वर्दी का रौब या मर्यादा की धज्जियां? भिट्ठा थानाध्यक्ष का गाली देते वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल, न्याय मांगने आई विधवा से अभद्रता पर भड़के एसपी

  • ​सीतामढ़ी जिले के भिट्ठा थाने में तैनात थानाध्यक्ष मनोज कुमार का एक शर्मनाक वीडियो इंटरनेट की दुनिया में तेजी से प्रसारित हो रहा है, जिसमें वे फरियादियों के साथ बेहद अभद्र भाषा का प्रयोग करते नजर आ रहे हैं।
  • ​मामला एक संदिग्ध हत्या के प्रकरण से जुड़ा है, जहां न्याय की गुहार लगाने पहुंची एक बेबस महिला और उसके परिजनों को सांत्वना देने के बजाय थानेदार ने अपनी कुर्सी की हनक में गालियों की बौछार कर दी।
  • ​वायरल वीडियो में सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जब थानाध्यक्ष गालियां दे रहे थे, तब उनके बगल में बैठी एक महिला दारोगा पूरे घटनाक्रम को मूकदर्शक बनकर देखती रही, जिससे पुलिस की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
  • ​सीतामढ़ी के एसपी अमित रंजन ने मामले की गंभीरता को भांपते हुए पुपरी के एसडीपीओ को विस्तृत जांच का जिम्मा सौंपा है और स्पष्ट कर दिया है कि अनुशासनहीनता किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
  • ​पीड़ित महिला ने आरोप लगाया है कि पुलिस आरोपियों को बचाने का प्रयास कर रही है और उन पर सादे कागज पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है।

सीतामढ़ी (द वॉयस ऑफ बिहार)।

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और खाकी की साख पर लगा गहरा धब्बा

बिहार की पुलिसिंग को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन सीतामढ़ी के भिट्ठा थाने से जो तस्वीर सामने आई है, वह खाकी की छवि को धूमिल करने वाली है। वायरल वीडियो में थानाध्यक्ष मनोज कुमार जिस अंदाज में अपनी मेज पर हाथ पटकते और फरियादियों को गालियां देते दिख रहे हैं, वह किसी सभ्य समाज की पुलिस का आचरण नहीं हो सकता। पुलिस जिसे जनता का रक्षक माना जाता है, वहां न्याय की उम्मीद में आई एक विधवा को जिस तरह के मानसिक उत्पीड़न से गुजरना पड़ा, उसने जिले के पुलिस महकमे में हड़कंप मचा दिया है। यह वीडियो उस वक्त का बताया जा रहा है जब एक हत्या के मामले में परिजन थानेदार से उचित कार्रवाई की मांग कर रहे थे। लेकिन थानाध्यक्ष ने अपने पद की गरिमा को दरकिनार करते हुए मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दीं।

हत्या की गुत्थी: बारात जाने के बहाने बुलावा और फिर संदिग्ध मौत

इस पूरे विवाद की जड़ एक बेहद दुखद घटना में छिपी है। चोरौत थाना क्षेत्र के वार्ड 11 की निवासी अनिता देवी के लिए 13 मार्च की रात किसी काल से कम नहीं थी। अनिता देवी के अनुसार, उसी रात गांव के ही तीन व्यक्ति—सुशील हाथी, सरोज हाथी और महेश्वर हाथी—उनके पति को बारात जाने के बहाने घर से बुलाकर ले गए थे। परिजनों को लगा कि वे खुशियों में शामिल होने जा रहे हैं, लेकिन 14 मार्च की सुबह जो खबर आई उसने पूरे परिवार को उजाड़ दिया। भिट्ठा थाना क्षेत्र में सड़क किनारे उनके पति का बेजान शरीर मिला। अनिता देवी का दावा है कि यह कोई सामान्य मृत्यु नहीं है, बल्कि उनके पति के शरीर पर चोट के निशान इस बात की गवाही दे रहे थे कि उन्हें बेरहमी से पीटा गया है। इसके पीछे की मुख्य वजह एक पुराना जमीन विवाद बताया जा रहा है, जिसे सुलझाने के बजाय आरोपियों ने हत्या का खूनी रास्ता चुना।

सादे कागज पर हस्ताक्षर और खाकी की डरावनी ‘कार्यशैली’

जब अनिता देवी न्याय की आस लेकर भिट्ठा थाने पहुंचीं, तो उन्हें वहां जिस अनुभव से गुजरना पड़ा, वह हत्या के दुख से भी ज्यादा गहरा घाव देने वाला था। एसपी को दिए गए अपने मार्मिक आवेदन में अनिता देवी ने आरोप लगाया है कि थानाध्यक्ष मनोज कुमार ने उनकी एफआईआर दर्ज करने के बजाय उन पर एक सादे कागज पर हस्ताक्षर करने का अनैतिक दबाव बनाया। जब एक अनपढ़ या कम पढ़ी-लिखी महिला ने अपनी सजगता दिखाते हुए इस पर आपत्ति जताई, तो थानाध्यक्ष का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने न केवल महिला को अपशब्द कहे, बल्कि उसे धमकाते हुए उसका वीडियो भी बनाया और अंततः डरा-धमकाकर जबरन हस्ताक्षर करा लिए। पुलिस स्टेशन के भीतर एक महिला के साथ इस तरह का व्यवहार प्रशासनिक संवेदनशीलता की पोल खोलने के लिए काफी है।

वायरल वीडियो: जब ‘मैडम’ बनी रहीं खामोश गवाह

सोशल मीडिया पर जो क्लिप वायरल हो रही है, उसमें थानाध्यक्ष मनोज कुमार अपनी आधिकारिक कुर्सी पर आसीन हैं। उनके बोलने का लहजा किसी अपराधी को सुधारने वाला नहीं, बल्कि खुद एक उद्दंड व्यक्ति जैसा प्रतीत हो रहा है। वीडियो में दिख रहा है कि वे लोगों को खुलेआम गालियां दे रहे हैं। इसी फ्रेम में उनके ठीक बगल वाली कुर्सी पर एक महिला दारोगा भी बैठी नजर आ रही हैं। पूरी घटना के दौरान उनकी खामोशी सबसे ज्यादा खलने वाली है। एक महिला अधिकारी होने के नाते क्या उनका यह कर्तव्य नहीं था कि वे अपने वरिष्ठ या सहकर्मी को एक महिला फरियादी के साथ इस तरह के दुर्व्यवहार से रोकतीं? यह खामोशी उस सांठगांठ या व्यवस्था का संकेत देती है जहां पुलिसकर्मी एक-दूसरे की गलतियों पर पर्दा डालने को ही अपना धर्म मान लेते हैं।

थानेदार का बचाव: “भीड़ ने बनाया था दबाव”

जब इस वायरल वीडियो और आरोपों के बारे में थानाध्यक्ष मनोज कुमार से उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई, तो उन्होंने पूरी तरह से रक्षात्मक रुख अपनाया। मनोज कुमार ने अपने ऊपर लगे आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि थाने पर 15-20 लोगों का एक उग्र समूह पहुंचा था। उनका दावा है कि इन लोगों ने थाने के कामकाज को बाधित करने की कोशिश की और पुलिसकर्मियों के साथ अभद्र व्यवहार किया। थानेदार के अनुसार, उन्होंने केवल स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कड़े लहजे का इस्तेमाल किया था। हालांकि, वायरल वीडियो में उनकी मुद्रा और भाषा किसी दबाव में की गई कार्रवाई के बजाय सत्ता के अहंकार का प्रदर्शन अधिक लग रही है।

एसपी अमित रंजन का कड़ा रुख: पुपरी एसडीपीओ को मिली जांच की कमान

सीतामढ़ी के पुलिस अधीक्षक अमित रंजन ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया है। वीडियो के प्रसारित होने और जनमानस में बढ़ते आक्रोश को देखते हुए उन्होंने पुपरी के एसडीपीओ (अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी) को पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच करने का आदेश दिया है। एसपी ने स्पष्ट किया है कि वीडियो की सत्यता की जांच कराई जा रही है और यदि इसमें थानाध्यक्ष की संलिप्तता और उनकी अभद्र भाषा की पुष्टि होती है, तो उन पर विभागीय स्तर पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। पुलिस प्रशासन का कहना है कि वे इस मामले में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करेंगे ताकि जनता का पुलिस पर से भरोसा न उठे।

विधवा की गुहार: “आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं, हमें जान का खतरा है”

अनिता देवी का दर्द केवल पुलिस की बदसलूकी तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि जिन तीन लोगों पर उन्होंने हत्या का आरोप लगाया है, वे आज भी खुलेआम घूम रहे हैं और उन्हें व उनके परिवार को केस वापस लेने के लिए डरा-धमका रहे हैं। पीड़िता का आरोप है कि पुलिस आरोपियों को गिरफ्तार करने के बजाय उन्हें ही प्रताड़ित कर रही है। उन्होंने एसपी से मांग की है कि मामले की एफआईआर को सही धाराओं में दर्ज किया जाए, आरोपियों की तुरंत गिरफ्तारी हो और भिट्ठा थाने के लापरवाह थानाध्यक्ष पर कड़ी कार्रवाई की जाए ताकि उन्हें और उनके बच्चों को न्याय मिल सके।

निष्कर्ष: पुलिसिया व्यवस्था में सुधार की दरकार

भिट्ठा थाने की यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर पुलिस और जनता के बीच की खाई क्यों बढ़ती जा रही है। क्या एक थानेदार का काम केवल कानून लागू करना है या पीड़ित की बात को सहानुभूति के साथ सुनना भी? यदि न्याय के मंदिर (थाने) में ही गालियां और धमकियां मिलेंगी, तो आम आदमी अपनी फरियाद लेकर कहां जाएगा? मनोज कुमार का वायरल वीडियो अब केवल एक जांच का विषय नहीं है, बल्कि यह बिहार पुलिस के लिए आत्ममंथन का समय है। द वॉयस ऑफ बिहार इस मामले की जांच प्रक्रिया और एसडीपीओ की रिपोर्ट पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है, ताकि न्याय की इस लड़ाई में सत्य की जीत हो सके।

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