गंगा की लहरों पर विदाई: विक्रमशिला सेतु बंद होने से भागलपुर में बदल गई शादी की तस्वीर

भागलपुर। बिहार की सिल्क सिटी भागलपुर इन दिनों एक अजीब और भावुक दौर से गुजर रही है। एक ओर शादी-ब्याह का मौसम है, घरों में शहनाइयों की गूंज है, नई जिंदगी की शुरुआत का उत्साह है, तो दूसरी ओर विक्रमशिला सेतु की बदहाल स्थिति ने लोगों की खुशियों पर संकट की परछाई डाल दी है। गंगा नदी पर बना यह महत्वपूर्ण पुल जब से आवाजाही के लिए बाधित हुआ है, तब से भागलपुर और नवगछिया के बीच का सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। सबसे ज्यादा असर उन परिवारों पर पड़ा है, जिनके घरों में इन दिनों शादी की रस्में चल रही हैं।

अब हालात ऐसे हो चुके हैं कि जिन दूल्हों को कभी फूलों से सजी गाड़ियों और बारातियों के काफिले के साथ दुल्हन लेने जाना होता था, वे आज नाव और कच्चे घाटों के सहारे अपनी नई जिंदगी की शुरुआत करने को मजबूर हैं। गंगा की लहरों के बीच नाव पर सवार होकर विदाई कराने का यह दृश्य किसी फिल्मी कहानी जैसा जरूर लगता है, लेकिन यह भागलपुर की कड़वी हकीकत बन चुका है।

घाटों पर दिख रही संघर्ष और भावनाओं की तस्वीर

भागलपुर के विभिन्न घाटों पर इन दिनों रोजाना हजारों लोगों की भीड़ उमड़ रही है। कोई नौकरी पर जाने की जल्दी में है, कोई मरीज को अस्पताल ले जाने की चिंता में, तो कोई व्यापार के सिलसिले में नदी पार करने को मजबूर है। लेकिन इन सबके बीच सबसे ज्यादा लोगों का ध्यान खींचते हैं नवविवाहित जोड़े, जो शादी के जोड़े में नाव पर चढ़ते और उतरते नजर आते हैं।

सिर पर लाल पगड़ी, माथे पर तिलक और हाथों में शादी का सामान लिए दूल्हे जब घाट की फिसलन भरी मिट्टी पर चलते दिखाई देते हैं, तो यह दृश्य लोगों को भावुक भी करता है और व्यवस्था पर सवाल भी खड़े करता है। दुल्हनें भारी लहंगे और गहनों में सावधानी से नाव पर कदम रखती हैं, जबकि परिवार के सदस्य उन्हें संभालते नजर आते हैं। विदाई के भावुक पलों के बीच सुरक्षा की चिंता हर किसी के चेहरे पर साफ दिखाई देती है।

आधे घंटे का सफर बन गया कई घंटों की परीक्षा

स्थानीय लोगों का कहना है कि विक्रमशिला सेतु के सुचारु रहने के दौरान जो दूरी आधे घंटे या एक घंटे में तय हो जाती थी, अब वही सफर तीन से चार घंटे में पूरा हो रहा है। पहले लोग सीधे वाहन से अपने गंतव्य तक पहुंच जाते थे, लेकिन अब उन्हें कई चरणों में यात्रा करनी पड़ रही है।

पहले घाट तक पहुंचना, फिर नाव का इंतजार करना, भीड़ के बीच जगह बनाना, सामान को सुरक्षित रखना और फिर दूसरी ओर पहुंचकर वाहन तलाशना—यह पूरी प्रक्रिया लोगों के लिए भारी परेशानी का कारण बन चुकी है। खासकर शादी-ब्याह के दौरान यह परेशानी और बढ़ जाती है, क्योंकि परिवार के साथ काफी सामान भी होता है।

विदाई के समय बढ़ रही सुरक्षा की चिंता

गंगा के घाटों पर नावों की संख्या सीमित है, जबकि यात्रियों की भीड़ लगातार बढ़ रही है। ऐसे में कई बार नावों में क्षमता से अधिक लोगों को बैठा लिया जाता है। स्थानीय लोग बताते हैं कि बरसात और तेज हवा के समय यह सफर और खतरनाक हो जाता है।

दूल्हा-दुल्हन के साथ मौजूद परिजनों को सबसे ज्यादा चिंता दुल्हन की सुरक्षा और सामान की होती है। भारी कपड़ों और जेवरों में नाव पर चढ़ना आसान नहीं होता। कई जगह घाटों पर पर्याप्त रोशनी, रेलिंग या सुरक्षा व्यवस्था भी नहीं है। ऐसे में हर सफर दुआओं और डर के बीच पूरा हो रहा है।

नाव बन गई जीवनरेखा

विक्रमशिला सेतु के प्रभावित होने के बाद नावें अब लोगों की मजबूरी बन चुकी हैं। घाटों पर सुबह से लेकर देर रात तक नावों का संचालन हो रहा है। नाविकों का कहना है कि यात्रियों की संख्या अचानक काफी बढ़ गई है। हालांकि कई लोग आरोप लगा रहे हैं कि कुछ नाव संचालक इस मजबूरी का फायदा उठाकर अधिक किराया वसूल रहे हैं।

फिर भी लोगों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। शादी हो, इलाज हो, नौकरी हो या व्यापार—हर जरूरत के लिए अब नाव ही सहारा बन गई है। प्रशासन द्वारा कुछ जगहों पर वैकल्पिक व्यवस्था की कोशिश जरूर की गई है, लेकिन लोगों का कहना है कि यह पर्याप्त नहीं है।

सामाजिक जीवन पर भी पड़ा असर

विक्रमशिला सेतु केवल एक पुल नहीं था, बल्कि भागलपुर और नवगछिया के बीच सामाजिक और आर्थिक संबंधों की मजबूत कड़ी था। इसके बाधित होने से अब रिश्तों और सामाजिक आयोजनों पर भी असर दिखाई देने लगा है।

कई परिवारों ने शादी की तारीखें बदल दी हैं, जबकि कुछ लोग रिश्तेदारी में आने-जाने से भी बच रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले लोग आसानी से बारात लेकर आते-जाते थे, लेकिन अब यात्रा की कठिनाइयों की वजह से कई लोग असमंजस में पड़ जाते हैं।

दूल्हों की मजबूरी बनी चर्चा का विषय

घाटों पर नाव से विदाई कराने पहुंचे दूल्हों की तस्वीरें और वीडियो अब सोशल मीडिया पर भी वायरल हो रहे हैं। लोग इन तस्वीरों को विकास के दावों और जमीनी सच्चाई के बीच का अंतर बता रहे हैं। कई लोग व्यवस्था को लेकर नाराजगी जाहिर कर रहे हैं, तो कुछ नवविवाहित जोड़ों के जज्बे की तारीफ भी कर रहे हैं।

एक दूल्हे ने बताया कि वह मकनपुर से अपनी दुल्हन की विदाई कराने आया था। पहले जहां कार से यह यात्रा आसान थी, वहीं अब उसे कई घंटे नाव और पैदल सफर करना पड़ा। उसने कहा कि शादी का दिन खुशी का होता है, लेकिन इस सफर ने उसे काफी थका दिया।

प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती

विक्रमशिला सेतु की स्थिति ने प्रशासन के सामने भी बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। पुल की मरम्मत और वैकल्पिक व्यवस्था को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। हालांकि लोग चाहते हैं कि जल्द से जल्द स्थायी समाधान निकाला जाए, क्योंकि रोजमर्रा की जिंदगी पर इसका गहरा असर पड़ रहा है।

व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन—हर क्षेत्र प्रभावित हो रहा है। खासकर ग्रामीण इलाकों के लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी झेलनी पड़ रही है।

संघर्ष के बीच नई जिंदगी की शुरुआत

इन तमाम मुश्किलों के बावजूद नवविवाहित जोड़े अपने सपनों और उम्मीदों के साथ आगे बढ़ रहे हैं। नाव की डगमगाहट, घंटों की थकान और भीड़भाड़ के बीच भी उनके चेहरों पर नई जिंदगी की चमक दिखाई देती है। यही जज्बा लोगों को हर मुश्किल से लड़ने की ताकत देता है।

भागलपुर की गंगा इन दिनों केवल यात्रियों को एक किनारे से दूसरे किनारे तक नहीं पहुंचा रही, बल्कि वह उन कहानियों की भी गवाह बन रही है, जिनमें संघर्ष, भावनाएं और उम्मीदें एक साथ बह रही हैं। विक्रमशिला सेतु दोबारा कब पूरी तरह चालू होगा, यह भविष्य के गर्भ में है, लेकिन फिलहाल भागलपुर की विदाई की तस्वीरें गंगा की लहरों पर लिखी जा रही हैं।

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