
HIGHLIGHTS
- दुखद खबर: लेह-लद्दाख के सियाचिन ग्लेशियर में तैनात अग्निवीर मनीष कुमार की इलाज के दौरान मौत।
- महार रेजिमेंट के जांबाज: 2023 में भारतीय सेना में अग्निवीर के रूप में भर्ती हुए थे मनीष।
- इलाके में शोक: पश्चिम चंपारण के नवलपुर (योगापट्टी) में परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल।
- अंतिम सांस: कारगिल आर्मी अस्पताल में इलाज के दौरान शुक्रवार शाम को ली आखिरी सांस।
योगापट्टी (पश्चिम चंपारण) | 15 मार्च, 2026
देश की सुरक्षा के लिए सबसे कठिन मोर्चे सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात बिहार के एक और वीर सपूत ने अपनी जान न्यौछावर कर दी है। पश्चिम चंपारण के योगापट्टी प्रखंड अंतर्गत नवलपुर के रहने वाले 21 वर्षीय अग्निवीर मनीष कुमार अब हमारे बीच नहीं रहे। शुक्रवार शाम जब उनकी शहादत की खबर गांव पहुँची, तो पूरे इलाके में सन्नाटा पसर गया। मोहन प्रसाद के पुत्र मनीष भारतीय सेना की महार रेजिमेंट में तैनात थे और लेह-लद्दाख की शून्य से नीचे वाली हाड़ कंपा देने वाली ठंड के बीच देश की सरहदों की हिफाजत कर रहे थे।
देश सेवा का सपना: 2 साल पहले ही पहनी थी वर्दी
मनीष कुमार के भाई सुमित कुमार ने बताया कि मनीष का सपना हमेशा से सेना में जाकर देश की सेवा करना था। साल 2023 में उनका चयन अग्निवीर के रूप में हुआ था। ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्हें दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्र सियाचिन में तैनात किया गया था। महज 21 साल की उम्र में मनीष ने जो जज्बा दिखाया, उसने नवलपुर के हर घर को गौरवान्वित किया है, लेकिन इस असमय बिछोह ने पूरे परिवार को तोड़कर रख दिया है।
कारगिल अस्पताल में चला इलाज, नहीं बच सकी जान
मिली जानकारी के अनुसार, सियाचिन की कठिन परिस्थितियों के कारण मनीष की तबीयत बिगड़ गई थी। उन्हें तुरंत कारगिल आर्मी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहाँ डॉक्टरों की टीम ने उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की। हालांकि, शुक्रवार की शाम मनीष जिंदगी की जंग हार गए। मनीष की मौत की खबर मिलते ही उनके घर पर लोगों का तांता लगा हुआ है। पिता मोहन प्रसाद और अन्य परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है, पूरा गांव अपने वीर बेटे के पार्थिव शरीर का इंतजार कर रहा है।
VOB का नजरिया
सियाचिन जैसे दुर्गम क्षेत्रों में तैनात होना किसी सामान्य साहस की बात नहीं है। वहाँ दुश्मन से ज्यादा ‘प्रकृति’ और ‘हाड़ कंपा देने वाली ठंड’ से लड़ना पड़ता है। मनीष जैसे युवा अग्निवीर अपनी जान की परवाह किए बिना उन ऊंचाइयों पर तिरंगा थामे खड़े हैं। महज 21 साल की उम्र में देश के लिए प्राणों की आहुति देना मनीष की वीरता को दर्शाता है। सरकार और प्रशासन को चाहिए कि शहीद के परिवार को हर संभव सम्मान और आर्थिक सहायता तुरंत सुनिश्चित की जाए। मनीष का बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्रभक्ति की मिसाल बना रहेगा।


