभुक (लगभग)

महिला भागीदारी

PM किसान सम्मान निधि

86 लाख+

26.37 लाख (30%)

कृषि अनुदान योजनाएं

सभी पात्र किसान

न्यूनतम 30% अनिवार्य

उच्च मूल्य फसलें

कलस्टर आधारित

मशरूम, मखाना, पपीता में बढ़त

इन ‘सुपर’ योजनाओं में महिलाओं को मिल रही प्राथमिकता

​कृषि विभाग ने विशेष रूप से उन फसलों को चिन्हित किया है जिनमें महिलाएं कम लागत और कम मेहनत में अधिक मुनाफा कमा सकें:

  • ड्रैगन फ्रूट विकास योजना: आधुनिक खेती के इस नए ट्रेंड में 30% महिला किसानों को अनुदान।
  • एकीकृत बागवानी मिशन: पपीता, आम और लीची के क्षेत्र विस्तार में महिलाओं का विशेष कोटा।
  • मुख्यमंत्री बागवानी मिशन: अंजीर (Fig), स्ट्रॉबेरी और क्लस्टर बागवानी योजनाओं में चयन में प्राथमिकता।
  • पोषण और सुरक्षा: मशरूम उत्पादन के जरिए महिलाएं न केवल अपनी आय बढ़ा रही हैं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में पोषण सुरक्षा भी सुनिश्चित कर रही हैं।

VOB का नजरिया: हल से ज्यादा ‘हिसाब’ में माहिर हो रहीं महिलाएं!

​बिहार सरकार की यह पहल केवल ‘सब्सिडी’ देने तक सीमित नहीं है। जब एक महिला किसान के खाते में ₹2,000 की सम्मान निधि आती है या उसे ड्रैगन फ्रूट के लिए सरकारी अनुदान मिलता है, तो वह केवल एक किसान नहीं, बल्कि एक ‘एग्री-प्रेन्योर’ (कृषि उद्यमी) बनती है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ का मानना है कि 30% की यह भागीदारी आने वाले समय में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का चेहरा बदल देगी। अब महिलाएं केवल खेतों में मजदूरी नहीं कर रहीं, बल्कि वे निर्णय ले रही हैं कि कौन सी फसल उगेगी और उसका मुनाफा क्या होगा।

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