लखीसराय में सन्नाटा: जीवन बचाने वाले न्यूरो सर्जन अभिनव आनंद ने मौत को लगाया गले, तन्हाई और निजी उलझनों के बीच बुझ गया घर का इकलौता चिराग

लखीसराय। चिकित्सा जगत को अक्सर हम उम्मीदों का केंद्र मानते हैं, जहाँ सफेद कोट पहने लोग मौत के जबड़े से जिंदगियां छीन लाते हैं। लेकिन जब वही हाथ जो दूसरों की नसों और दिमाग की गुत्थियों को सुलझाने में माहिर हों, खुद की जीवनलीला समाप्त करने की राह चुन लें, तो समाज और व्यवस्था पर कई सवालिया निशान खड़े हो जाते हैं। लखीसराय के विद्यापीठ चौक स्थित कृष्णा कमलेश्वरी ट्रॉमा सेंटर एंड इमरजेंसी के संचालक और प्रख्यात न्यूरो सर्जन डॉ. अभिनव आनंद की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मृत्यु ने न केवल प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है, बल्कि चिकित्सा जगत के उस अनकहे तनाव को भी उजागर किया है जिसे अक्सर सफलता की चमक के पीछे दबा दिया जाता है। बुधवार की रात जब पूरा शहर सो रहा था, तब एक कुशल चिकित्सक अपने ही क्लीनिक के बेसमेंट में जिंदगी और मौत के बीच के उस धुंधलके में खो गया, जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं थी।

​बंद कमरे का खौफनाक सच: दोपहर एक बजे जब टूटा दरवाजा

​घटनाक्रम की शुरुआत गुरुवार की दोपहर उस वक्त हुई जब क्लीनिक के कर्मचारियों ने महसूस किया कि उनके ‘साहब’ के कमरे में हलचल की कोई सुगबुगाहट नहीं है। डॉ. अभिनव आनंद, जो आमतौर पर समय के पाबंद थे और मरीजों की कतारों के बीच घिरे रहते थे, दोपहर 12 बजे तक अपने कक्ष से बाहर नहीं आए थे। कर्मचारियों ने पहले मोबाइल पर संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन घंटी बजती रही और कोई उत्तर नहीं मिला। घबराहट तब बढ़ी जब कमरे के बाहर से दी गई आवाजों का भी कोई जवाब नहीं आया।

लखीसराय में सन्नाटा: जीवन बचाने वाले न्यूरो सर्जन अभिनव आनंद ने मौत को लगाया गले, तन्हाई और निजी उलझनों के बीच बुझ गया घर का इकलौता चिराग

​दोपहर करीब एक बजे, अनहोनी की आशंका के बीच अस्पताल के कर्मचारियों ने स्थानीय पुलिस की मौजूदगी में कमरे का दरवाजा तोड़ा। अंदर का दृश्य विचलित करने वाला था। डॉ. आनंद अपने बिस्तर पर निश्चेत पड़े थे। प्रथम दृष्टया यह किसी गहरी नींद जैसा लग रहा था, लेकिन हकीकत उससे कहीं अधिक कड़वी थी। उनके शरीर में जान नहीं बची थी। सूचना मिलते ही टाउन थाना की पुलिस और विधि विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) की टीम मौके पर पहुँची और उस कमरे को अपनी निगरानी में ले लिया जहाँ एक होनहार डॉक्टर ने अपनी अंतिम सांसें ली थीं।

​चिकित्सकीय पद्धति से ‘महाप्रयाण’: सुई, स्लाइन और वह नीली दवा

​डॉ. अभिनव आनंद खुद एक विशेषज्ञ थे, इसलिए उन्होंने जिस तरीके से अपनी जीवनलीला समाप्त करने की कोशिश की, उसमें भी चिकित्सकीय उपकरणों का इस्तेमाल देखा गया। एफएसएल की टीम ने पाया कि उनके हाथ में इंट्राकैथ (Intracath) लगा हुआ था, जो आमतौर पर स्लाइन या दवाओं को सीधे नसों में पहुँचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। घटनास्थल से स्लाइन सेट, कुछ खाली वायल और संदिग्ध दवाइयां बरामद हुई हैं।

​जांच टीम की नजर विशेष रूप से नीले रंग की एक दवा के वायल पर टिकी है, जिसकी पहचान अभी गुप्त रखी गई है। माना जा रहा है कि डॉक्टर ने अपनी विशेषज्ञता का उपयोग करते हुए किसी ऐसी घातक दवा का कॉकटेल तैयार किया, जिसे स्लाइन के माध्यम से धीरे-धीरे अपने शरीर में उतारा। कर्मचारियों से पूछताछ में यह बात सामने आई कि बुधवार की रात डॉ. आनंद ने खुद ही अपने कंपाउंडर से हाथ में सुई (इंट्राकैथ) लगवाई थी, यह कहते हुए कि उन्हें पिछले दो-तीन दिनों से काफी कमजोरी महसूस हो रही है। किसी को क्या पता था कि वह कमजोरी शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक थी, जिसे वे स्लाइन की आड़ में छुपा रहे थे।

​तन्हाई का बोझ: दो असफल शादियां और इकलौता होने का दर्द

​43 वर्षीय डॉ. अभिनव आनंद लखीसराय के कार्यानंद नगर निवासी रमेश सिंह के इकलौते पुत्र थे। सफलता के शिखर पर बैठे इस न्यूरो सर्जन के पास दौलत, शोहरत और नाम की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उनकी निजी जिंदगी रेगिस्तान की तरह सूखी थी। उनके करीबी सूत्रों और पुलिस की प्रारंभिक जांच में यह बात निकलकर सामने आई है कि डॉ. आनंद का पारिवारिक जीवन काफी उथल-पुथल भरा रहा था।

​उन्होंने अपने जीवन में दो शादियां की थीं, लेकिन दोनों ही असफल रहीं। वे वर्तमान में अकेले रह रहे थे और उनकी कोई संतान भी नहीं थी। अपने माता-पिता के इकलौते पुत्र होने के नाते उन पर वंश को आगे बढ़ाने और पारिवारिक अपेक्षाओं का एक अनकहा दबाव भी रहा होगा। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि न्यूरो सर्जरी जैसे तनावपूर्ण पेशे में काम करने वाले व्यक्ति के लिए घर का एकांत कई बार अवसाद का कारण बन जाता है। दो-दो शादियों का टूटना और घर में किसी वारिस का न होना, शायद उनके भीतर एक ऐसा खालीपन पैदा कर गया जिसे भरने में दुनिया की तमाम चिकित्सा पद्धतियां नाकाम रहीं।

​बुधवार की आखिरी रात: फोन कॉल्स और कमजोरी का बहाना

​पुलिस उन कॉल डिटेल्स को भी खंगाल रही है जो बुधवार की रात 10 बजे तक सक्रिय थीं। स्टाफ के अनुसार, डॉ. आनंद रात में बिल्कुल सामान्य दिख रहे थे। उन्होंने भोजन किया और फोन पर लंबी बातचीत भी की। हालांकि, उन्होंने कमजोरी की शिकायत की थी। उन्होंने अपने स्टाफ से कहा था कि वे खुद ही अपनी दवाइयां और इंजेक्शन तय कर रहे हैं और अन्य डॉक्टरों से भी सलाह ले रहे हैं।

​यह पहलू जांच को संदिग्ध बनाता है—क्या वे वास्तव में बीमार थे, या फिर वे अपनी अंतिम यात्रा की तैयारी के लिए ‘कमजोरी’ को एक ढाल के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे? उनके चेहरे पर बुधवार की रात कोई ऐसा शिकन नहीं था जिससे यह अंदाजा लगाया जा सके कि वे चंद घंटों बाद खुदकुशी कर लेंगे। फोन पर हुई आखिरी बातचीत किससे थी और उसमें क्या चर्चा हुई, यह पुलिस के लिए जांच का मुख्य केंद्र बना हुआ है।

​प्रशासनिक प्रतिक्रिया: पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार

​लखीसराय के एसडीपीओ शिवम कुमार ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सावधानीपूर्वक बयान दिया है। उन्होंने कहा कि “फिलहाल मौत के कारणों को लेकर किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचना जल्दबाजी होगी। हमने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और कमरे से बरामद संदिग्ध सामग्रियों को जांच के लिए लैब भेजा जा रहा है।”

​पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है कि कहीं यह ‘एक्सीडेंटल ओवरडोज’ का मामला तो नहीं है। हालांकि, कमरे का अंदर से बंद होना और इंट्राकैथ का लगा होना सीधे तौर पर आत्महत्या की ओर संकेत कर रहा है। लखीसराय टाउन थाना पुलिस ने अस्पताल के सीसीटीवी फुटेज भी अपने कब्जे में लिए हैं ताकि यह देखा जा सके कि रात के वक्त कमरे में किसी और की आवाजाही तो नहीं थी।

​चिकित्सा जगत में मानसिक स्वास्थ्य पर सवाल

​डॉ. अभिनव आनंद की यह मौत केवल लखीसराय की खबर नहीं है, बल्कि यह देश के उन हजारों डॉक्टरों की स्थिति का प्रतिबिंब है जो दूसरों को जीवन देते-देते खुद अंदर से टूट जाते हैं। न्यूरो सर्जन होने के नाते वे दिन भर गंभीर मरीजों और मौत के करीब खड़े लोगों के बीच रहते थे। विशेषज्ञों का कहना है कि उच्च शिक्षा प्राप्त और सफल पेशेवर अक्सर अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाते, जिससे ‘हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन’ की स्थिति पैदा होती है।

​डॉ. आनंद के पिता रमेश सिंह और उनके परिवार के लिए यह क्षति अपूरणीय है। बुढ़ापे की लाठी और कुल का दीपक एक साथ बुझ गया। शहर के विद्यापीठ चौक पर स्थित उनका ट्रॉमा सेंटर अब उस सन्नाटे की गवाही दे रहा है, जो एक प्रतिभाशाली मस्तिष्क के असमय शांत होने से पैदा हुआ है।

लखीसराय ने एक ऐसा चिकित्सक खो दिया जिसकी कमी आने वाले लंबे समय तक महसूस की जाएगी। डॉ. अभिनव आनंद की मृत्यु यह संदेश दे रही है कि सफलता के ऊंचे बुर्जों के नीचे कई बार तन्हाई की गहरी खाइयां होती हैं। पुलिस अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट और एफएसएल की जांच के आधार पर इस गुत्थी को सुलझाने का प्रयास कर रही है। क्या यह वास्तव में निजी जिंदगी की निराशा थी या इसके पीछे कुछ और राज दफन हैं, इसका खुलासा आने वाले दिनों में ही हो पाएगा। फिलहाल, लखीसराय का हर नागरिक उस इकलौते बेटे और कुशल सर्जन की याद में स्तब्ध है, जिसने दुनिया को तो होश दिया, लेकिन खुद की सुध खो बैठा।

  • ये भी पढ़े..

    भरत तिवारी एनकाउंटर मामला: पुलिस ने मानी चूक, मृतक के भाई ने डीएसपी की गिरफ्तारी की उठाई मांग

    Share Add as a preferred…

    भरत तिवारी एनकाउंटर पर बढ़ा सियासी बवाल, बिलौटी गांव में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का किया गया प्रतीकात्मक श्राद्ध

    Share Add as a preferred…