9 साल की नौकरी में दूसरी बार जेल जाएंगे स्टेनो प्रेम झा,पहले भी सृजन मामले गये थे जेल.. रिश्वतखोरी ने डुबोई लुटिया

  • भागलपुर समाहर्णालय के लिपिकीय संवर्ग के चर्चित आशुलिपिक प्रेम कुमार उर्फ प्रेम झा को निगरानी विभाग ने अपने ही सहकर्मी से 70 हजार रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार किया है।
  • ​नाथनगर के एमओ की सेवा संपुष्टि (Service Confirmation) के नाम पर घूस मांगने वाले प्रेम झा का विवादों से पुराना नाता रहा है; यह उनके सेवाकाल का दूसरा बड़ा ‘कलंक’ है।
  • ​कभी जिलाधिकारी के स्टेनो के तौर पर ‘सेकंड डीएम’ की हनक रखने वाले प्रेम झा ने बीडीओ, सीओ और यहां तक कि वरीय उप समाहर्ताओं पर भी अपना रौब झाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
  • ​कुख्यात सृजन घोटाले में भी प्रेम झा का नाम सामने आया था, जिसके चलते उन्हें बेऊर जेल की हवा खानी पड़ी थी, हालांकि सीबीआई की तकनीकी चूक के कारण वे उस समय बच निकले थे।
  • ​जेल से लौटने के बाद एक आईएएस अधिकारी ने उन्हें 6 महीने तक बिना काम के बिठाए रखा था, लेकिन सत्ता का मोह और भ्रष्टाचार की लत ने उन्हें फिर से उसी अंधेरी कोठरी के दरवाजे पर खड़ा कर दिया है।

भागलपुर (द वॉयस ऑफ बिहार)।

भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा: जब रक्षक ही बन गया भक्षक

भागलपुर जिला प्रशासन की साख पर एक बार फिर गहरा धब्बा लगा है। समाहर्णालय के गलियारों में अपनी हनक और रसूख के लिए जाने जाने वाले स्टेनो प्रेम कुमार उर्फ प्रेम झा की ‘ईमानदारी’ ने महज नौ साल के सेवाकाल में ही दम तोड़ दिया। सोमवार को निगरानी विभाग की कार्रवाई ने यह साबित कर दिया कि भ्रष्टाचार की जड़ें प्रशासन के भीतर कितनी गहराई तक जमी हुई हैं। मामला किसी आम नागरिक से जुड़ा नहीं था, बल्कि प्रेम झा ने अपने ही विभाग के एक अधिकारी (नाथनगर के एमओ) की सेवा संपुष्टि कराने के बदले 70 हजार रुपये की मांग कर डाली थी। रिश्वतखोरी के इस मामले में प्रेम ने नैतिकता की सभी हदें पार करते हुए अपने ही सहकर्मी की मजबूरी का फायदा उठाने की कोशिश की। रंगे हाथ पकड़े जाने के बाद अब प्रेम झा के माथे पर दूसरी बार जेल जाने का कलंक लग गया है, जो उनके प्रशासनिक करियर के अंत का संकेत दे रहा है।

‘सेकंड डीएम’ की हनक और अफसरों को हड़काने का दौर

प्रेम झा का भागलपुर कलेक्ट्रेट में एक समय ऐसा भी था जब उनकी ‘तूती’ बोलती थी। जब वे जिलाधिकारी के स्टेनो हुआ करते थे, तब उन्हें प्रशासनिक हलकों में ‘सेकंड डीएम’ के नाम से जाना जाता था। उनकी हनक ऐसी थी कि जिले के प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) और अंचलाधिकारी (CO) उनसे बात करने में भी कतराते थे। आरोप है कि प्रेम झा इन अधिकारियों को इस तरह हड़काते थे मानो वे उनके मातहत कर्मचारी हों। यहां तक कि वरीय उप समाहर्ता (SDC) स्तर के अधिकारी भी जिलाधिकारी तक अपनी फाइल पहुंचाने या समय लेने के लिए प्रेम झा के सामने मिन्नतें करते नजर आते थे। सत्ता के गलियारों में उनकी पहुंच और साहब के करीबी होने के अहंकार ने उन्हें निरंकुश बना दिया था। इसी शक्ति का दुरुपयोग उन्होंने धन उगाही और तबादला-पदस्थापन के खेल में भी बखूबी किया।

सृजन घोटाले का दाग और बेऊर जेल का सफर

प्रेम झा का आपराधिक इतिहास काफी पुराना और गहरा है। बिहार के सबसे बड़े वित्तीय घोटालों में से एक ‘सृजन घोटाला’ में जब जांच की आंच कलेक्ट्रेट तक पहुंची, तो प्रेम झा का नाम प्रमुखता से उभरा। उस वक्त सीबीआई ने उन पर शिकंजा कसा था और उन्हें गिरफ्तार कर पटना की बेऊर जेल भेज दिया गया था। जेल की सलाखों के पीछे उनकी सारी ‘हेकड़ी’ निकल गई थी। हालांकि, वे किस्मत के धनी और ‘जुगाड़’ के पक्के निकले। सीबीआई द्वारा निर्धारित समय सीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं किए जाने के कारण उन्हें जमानत मिल गई। बाद में, तकनीकी आधार पर उनका नाम मुख्य आरोपियों की सूची से हटा दिया गया और केस केवल शेष आरोपितों पर चलाया गया। इस राहत ने प्रेम झा को यह गुमान दे दिया कि वे कानून से भी बड़े हैं, और जेल से बाहर आते ही वे फिर से अपने पुराने ढर्रे पर लौट आए।

जब आईएएस अधिकारी ने सिखाया था ‘बिना काम’ का अनुशासन

वर्ष 2018 में जेल से रिहा होने के बाद जब प्रेम झा दोबारा ड्यूटी पर लौटे, तो उन्हें अनुमंडल पदाधिकारी (SDO) के कार्यालय में स्टेनो की जिम्मेदारी दी गई। उस समय वहां तैनात एक सख्त छवि वाले आईएएस अधिकारी ने प्रेम झा के अतीत को देखते हुए उन्हें कड़ा सबक सिखाने का निर्णय लिया। अधिकारी ने प्रेम झा को कोई भी फाइल या महत्वपूर्ण काम देने के बजाय केवल सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक एक कुर्सी पर चुपचाप बैठे रहने का आदेश दिया। करीब छह महीने तक प्रेम झा ने किसी ‘सजा’ की तरह इस आदेश का पालन किया। उस दौरान उनके पास न तो कोई मिलने आता था और न ही उनकी मेज पर कोई फाइल होती थी। प्रशासनिक हलकों में चर्चा थी कि प्रेम झा की शक्ति अब पूरी तरह खत्म हो चुकी है, लेकिन जैसे ही उस आईएएस अधिकारी का तबादला हुआ, प्रेम झा ने धीरे-धीरे फिर से अपनी पकड़ मजबूत करना शुरू कर दिया।

तीन एसडीओ के कार्यकाल में फिर से बढ़ा ‘पावर’ और बढ़ी ‘लालच’

आईएएस अधिकारी के जाने के बाद जैसे-जैसे एसडीओ बदलते गए, प्रेम झा ने अपनी चपलता और फाइलों के ज्ञान के दम पर नए अधिकारियों का विश्वास जीतना शुरू कर दिया। पिछले तीन एसडीओ के कार्यकाल के दौरान वे फिर से अपने पुराने ‘फॉर्म’ में आ गए। उन्हें आपूर्ति शाखा जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभालने का मौका मिला, जहां भ्रष्टाचार की संभावनाएं अधिक होती हैं। अधिकारियों के करीब होने के कारण उनका दबदबा फिर से बढ़ने लगा और इसी के साथ उनकी आर्थिक लालच भी बढ़ती गई। उन्होंने न केवल बाहरी लोगों बल्कि अपने विभाग के उन कर्मियों को भी नहीं बख्शा जिनकी फाइलें उनके माध्यम से आगे बढ़नी थीं। नाथनगर एमओ का मामला इसी लालच का परिणाम है, जहां उन्होंने सर्विस बुक अपडेशन और सेवा संपुष्टि जैसे नियमित कार्यों के लिए एक महीने की पगार के बराबर रिश्वत मांग ली।

सहयोगी मयंक की भूमिका और अनुकंपा वाली नौकरी पर सवाल

इस रिश्वतखोरी कांड में प्रेम झा के साथ मयंक नामक एक अन्य कर्मी का नाम भी जुड़ा है। मयंक की पृष्ठभूमि भी कम दिलचस्प नहीं है। पंचायत सेवक पिता की मृत्यु के बाद अनुकंपा पर सरकारी नौकरी पाने वाले मयंक की सेवा अभी बमुश्किल पांच साल की ही है, लेकिन इतने कम समय में ही उसने भ्रष्टाचार के गुर सीख लिए। मयंक का करियर तबादलों और विवादों से भरा रहा है। पूर्व में एसडीओ कार्यालय में रहते हुए किसी बड़ी गलती के कारण उसे डीआरडीए (DRDA) में प्रतिनियुक्त किया गया था। वहां से वह किसी तरह गोपनीय शाखा में पहुंचा और फिर से जुगाड़ लगाकर एसडीओ कार्यालय की आपूर्ति शाखा में पदस्थापित हो गया। मयंक और प्रेम झा की जोड़ी ने मिलकर कार्यालय के भीतर एक ऐसा तंत्र विकसित कर लिया था जहां बिना सुविधा शुल्क के कोई पत्ता नहीं हिलता था।

कलेक्ट्रेट की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल और भविष्य की कार्रवाई

प्रेम झा की दोबारा गिरफ्तारी ने भागलपुर जिला प्रशासन के भीतर पारदर्शिता के दावों की पोल खोल दी है। सवाल यह उठ रहा है कि जो व्यक्ति सृजन जैसे बड़े घोटाले में जेल जा चुका हो, उसे बार-बार महत्वपूर्ण और संवेदनशील पदों पर क्यों तैनात किया गया? क्या प्रशासन के पास ईमानदार लिपिकों की कमी है या फिर प्रेम झा जैसे लोगों को ऊपर से किसी रसूखदार का संरक्षण प्राप्त है? इस घटना के बाद कलेक्ट्रेट के अन्य कर्मचारी भी सकते में हैं। निगरानी विभाग की इस कार्रवाई से यह स्पष्ट संदेश गया है कि भ्रष्टाचार चाहे कितना भी पुराना और पहुंच वाला क्यों न हो, कानून की नजर से नहीं बच सकता। अब देखना यह होगा कि क्या इस बार भी प्रेम झा किसी तकनीकी खामी का फायदा उठाकर बच निकलेंगे या फिर यह ‘कलंक का टीका’ उनके करियर पर हमेशा के लिए लगा रहेगा।

निष्कर्ष: भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की जरूरत

भागलपुर के इस ‘प्रेम प्रसंग’ (भ्रष्टाचार वाला प्रेम) ने यह साबित कर दिया है कि सत्ता का नशा और धन की हवस इंसान को बार-बार अपराध की ओर धकेलती है। 9 साल की नौकरी में दो बार जेल जाना किसी भी सरकारी सेवक के लिए शर्मनाक है। जिला प्रशासन को अब कलेक्ट्रेट के भीतर ऐसे ‘दीमक’ की पहचान करनी होगी जो सरकारी तंत्र को खोखला कर रहे हैं। प्रेम झा की गिरफ्तारी केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं है, बल्कि यह उन सभी भ्रष्ट मानसकिता वाले कर्मियों के लिए एक चेतावनी है जो आम जनता और अपने सहकर्मियों का शोषण करते हैं। द वॉयस ऑफ बिहार इस मामले की कानूनी प्रगति और आगामी विभागीय कार्रवाई पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है, ताकि भ्रष्टाचार के खिलाफ इस लड़ाई को तार्किक अंजाम तक पहुंचाया जा सके।

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