HIGHLIGHTS: वर्दी के पीछे की संवेदना, जब आंसू खुशियों में बदल गए
- बड़ी कामयाबी: मध्य प्रदेश के सीधी जिले का छोटू कौल, जो 3 साल पहले वाराणसी से गायब हुआ था, बक्सर में सुरक्षित मिला।
- पुलिस की तत्परता: डुमरांव थानाध्यक्ष संजय कुमार सिन्हा की सूझबूझ से मानसिक रूप से अस्वस्थ युवक की हुई पहचान।
- भावुक पुनर्मिलन: भाई पंकज कौल गुरुवार को डुमरांव पहुंचे; सालों से बिछड़े भाई को देख रो पड़ा परिवार।
- सामाजिक संदेश: संदिग्ध मानकर पीटने के बजाय पुलिस ने ‘मानवीय गरिमा’ के साथ युवक को दी शरण।
📊 बिछड़े रिश्ते की ‘फाइल’ रिकॉर्ड: छोटू की घर
वापसी
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विवरण |
जानकारी |
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नाम एवं उम्र |
छोटू कौल (27 वर्ष) |
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निवासी |
ग्राम रामपुर, जिला सीधी (मध्य प्रदेश) |
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लापता होने की जगह |
वाराणसी (फल विक्रेता के रूप में कार्यरत थे) |
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लापता अवधि |
लगभग 3 वर्ष (36 महीने) |
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बरामदगी स्थल |
बंझू डेरा, डुमरांव (बक्सर) |
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प्रमुख भूमिका |
थानाध्यक्ष संजय कुमार सिन्हा एवं टीम |
बक्सर (डुमरांव) | 19 मार्च, 2026
अक्सर पुलिस की छवि सख्त और अनुशासन वाली होती है, लेकिन बक्सर जिले के डुमरांव थाने से जो तस्वीर सामने आई है, उसने ‘खाकी’ के प्रति सम्मान को और बढ़ा दिया है। तीन साल पहले मध्य प्रदेश के एक घर का चिराग वाराणसी की गलियों में कहीं खो गया था, जो आज डुमरांव पुलिस की ‘सेंसिटिविटी’ के कारण अपने भाई के गले लग सका।
वाराणसी के फल ठेले से बक्सर की गलियों तक का ‘भटकाव’
छोटू कौल रोजगार की तलाश में वाराणसी गया था। सब कुछ ठीक चल रहा था, वह फल का ठेला लगाकर अपने परिवार का सहारा बन रहा था, लेकिन अचानक बिगड़ी दिमागी हालत ने उसे अपनों से दूर कर दिया।
- संदेह और सुरक्षा: बुधवार रात जब वह बंझू डेरा के पास संदिग्ध हालत में घूम रहा था, तो ग्रामीणों की सूचना पर पुलिस ने उसे ‘अपराधी’ नहीं, बल्कि एक ‘मरीज’ की तरह संभाला।
- पहचान की मशक्कत: मानसिक रूप से अस्थिर होने के कारण वह बार-बार अपना नाम बदल रहा था, लेकिन थानाध्यक्ष संजय कुमार सिन्हा ने धैर्य नहीं खोया और आखिरकार उसके घर का सुराग ढूंढ निकाला।
“पुलिस न होती तो शायद भाई कभी न मिलता” — पंकज कौल
गुरुवार सुबह जब छोटू का भाई पंकज डुमरांव पहुंचा, तो उसकी आंखों में कृतज्ञता के आंसू थे। कागजी कार्यवाही पूरी करने के बाद जब वह अपने भाई को घर ले जाने लगा, तो उसने डुमरांव पुलिस की तत्परता को कोटि-कोटि धन्यवाद दिया।
VOB का नजरिया: क्या ‘कम्युनिटी पुलिसिंग’ ही है असली सुरक्षा?
डुमरांव की यह घटना समाज के लिए एक बड़ा सबक है। अक्सर मानसिक रूप से बीमार लोगों को ‘बच्चा चोर’ या ‘पागल’ कहकर प्रताड़ित किया जाता है, लेकिन यहाँ की पुलिस ने यह साबित किया कि अगर ‘वर्दी’ संवेदनशील हो, तो बिछड़े हुए परिवार फिर से बस सकते हैं। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ का मानना है कि थानाध्यक्ष संजय कुमार सिन्हा और उनकी टीम ने जो धैर्य दिखाया, वह बिहार पुलिस के लिए एक ‘मॉडल’ होना चाहिए। आज एक मां का तीन साल का इंतजार खत्म हुआ है, और इसका श्रेय पुलिस की उस ‘जासूसी’ को जाता है जो किसी मुजरिम को नहीं, बल्कि एक खोए हुए इंसान को ढूंढने के लिए की गई।


