पटना | 22 फरवरी, 2026: अल्पसंख्यक छात्रों के शैक्षणिक उत्थान के लिए केंद्र सरकार द्वारा दी जाने वाली छात्रवृत्ति में एक बड़े राष्ट्रीय स्तर के फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है। अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा देशभर के शैक्षणिक संस्थानों की कराई गई सघन जांच में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं, जिसमें बिहार के भी कई संस्थान शामिल हैं।
देशभर में 579 संस्थानों पर फर्जीवाड़े की मुहर
मंत्रालय की जांच रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में कुल 579 शैक्षणिक संस्थान या तो पूरी तरह से फर्जी पाए गए हैं या फिर वे आंशिक रूप से फर्जीवाड़े में संलिप्त हैं। इन संस्थानों ने कागजों पर छात्र दिखाकर करोड़ों रुपये की छात्रवृत्ति का गबन किया है।
बिहार का रिपोर्ट कार्ड: 107 में से 9 संस्थान संदिग्ध
बिहार में भी इस घोटाले की जड़ें गहरी पाई गई हैं। मंत्रालय ने राज्य के संदिग्ध संस्थानों की भौतिक जांच के लिए कड़ा रुख अपनाया था।
- जांच का लक्ष्य: अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय ने बिहार के 107 संदिग्ध संस्थानों की जांच का लक्ष्य रखा था।
- शत-प्रतिशत सत्यापन: जांच एजेंसियों ने राज्य के सभी 107 लक्षित संस्थानों का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) पूरा कर लिया है।
- फर्जी संस्थानों की पहचान: इस सघन जांच के बाद बिहार के 9 संस्थान पूरी तरह या आंशिक रूप से फर्जी पाए गए हैं।
आंकड़ों के आईने में कार्रवाई की स्थिति
|
विवरण |
संख्या/आंकड़े |
|---|---|
|
देशभर में कुल फर्जी संस्थान |
579 |
|
बिहार में जांचे गए कुल संदिग्ध संस्थान |
107 |
|
बिहार में पाए गए फर्जी संस्थान |
09 |
|
राज्यभर में दर्ज कुल FIR |
85 |
|
चिन्हित दोषी व्यक्ति और लाभार्थी |
141 |
कार्रवाई का शिकंजा: 85 एफआईआर दर्ज
हालांकि सीधे तौर पर संस्थानों पर तत्काल बड़ी कार्रवाई का आधिकारिक आंकड़ा अभी शून्य दिख रहा है, लेकिन कानूनी प्रक्रिया तेज कर दी गई है। मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्यभर में अब तक 85 एफआईआर (FIR) दर्ज कराई गई हैं।
इसके अतिरिक्त, जांच एजेंसियों ने ऐसे 141 व्यक्तियों और लाभार्थियों की पहचान की है जिन्होंने गलत तरीके से छात्रवृत्ति का लाभ उठाया या इस फर्जीवाड़े में सहयोग किया। इन सभी के विरुद्ध कड़ी विभागीय और कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
भ्रष्टाचार का तरीका: कैसे होता था फर्जीवाड़ा?
सूत्रों के अनुसार, ये संस्थान अस्तित्व में न होने के बावजूद या फिर छात्रों की फर्जी संख्या दिखाकर अल्पसंख्यक पोर्टल पर छात्रवृत्ति के लिए आवेदन करते थे। सत्यापन के दौरान पाया गया कि कई संस्थानों के पते पर कोई शैक्षणिक गतिविधि ही नहीं चल रही थी।


