नई दिल्ली:सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के लिए लाई गई UGC की नियमावली 2026 पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। अब फिलहाल 2012 के पुराने नियम ही लागू रहेंगे।
यह आदेश प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की पीठ ने कई रिट याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि नए नियम सामान्य श्रेणी के छात्रों के साथ भेदभाव करते हैं और इससे परिसरों में जातिगत विभाजन बढ़ेगा।
“क्या हम उल्टी दिशा में जा रहे हैं?” – सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा—
“हमें जातिविहीन समाज की ओर बढ़ना चाहिए। जिन्हें संरक्षण चाहिए, उनके लिए व्यवस्था होनी चाहिए, लेकिन समाज को बांटने की कीमत पर नहीं।”
पीठ ने कहा कि नए नियमों का दुरुपयोग होने की पूरी संभावना है और इससे संस्थानों में विभाजन की स्थिति पैदा हो सकती है।
अमेरिका जैसी व्यवस्था नहीं चाहते – कोर्ट
कोर्ट ने कहा—
“हम उस रास्ते पर नहीं जाना चाहते, जहां स्कूलों और संस्थानों को जातियों के आधार पर बांट दिया जाए, जैसा कि अमेरिका में कभी श्वेत और अश्वेत स्कूलों के रूप में हुआ था। भारत में शिक्षा को एकता का प्रतीक होना चाहिए।”
“अलग हॉस्टल बनाना खतरनाक” – CJI
CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट कहा—
“आप अलग हॉस्टल बनाने की बात कर रहे हैं। ऐसा बिल्कुल मत कीजिए। हमने जातिविहीन समाज की दिशा में जो प्रगति की है, क्या अब हम उससे पीछे जाना चाहते हैं?”
उन्होंने रैगिंग को संस्थानों का सबसे जहरीला संकट बताया और कहा कि इससे छात्रों में वैमनस्य बढ़ता है।
आरक्षित वर्गों के भीतर भी असमानता – कोर्ट
CJI ने यह भी कहा कि अब यह स्पष्ट है कि आरक्षित समुदायों के भीतर भी सक्षम और वंचित वर्ग हैं।
उन्होंने कहा—
“कुछ समुदाय दूसरों की तुलना में अधिक लाभ उठा रहे हैं। नीति निर्माताओं को इसे संतुलित तरीके से देखना होगा।”
याचिकाकर्ताओं की दलील
अधिवक्ता मृत्युंजय तिवारी, विनीत जिंदल और राहुल दीवान द्वारा दायर याचिकाओं में कहा गया कि—
- नए नियम योग्यता और समानता के संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं
- सामान्य श्रेणी के छात्रों के अवसर सीमित होंगे
- यह नीति समावेशी नहीं बल्कि एक वर्ग विशेष के पक्ष में झुकी हुई है
केंद्र सरकार को नोटिस, 19 मार्च को अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
इस मामले पर 19 मार्च को अगली सुनवाई होगी।
यह फैसला देश की उच्च शिक्षा नीति को लेकर एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। अब सबकी नजर केंद्र सरकार के जवाब और सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय पर टिकी है।


