पटना: बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राज्य सरकार द्वारा कई आयोगों और समितियों का गठन तो किया गया, लेकिन जमीनी स्तर पर ये संस्थाएं अब तक सक्रिय नहीं हो सकी हैं। हालात ऐसे हैं कि कई आयोगों के अध्यक्ष और सदस्य न तो वेतन पा रहे हैं और न ही उन्हें कार्यालय या बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। कुछ आयोगों में तो अध्यक्ष के बैठने तक की व्यवस्था नहीं है।
7 महीने से बिना कार्यालय के आयोग
बिहार राज्य उद्यमी एवं व्यवसायी आयोग के अध्यक्ष सुरेश रूंगटा पिछले सात महीने से आयोग के लिए निर्धारित कार्यालय के बिना काम कर रहे हैं। मजबूरी में उन्हें बीजेपी कार्यालय में बैठना पड़ रहा है। आयोग के गठन की अधिसूचना जारी होने के बावजूद अब तक न दफ्तर मिला है और न ही अध्यक्ष या सदस्यों के वेतन की व्यवस्था हो सकी है।
23 जून 2025 को हुआ था आयोग का गठन
राज्य में औद्योगीकरण और रोजगार सृजन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बिहार सरकार ने 23 जून 2025 को बिहार राज्य उद्यमी एवं व्यवसायी आयोग का गठन किया था। सुरेश रूंगटा को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया गया था, लेकिन सात महीने बीत जाने के बावजूद आयोग पूरी तरह से सक्रिय नहीं हो सका है।
सुरेश रूंगटा ने कहा,
“पार्टी ने अच्छी सोच के साथ आयोग का गठन किया है। सरकार इस दिशा में काम भी कर रही है। फिलहाल हमारे लिए ऑफिस और अन्य सुविधाओं की व्यवस्था नहीं हो सकी है। उम्मीद है कि जल्द ही सरकार निर्णय लेगी और हम बेहतर तरीके से काम कर पाएंगे।”
नागरिक परिषद की एक भी बैठक नहीं
इसी तरह बिहार राज्य नागरिक परिषद का गठन भी 23 जून 2025 को किया गया था। इस परिषद के अध्यक्ष मुख्यमंत्री होते हैं, जबकि राज्यपाल इसके संरक्षक हैं। परिषद में 2 उपाध्यक्ष, 7 महासचिव और 21 सदस्य सहित कुल 32 पदाधिकारी शामिल हैं, लेकिन सात महीने बीत जाने के बावजूद एक भी बैठक आयोजित नहीं हो सकी है।
7 महीने से वेतन का इंतजार
नागरिक परिषद में शामिल एनडीए कार्यकर्ताओं को अब तक वेतन-भत्ता और अन्य सुविधाएं नहीं मिल पाई हैं। अन्य आयोगों में जहां सदस्यों को एक लाख रुपये से अधिक का वेतन मिलता है, वहीं नागरिक परिषद के सदस्यों का वेतन 30 हजार रुपये निर्धारित है, जो अब तक भुगतान नहीं किया गया है।
नागरिक परिषद के सदस्य सीताराम पांडे ने कहा,
“चुनाव से पहले हमें परिषद में जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन अब तक किसी बैठक में शामिल नहीं हो सके हैं। चुनावी व्यस्तता के कारण वेतन-भत्ता और सुविधाएं बहाल नहीं हो सकीं। उम्मीद है कि जल्द ही सभी समस्याओं का समाधान होगा।”
20 सूत्री कमेटी भी निष्क्रिय
चुनाव से पहले राज्य में 20 सूत्री कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति का भी गठन किया गया था, जिसमें एनडीए के कई नेताओं को शामिल किया गया। इस समिति में मुख्यमंत्री अध्यक्ष होते हैं, जबकि कार्यकारी अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और दर्जनों सदस्य नियुक्त किए जाते हैं। हालांकि, इन पदाधिकारियों को भी अब तक किसी तरह की सुविधा या अधिकार नहीं मिल पाए हैं।
सीएम के इस्तीफे के साथ भंग हुई समितियां
राजनीतिक विश्लेषक डॉ. संजय कुमार के अनुसार, जिन समितियों और आयोगों के अध्यक्ष मुख्यमंत्री होते हैं, उनका अस्तित्व मुख्यमंत्री के इस्तीफे के साथ ही समाप्त हो जाता है।
डॉ. संजय कुमार ने कहा,
“जिन समितियों या आयोगों के अध्यक्ष मुख्यमंत्री नीतीश कुमार थे, वे उनके इस्तीफे के साथ भंग हो गईं। नई सरकार के गठन के बाद इन्हें दोबारा सक्रिय करने के लिए सरकार को नई अधिसूचना जारी करनी होगी। इसके बाद ही पदाधिकारियों को आधिकारिक रूप से बहाल किया जा सकेगा।”
सरकार के लिए बढ़ी चुनौती
चुनाव से पहले गठित आयोगों और समितियों का इस तरह निष्क्रिय रहना सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है। अब देखना होगा कि नई सरकार कब तक इन संस्थाओं को दोबारा सक्रिय कर उन्हें आवश्यक संसाधन और अधिकार देती है।


