
पटना/सहरसा। बिहार के सहरसा जिले में स्कूली बच्चों की सेहत के साथ हुए खिलवाड़ के मामले ने अब तूल पकड़ लिया है। सहरसा के महिषी प्रखंड स्थित राजकीय मध्य विद्यालय बलुआहा में मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) खाने के बाद बच्चों के बीमार होने की खबर पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कड़ा संज्ञान लिया है। मुख्यमंत्री ने इस घटना को अत्यंत गंभीर मानते हुए शिक्षा विभाग को स्पष्ट चेतावनी दी है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी। मुख्यमंत्री ने न केवल बीमार बच्चों के समुचित इलाज के निर्देश दिए हैं, बल्कि ‘पीएम पोषण’ योजना के अनुश्रवण और निगरानी तंत्र को पूरी तरह से दुरुस्त करने का भी हुक्म दिया है। सरकार के इस सख्त रुख के बाद शिक्षा विभाग के गलियारों में हड़कंप मच गया है। यह मामला एक बार फिर राज्य के सरकारी स्कूलों में भोजन की गुणवत्ता और अधिकारियों की जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है, जिस पर अब मुख्यमंत्री ने सीधे हस्तक्षेप किया है।
मुख्यमंत्री का कड़ा संज्ञान: बच्चों की सेहत से समझौता नहीं
सहरसा में घटी इस घटना की जानकारी मिलते ही मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने उच्च स्तरीय समीक्षा की और शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों को तलब किया। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया है कि सहरसा के उन सभी स्कूली बच्चों का, जिनकी तबीयत मिड-डे मील खाने से बिगड़ी है, बेहतरीन अस्पतालों में समुचित और निःशुल्क इलाज कराया जाए। उन्होंने जिला प्रशासन को आदेश दिया है कि वे व्यक्तिगत रूप से बच्चों के स्वास्थ्य की निगरानी करें और यह सुनिश्चित करें कि हर एक बच्चा पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने घर लौटे।
मुख्यमंत्री ने अपने निर्देश में साफ कहा है कि बच्चों की जान के साथ खेलने वालों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई की जाए जो दूसरों के लिए नजीर बने। उन्होंने शिक्षा विभाग को निर्देश दिया है कि पीएम पोषण योजना के तहत दिए जाने वाले भोजन की गुणवत्ता की जांच के लिए एक सख्त प्रोटोकॉल तैयार किया जाए। मुख्यमंत्री के अनुसार, यह योजना केवल बच्चों का पेट भरने के लिए नहीं है, बल्कि उनके पोषण और बेहतर भविष्य के लिए है, और इसमें किसी भी स्तर पर होने वाली लापरवाही एक अक्षम्य अपराध मानी जाएगी।
निगरानी तंत्र की विफलता पर मुख्यमंत्री के कड़े निर्देश
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने शिक्षा विभाग को पीएम पोषण योजना के समुचित अनुश्रवण (Monitoring) एवं प्रभावी निगरानी का निर्देश दिया है। उन्होंने कहा कि अक्सर यह देखा जाता है कि कागजों पर तो भोजन की गुणवत्ता की जांच की खानापूर्ति कर ली जाती है, लेकिन धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत होती है। मुख्यमंत्री ने विभाग को निर्देश दिया है कि अब से मिड-डे मील बनाने से लेकर उसे परोसने तक की पूरी प्रक्रिया की रैंडम चेकिंग की जाए।
निगरानी के लिए मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए प्रमुख निर्देश:
- नियमित ऑडिट: स्कूलों में अनाज के भंडारण, सफाई और खाना पकाने के बर्तनों की नियमित अंतराल पर जांच की जाए।
- जवाबदेही तय करना: अगर किसी स्कूल में भोजन विषाक्त पाया जाता है, तो इसके लिए केवल रसोइयों को नहीं, बल्कि संबंधित प्रधानाध्यापक और ब्लॉक स्तर के अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होगी।
- सैंपल टेस्टिंग: भोजन तैयार होने के बाद उसे बच्चों को परोसने से पहले स्कूल प्रबंधन समिति के कम से कम दो सदस्यों द्वारा उसे चखा जाना अनिवार्य होगा और इसका रिकॉर्ड मेंटेन किया जाएगा।
- तकनीकी निगरानी: पीएम पोषण योजना के तहत भोजन की फोटो और गुणवत्ता की रिपोर्ट को रीयल-टाइम पोर्टल पर अपलोड करने की व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी बनाया जाए।
मुख्यमंत्री ने कहा है कि निगरानी तंत्र में सुधार केवल एक आदेश नहीं होना चाहिए, बल्कि यह एक कार्यसंस्कृति बननी चाहिए ताकि भविष्य में किसी भी स्कूल से ऐसी दुखद खबर सामने न आए।
बलुआहा स्कूल की घटना: जब थाली में जहर परोसा गया
सहरसा के महिषी प्रखंड अंतर्गत बलुआहा के राजकीय मध्य विद्यालय में हुई यह घटना व्यवस्था की खामियों को उजागर करती है। गुरुवार को जैसे ही बच्चों ने भोजन किया, उन्हें उल्टी, पेट दर्द और चक्कर आने की शिकायत होने लगी। देखते ही देखते बच्चों की चीख-पुकार से पूरा स्कूल गूंज उठा। कई बच्चे बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े, जिससे अफरा-तफरी का माहौल बन गया। स्थानीय ग्रामीणों और शिक्षकों ने तत्परता दिखाते हुए बच्चों को पास के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुँचाया, जहाँ से कई बच्चों को बेहतर इलाज के लिए रेफर करना पड़ा।
डॉक्टरों के अनुसार, शुरुआती जांच में यह फूड पॉइजनिंग का मामला लगा। मुख्यमंत्री के संज्ञान लेने के बाद अब जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की टीमें पूरी तरह सक्रिय हैं। भोजन के जो सैंपल जांच के लिए भेजे गए हैं, उनकी रिपोर्ट का इंतजार है। इस घटना ने न केवल सहरसा बल्कि पूरे राज्य के अभिभावकों को डरा दिया है। मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद अब उन लोगों में डर का माहौल है जो मिड-डे मील के अनाज और उसकी गुणवत्ता में भ्रष्टाचार करते आए हैं।
पीएम पोषण योजना: क्या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही है बच्चों की सेहत?
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने योजना की निगरानी पर जो जोर दिया है, उसके पीछे राज्य में मिड-डे मील को लेकर मिलने वाली निरंतर शिकायतें हैं। पीएम पोषण योजना (पूर्व में मिड-डे मील) का उद्देश्य सरकारी स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ाना और उन्हें कुपोषण से मुक्त करना है। लेकिन सहरसा जैसे मामलों से यह स्पष्ट होता है कि जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार की जड़ें काफी गहरी हैं। अनाज की खराब गुणवत्ता, रसोई घर में गंदगी और जांच अधिकारियों की लापरवाही ने इस योजना को कई जगहों पर ‘खतरे की योजना’ बना दिया है।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को हिदायत दी है कि वे ठेकेदारों और अनाज आपूर्तिकर्ताओं के सिंडिकेट को तोड़ें। उन्होंने विभाग को निर्देश दिया है कि वे ऐसे स्कूलों की सूची बनाएं जहाँ से पहले भी शिकायतें आई हैं और वहां विशेष निगरानी दल तैनात किए जाएं। सम्राट चौधरी का मानना है कि यदि प्रशासन चाहे तो हर बच्चे को शुद्ध और पौष्टिक भोजन मिल सकता है, बशर्ते निगरानी तंत्र में ईमानदारी और पारदर्शिता हो।
अभिभावकों का आक्रोश और न्याय की उम्मीद
सहरसा के उन अभिभावकों के लिए मुख्यमंत्री का यह संज्ञान एक बड़ी राहत बनकर आया है, जिन्होंने अपने बच्चों को तड़पते देखा है। सहरसा अस्पताल के बाहर जुटे परिजनों का कहना है कि वे अपने बच्चों को स्कूल पढ़ने के लिए भेजते हैं, न कि बीमार होने के लिए। मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद अब उन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की तैयारी की जा रही है जिनकी लापरवाही से यह घटना घटी। स्थानीय प्रशासन ने पीड़ित परिवारों को आश्वस्त किया है कि मुख्यमंत्री के आदेशानुसार दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
सहरसा की यह घटना अब पूरे बिहार के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ बन गई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने जिस तरह से सीधे इस मामले में दखल दिया है, उससे यह संदेश गया है कि नई सरकार में प्रशासनिक शिथिलता के लिए कोई जगह नहीं है। अब सबकी नजरें शिक्षा विभाग के अगले कदम पर हैं कि वे पीएम पोषण योजना को सुरक्षित और विश्वसनीय बनाने के लिए कौन से ठोस कदम उठाते हैं।


