HIGHLIGHTS: दिल्ली में ‘लोकतंत्र विजय महोत्सव’ का शंखनाद; 1975 के ‘मीसाबंदियों’ ने मांगा राष्ट्रीय सम्मान
- बड़ी मांग: स्कूली पाठ्यक्रम (Syllabus) में शामिल हो ‘आपातकाल’ का अध्याय; नई पीढ़ी जाने तानाशाही का सच।
- अश्विनी चौबे का प्रहार: “आपातकाल केवल दमन नहीं, बल्कि परिवार और वंशवाद को बचाने के लिए संविधान पर किया गया कुठाराघात था।”
- इंद्रेश कुमार का सवाल: “विभाजन और रक्तपात वाले स्वतंत्रता आंदोलन को ‘पूर्णतः अहिंसक’ कैसे कहें? असली अनुशासित अहिंसा तो लोकतंत्र सेनानियों ने दिखाई।”
- जेपी आंदोलन की याद: स्वर्गीय सुशील मोदी के साथ मिलकर जेपी को नेतृत्व के लिए मनाने की वो ऐतिहासिक कहानी।
- सम्मान की लड़ाई: 15 राज्यों की तर्ज पर दिल्ली के लोकतंत्र सेनानियों को भी मिले सुविधा और राजकीय मान्यता।
नई दिल्ली | 22 मार्च, 2026
आज जब देश अपनी लोकतांत्रिक जड़ों को मजबूत कर रहा है, देश की राजधानी नई दिल्ली में ‘लोकतंत्र विजय महोत्सव’ के बहाने इतिहास के उन पन्नों को पलटा गया, जिन्हें कुछ लोग दबाना चाहते हैं। देशभर से जुटे लोकतंत्र सेनानियों, मीसाबंदियों और डी.आई.आर. बंदियों ने एक सुर में हुंकार भरी कि 1975 का आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का वो ‘काला अध्याय’ है, जिसका सच नई पीढ़ी को पढ़ाया जाना अनिवार्य है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) की इस विशेष रिपोर्ट में जानिए कैसे मोरारजी देसाई और जयप्रकाश नारायण (JP) के उन सिपाहियों ने आज फिर से लोकतंत्र की रक्षा का संकल्प दोहराया।
“वंशवाद की ढाल था आपातकाल”: अश्विनी कुमार चौबे की बेबाक टिप्पणी
समारोह में पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने जेपी आंदोलन की पृष्ठभूमि से लेकर जेल की उन लोमहर्षक यातनाओं का मार्मिक वर्णन किया। उन्होंने बिहार के संदर्भ में एक ऐतिहासिक संस्मरण साझा करते हुए कहा कि वे स्वयं स्वर्गीय सुशील मोदी के साथ लोकनायक जयप्रकाश नारायण के पास छात्र आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार करने का आग्रह लेकर पहुँचे थे।
अश्विनी चौबे ने सीधे तौर पर हमला बोलते हुए कहा:
”आपातकाल केवल शासन चलाने की व्यवस्था नहीं थी, वह एक ‘परिवार’ की राजनीति और ‘वंशवाद’ के ढांचे को सुरक्षित रखने के लिए किया गया निर्मम प्रहार था। सत्ता जब जनता की आवाज से डरती है, तो वह सबसे पहले अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलती है।”
उन्होंने केंद्र और राज्य शिक्षा बोर्डों से मांग की कि पाठ्यक्रम में आपातकाल पर एक पृथक अध्याय जोड़ा जाए। उन्होंने तर्क दिया कि यदि युवाओं को यह नहीं बताया गया कि लोकतंत्र को बचाने के लिए कितनी जेलें भरी गईं और कितने परिवार बिखरे, तो उनका लोकतांत्रिक बोध अधूरा रह जाएगा।
इंद्रेश कुमार का वैचारिक प्रहार: अहिंसा की नई परिभाषा
संघ विचारक इंद्रेश कुमार ने स्वतंत्रता संग्राम और लोकतंत्र बचाओ आंदोलन (1975) की तुलना करते हुए एक बड़ा प्रश्न खड़ा किया। उन्होंने कहा कि जिस आजादी के आंदोलन के अंत में 15 लाख लोग मारे गए और देश का विभाजन हुआ, उसे ‘पूर्णतः अहिंसक’ कहना इतिहास का सही मूल्यांकन नहीं है। इसके विपरीत, 1975 के लोकतंत्र सेनानियों का आंदोलन ‘एकपक्षीय अहिंसा’ का अद्वितीय उदाहरण था। सेनानियों ने क्रूर यातनाएं सहीं, लेकिन कभी हिंसक प्रतिकार नहीं किया। इसी धैर्य ने इस आंदोलन को नैतिक ऊँचाई प्रदान की।
70 साल के ‘जवान’ और ‘लोक-प्रहरी’ संतानों का जोश
महोत्सव का सबसे भावुक दृश्य वह था जब 70 वर्ष से अधिक आयु के मीसाबंदियों ने अपनी शारीरिक सीमाओं को दरकिनार कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। जो सेनानी स्वास्थ्य कारणों से नहीं आ सके, उन्होंने अपनी संतानों को “लोक-प्रहरी” के रूप में भेजा। यह इस बात का प्रतीक बना कि लोकतंत्र की रक्षा की मशाल अब अगली पीढ़ी के हाथों में सौंप दी गई है।
पूर्व सांसद कैलाश सोनी ने कहा कि लोकतंत्र सेनानियों का सम्मान वास्तव में लोकतंत्र की गरिमा का सम्मान है। वहीं पूर्व विधायक दुर्गा प्रसाद सिंह ने “यूथ फॉर डेमोक्रेसी” जैसे अभियानों के जरिए युवाओं को जोड़ने की वकालत की।
VOB का नजरिया: क्या बिहार की तर्ज पर दिल्ली भी देगी सम्मान?
’द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) का मानना है कि बिहार उन राज्यों में अग्रणी रहा है जिसने जेपी सेनानियों को न केवल सम्मान दिया बल्कि पेंशन और अन्य सुविधाएं भी सुनिश्चित कीं। आज दिल्ली के मंच से अश्विनी चौबे और इंद्रेश कुमार ने जो मांग उठाई है, वह तार्किक है।
- इतिहास की शुचिता: इतिहास केवल विजेताओं या एक परिवार की गाथा नहीं होनी चाहिए। आपातकाल का सच कड़वा जरूर है, लेकिन लोकतंत्र के भविष्य के लिए यह एक ‘कड़वी दवा’ की तरह सिलेबस में होना चाहिए।
- दिल्ली का दोहरा रवैया: जब 15 राज्य अपने लोकतंत्र सेनानियों को मान्यता दे सकते हैं, तो देश की राजधानी दिल्ली में उन्हें हाशिए पर क्यों रखा गया है?
- सुशील मोदी की याद: बिहार की राजनीति के ध्रुवतारे स्वर्गीय सुशील मोदी का इस आंदोलन में जो योगदान रहा, उसे राष्ट्रीय स्तर पर याद करना बिहार के गौरव को बढ़ाता है।
समारोह के समापन पर राजन ढींगरा के संगठनात्मक प्रयासों की सराहना की गई, जिन्होंने देशभर के इन ‘जीवंत इतिहास’ के नायकों को एक मंच पर लाने का सफल प्रयास किया।
निष्कर्ष: लोकतंत्र की मशाल जलती रहनी चाहिए
’लोकतंत्र विजय महोत्सव’ केवल एक सभा नहीं, बल्कि उन लोगों का कृतज्ञता ज्ञापन था जिन्होंने जेल की सलाखों के पीछे रहकर हमारे ‘बोलने के अधिकार’ को जिंदा रखा। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ इन सभी सेनानियों के जज्बे को नमन करता है।


