
पटना: NEET पेपर लीक, परीक्षा में कथित धांधली और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर बुधवार को पटना की सड़कों पर उमड़ा छात्रों का विशाल प्रदर्शन अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। 30 जुलाई को होने वाले बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव से ठीक पहले हुए इस आंदोलन ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या छात्रों का गुस्सा चुनावी नतीजों को प्रभावित करेगा या बीजेपी अपना मजबूत गढ़ बचाने में सफल रहेगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बड़ी संख्या में युवाओं की नाराजगी चुनावी माहौल पर असर डाल सकती है। हालांकि इसका वास्तविक प्रभाव मतदान के दिन ही साफ होगा।
प्रशांत किशोर ने साधा सरकार पर निशाना
जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने कहा कि छात्रों का आंदोलन अभी और तेज होगा क्योंकि युवाओं का भरोसा लगातार टूट रहा है।
उन्होंने कहा कि छात्र मेहनत से परीक्षा की तैयारी करते हैं, लेकिन पेपर लीक और भर्ती प्रक्रियाओं पर उठ रहे सवालों से उनका भविष्य प्रभावित हो रहा है। उनके मुताबिक, यही कारण है कि युवाओं का गुस्सा अब सड़कों पर दिखाई दे रहा है।
बांकीपुर उपचुनाव पर असर के सवाल पर उन्होंने कहा कि “बांकीपुर की जनता जागरूक है और 30 जुलाई को अपना फैसला खुद देगी।”
BJP बोली- चुनाव विकास के मुद्दे पर होगा
वहीं बीजेपी नेता और बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद के अध्यक्ष रणवीर नंदन ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि बांकीपुर उपचुनाव का छात्रों के आंदोलन से कोई संबंध नहीं है।
उन्होंने कहा कि चुनाव स्थानीय विकास और क्षेत्रीय मुद्दों पर लड़ा जा रहा है। उनके अनुसार, पूर्व विधायक नितिन नवीन के कार्यकाल में हुए विकास कार्यों के आधार पर जनता एक बार फिर बीजेपी पर भरोसा जताएगी।
विश्लेषकों ने उठाए राजनीतिक सवाल
वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण बागी का कहना है कि लगातार सामने आ रहे पेपर लीक मामलों के कारण केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर उठ रहे सवालों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उनके अनुसार, यदि सरकार मंत्री का इस्तीफा नहीं चाहती थी, तो कम से कम विभागीय बदलाव पर विचार किया जा सकता था। उनका मानना है कि इस मुद्दे पर राजनीतिक स्तर पर सरकार दबाव में दिखाई दे रही है।
मतदान के दिन साफ होगी तस्वीर
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि छात्र और युवा मतदाता इस मुद्दे को मतदान के समय प्राथमिकता देते हैं, तो बांकीपुर उपचुनाव में इसका असर देखने को मिल सकता है। वहीं यदि स्थानीय विकास, उम्मीदवार और क्षेत्रीय समीकरण हावी रहे, तो आंदोलन का चुनावी प्रभाव सीमित रह सकता है।
अब सभी की नजर 30 जुलाई को होने वाले मतदान और उसके नतीजों पर टिकी है, जो यह तय करेंगे कि छात्रों का यह आंदोलन केवल सड़कों तक सीमित रहा या उसने चुनावी राजनीति की दिशा भी बदल दी।


