भागलपुर में सेमिनार: 1857 की क्रांति से 80 साल पहले ही जलाई थी आजादी की चिंगारी; अंग्रेजों का खजाना लूटकर गरीबों में बांटते थे ‘रॉबिनहुड’ तिलका मांझी

  • मारवाड़ी कॉलेज के इतिहास विभाग ने तिलका मांझी की जयंती पर किया सेमिनार का आयोजन
  • टीएनबी कॉलेज के डॉ. रविशंकर बोले- स्वतंत्रता संग्राम के पहले क्रांतिकारी थे तिलका मांझी
  • प्राचार्य डॉ. संजय झा ने छात्रों से प्रथम जनजातीय वीर योद्धा से प्रेरणा लेने की अपील की

द वॉयस ऑफ बिहार (भागलपुर)

​अमर शहीद तिलका मांझी की जयंती के अवसर पर बुधवार (11 फरवरी) को भागलपुर के मारवाड़ी महाविद्यालय में एक भव्य सेमिनार का आयोजन किया गया। इतिहास विभाग द्वारा आयोजित इस एक दिवसीय सेमिनार का मुख्य विषय “अमर शहीद तिलका मांझी : आज़ादी के प्रथम जनजातीय वीर योद्धा” रखा गया था। कार्यक्रम में वक्ताओं ने तिलका मांझी के अदम्य साहस, उनके संघर्ष और देश की आजादी में उनके सर्वोच्च बलिदान पर विस्तार से चर्चा की।

गरीबों के ‘रॉबिनहुड’ थे तिलका मांझी

​कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में पहुंचे टी.एन.बी. कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. रविशंकर कुमार चौधरी ने तिलका मांझी को गरीबों का ‘रॉबिनहुड’ बताया।

  • 1857 से पहले का संग्राम: डॉ. चौधरी ने कहा कि हम 1857 के विद्रोह को पहला स्वतंत्रता संग्राम मानते हैं, लेकिन उससे लगभग 80 वर्ष पूर्व ही बिहार के जंगलों में वनवासी समाज से आने वाले तिलका मांझी ने अंग्रेजों के खिलाफ जंग की पहली चिंगारी जला दी थी।
  • खजाना लूटकर गरीबों को बांटा: सन् 1770 के भीषण अकाल के समय जब लोग भूख से मर रहे थे, तब तिलका मांझी ने अंग्रेजी खजाने को लूटकर गरीबों में बाँट दिया था। इसी काम से प्रेरित होकर कई वनवासी उनके साथ जुड़े और अंग्रेजों के खिलाफ ‘संथाल हुल’ (विद्रोह) का बिगुल फूंका। उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम क्रांतिकारी कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा।

साहित्य में तिलका मांझी का जिक्र

​डॉ. चौधरी ने साहित्य का हवाला देते हुए बताया कि तिलका मांझी का संघर्ष इतना महान था कि मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी ने उनके जीवन पर बांग्ला भाषा में ‘शालगिरर डाके’ नामक उपन्यास लिखा। वहीं, हिंदी उपन्यासकार राकेश कुमार सिंह ने भी अपनी किताब ‘हुल पहाड़िया’ में उनके शौर्य और संघर्ष का सजीव वर्णन किया है।

कौन थे तिलका मांझी? (एक नजर में)

  • जन्म: 11 फरवरी 1750 को बिहार के सुल्तानगंज स्थित तिलकपुर गांव में (संथाल परिवार में)।
  • पिता का नाम: सुंदरा मुर्मू।
  • असली नाम: उनका वास्तविक नाम ‘जबरा पहाड़िया’ था। ‘तिलका मांझी’ नाम उन्हें खुद अंग्रेजों ने दिया था।

छात्रों में जागरूकता लाना है उद्देश्य

​सेमिनार की अध्यक्षता करते हुए कॉलेज के प्राचार्य प्रो. (डॉ.) संजय कुमार झा ने विद्यार्थियों को तिलका मांझी के जीवन से प्रेरणा लेने की नसीहत दी। वहीं, इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. प्रभात कुमार ने कहा कि इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय आंदोलन के प्रेरणास्रोत के रूप में तिलका मांझी के योगदान को सामने लाना और आदिवासी समाज के गौरवशाली इतिहास के प्रति जागरूकता फैलाना है।

“इतिहास विभाग द्वारा आयोजित यह सेमिनार हम सभी के लिए बहुत ज्ञानवर्धक रहा। इससे हमें जनजातीय इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम के उन अनछुए अध्यायों को समझने का मौका मिला, जो अक्सर किताबों में छिप जाते हैं।” > – हृषिकेश प्रकाश (छात्र)

ये दिग्गज रहे मौजूद

​कार्यक्रम के अंत में इतिहास विभाग के सहायक प्राध्यापक अक्षय रंजन ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस मौके पर अंग्रेज़ी विभाग से डॉ. भवेश कुमार, समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. संगीत कुमार, अर्थशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. आशीष कुमार मिश्रा एवं डॉ. श्वेता, मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. सुपेन्द्र कुमार यादव, मैथिली विभागाध्यक्ष डॉ. बिनोद कुमार मंडल, राजनीति विज्ञान के डॉ. संजय कुमार जायसवाल, दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. स्वस्तिका दास, सांख्यिकी विभागाध्यक्ष डॉ. विजय कुमार समेत कई शिक्षक और सैकड़ों की संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।

​सभी ने तिलका मांझी के बताए मार्ग पर चलने और उनके बलिदान को याद रखने का संकल्प लिया।

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