​गंगा की लहरों में ‘अकाल मृत्यु’ पर प्रहार: जीवन जागृति सोसाइटी ने सबौर के बाबूपुर घाट को किया सुरक्षित

सबौर/भागलपुर। बिहार के भागलपुर जिले में गंगा नदी का तट जहाँ एक ओर आस्था और आध्यात्म का केंद्र है, वहीं दूसरी ओर यह अनगिनत परिवारों के लिए ‘आंसुओं का सागर’ भी बन चुका है। भागलपुर के सबौर प्रखंड अंतर्गत बाबूपुर घाट पर हर साल डूबने से होने वाली मौतों के आंकड़े प्रशासन की फाइलों में दबकर रह जाते हैं, लेकिन एक सामाजिक संगठन ने इस त्रासदी को रोकने के लिए अपनी कमर कस ली है। ‘जीवन जागृति सोसाइटी’ नामक सामाजिक संगठन ने रविवार को बाबूपुर घाट पर बांस की बैरिकेडिंग (सुरक्षा घेरा) लगाकर एक नई मिसाल पेश की है। यह पहल केवल एक भौतिक अवरोध नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था को एक कड़ा संदेश है जो मौतों के बाद मुआवजा तो बांटती है, लेकिन जान बचाने के पुख्ता इंतजाम करने में विफल रही है। 5 अप्रैल 2026 की यह कार्रवाई सबौर के स्थानीय लोगों के लिए एक बड़ी राहत बनकर आई है, जहाँ अब लोग कम से कम इस भरोसे के साथ स्नान कर सकेंगे कि उनके पैर मौत की गहराई की ओर नहीं बढ़ेंगे।

बांस की दीवार और ‘पुण्य’ की सुरक्षा: क्या है यह पहल?

​बाबूपुर घाट पर आयोजित एक सादे लेकिन प्रभावी कार्यक्रम में जीवन जागृति सोसाइटी के सदस्यों ने कड़ी धूप के बीच गंगा की लहरों के बीच बांस गाड़कर एक सुरक्षा घेरा तैयार किया। इस घेरे का मुख्य उद्देश्य स्नान करने आने वाले श्रद्धालुओं को यह संकेत देना है कि इसके आगे जाना खतरे से खाली नहीं है।

​संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष अजय कुमार सिंह ने इस मौके पर एक बेहद मार्मिक और कड़वी सच्चाई को उजागर किया। उन्होंने कहा कि जब कोई परिवार अपने किसी लाडले, घर के मुखिया या अपनी बहु-बेटियों को पुण्य प्राप्ति के लिए गंगा स्नान पर भेजता है, तो उसकी उम्मीदें केवल आस्था से जुड़ी होती हैं। लेकिन जब गंगा जल के स्थान पर उस व्यक्ति का मृत शरीर घर आता है, तो उस परिवार पर क्या बीतती है, इसका अंदाजा शब्दों में नहीं लगाया जा सकता। अजय कुमार सिंह के अनुसार, इसी पीड़ा को कम करने के लिए उनकी संस्था ‘अकाल मृत्यु’ को रोकने के मिशन पर काम कर रही है। उनके लिए बैरिकेडिंग केवल लकड़ी का ढांचा नहीं, बल्कि जीवन की रक्षा का एक संकल्प है।

सरकार का ‘मुआवजा तंत्र’ बनाम ‘निवारण मॉडल’ (विशेष विश्लेषण)

द वॉयस ऑफ बिहार के विशेष विश्लेषण के अनुसार, बिहार में हर साल डूबकर मरने वालों की संख्या सैकड़ों में होती है और सरकार प्रत्येक मृतक के परिवार को चार लाख रुपये का मुआवजा देती है। लेकिन जीवन जागृति सोसाइटी ने इस व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा किया है।

  1. मुआवजा नहीं, सुरक्षा चाहिए: अजय कुमार सिंह ने सरकार से सीधा अनुरोध किया कि सरकार हर साल मुआवजे के रूप में करोड़ों रुपये खर्च करती है। यदि उस राशि का एक तिहाई हिस्सा भी सभी घाटों पर स्थायी या अस्थायी सुरक्षा बैरिकेडिंग और गोताखोरों की तैनाती पर खर्च किया जाए, तो यह त्रासदी काफी हद तक रुक सकती है।
  2. आम दिनों की उपेक्षा: सरकार आमतौर पर केवल बड़े त्योहारों जैसे छठ, कार्तिक पूर्णिमा या मुंडन संस्कारों के समय घाटों पर बैरिकेडिंग करती है। लेकिन हकीकत यह है कि गंगा स्नान एक दैनिक प्रक्रिया है और लोग सालों भर यहाँ आते हैं। ऐसे में ‘सीजनल बैरिकेडिंग’ के बजाय ‘सतत सुरक्षा’ की आवश्यकता है।

स्थानीय निगरानी समिति: सुरक्षा को बनाया ‘जन आंदोलन’

​जीवन जागृति सोसाइटी की इस पहल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उन्होंने केवल बांस गाड़कर काम खत्म नहीं किया, बल्कि इसकी सुरक्षा और प्रबंधन की जिम्मेदारी स्थानीय लोगों को सौंपी है। घाट पर डूबने की घटनाओं को रोकने के लिए एक ‘बचाव समिति’ का गठन किया गया है।

बचाव समिति के मुख्य चेहरे:

  • नवल कुमार मंडल (वार्ड सदस्य-1): इन्हें स्थानीय समिति का मुख्य सचेतक बनाया गया है।
  • गौरी शंकर पोद्दार, बजरंगी यादव, राजेंद्र मंडल और डब्लू कुमार (मुखिया प्रतिनिधि): ये सभी सदस्य घाट पर आने वाले लोगों की गतिविधियों पर नजर रखेंगे।
  • पूर्णजय सिंह: समिति के सक्रिय सदस्य के रूप में कार्य करेंगे।

​संस्था की योजना के अनुसार, घाट पर एक स्थानीय व्यक्ति को आर्थिक मदद देकर छोटी दुकान खुलवाई जाएगी और उसे एक ‘माइक’ दिया जाएगा। वह व्यक्ति दुकानदारी के साथ-साथ घाट पर लाउडस्पीकर के जरिए लोगों को बैरिकेडिंग का सम्मान करने और उससे छेड़छाड़ न करने की चेतावनी देगा। यह एक ‘सेल्फ-सस्टेनेबल’ मॉडल है जो बिना किसी सरकारी मदद के स्थानीय स्तर पर सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।

सतेंद्र कुमार की अपील: “सुनकर भूलना नहीं, रुकने तक लड़ना”

​संस्था के प्रदेश अध्यक्ष और जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (JLNMCH) के पैथोलॉजी विभागाध्यक्ष सतेंद्र कुमार ने इस अवसर पर कहा कि जीवन जागृति सोसाइटी किसी दुर्घटना की खबर सुनकर उसे भूलने में विश्वास नहीं रखती। उनके लिए खबर का मतलब एक्शन है। उन्होंने बताया कि अभी 15 दिन पहले बटेश्वर स्थान में बैरिकेडिंग की गई थी और बाबूपुर घाट इस अभियान का दूसरा पड़ाव है। सतेंद्र कुमार ने स्थानीय लोगों से भावुक अपील करते हुए कहा कि यह सुरक्षा घेरा उनकी अपनी संपत्ति है। इसे तोड़ना या नुकसान पहुँचाना अपनी ही जान से खिलवाड़ करने जैसा है। लोगों को स्वयं पुलिस की तरह काम करना होगा और बैरिकेडिंग से छेड़छाड़ करने वालों को रोकना होगा।

ग्रामीणों की आस: “अब बेखौफ नहाएंगे लोग”

​स्थानीय कमिटी के मुख्य सचेतक नवल कुमार मंडल ने अजय कुमार सिंह के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने जो सुना था, आज उसे धरातल पर देख भी लिया। वहीं गौरी शंकर पोद्दार ने इसे एक ‘सौगात’ बताते हुए कहा कि जो काम सरकार को प्राथमिकता के आधार पर करना चाहिए था, वह अजय कुमार सिंह और उनकी टीम कर रही है। बजरंगी यादव का मानना है कि घाट के सुरक्षित होने से यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या और बढ़ेगी, जिससे न केवल पुण्य मिलेगा बल्कि ग्रामीणों का मान-सम्मान भी बढ़ेगा। शुद्ध और निर्मल गंगा जल में अब लोग बिना किसी डर के डुबकी लगा सकेंगे।

सामाजिक संस्थाओं की बढ़ती भूमिका

​5 अप्रैल 2026 की यह घटना भागलपुर जिले के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है। जब तंत्र फेल होता है, तो समाज को खुद उठ खड़ा होना पड़ता है। अजय कुमार सिंह और सतेंद्र कुमार के नेतृत्व में जीवन जागृति सोसाइटी ने यह साबित कर दिया है कि अगर नीयत साफ हो, तो कम संसाधनों में भी बड़ी तबाही को रोका जा सकता है। बाबूपुर घाट पर लगा यह बांस का घेरा केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि उन सभी मृत आत्माओं को एक श्रद्धांजलि है जिन्होंने अनजाने में गंगा की गहराई में अपनी जान गंवाई।

द वॉयस ऑफ बिहार की टीम इस पहल का समर्थन करती है और उम्मीद करती है कि जिला प्रशासन इस ‘सबौर मॉडल’ से सीख लेकर अन्य खतरनाक घाटों पर भी ऐसी व्यवस्था करेगा। फिलहाल, बाबूपुर घाट अब सुरक्षित है और स्थानीय समिति अपनी नई जिम्मेदारी के साथ मुस्तैद है।

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