
- सहरसा में तैनात डीआरडीए निदेशक वैभव कुमार के विरुद्ध आर्थिक अपराध इकाई (EOU) की जांच ने बिहार के प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है, जहां एक लोक सेवक द्वारा सेवा के शुरुआती वर्षों में ही अकूत संपत्ति बनाने का मामला सामने आया है।
- वर्ष 2013 में ग्रामीण विकास अधिकारी के रूप में करियर शुरू करने वाले वैभव कुमार ने सेवा में आने के महज तीन साल बाद, यानी 2016 से ही अवैध रूप से धन अर्जन और निवेश की प्रक्रिया शुरू कर दी थी।
- ईओयू द्वारा जारी आधिकारिक ब्योरे के अनुसार, 2016 से 2025 के बीच वैभव कुमार ने मुजफ्फरपुर और पटना के प्रमुख इलाकों में लगभग 10 करोड़ रुपये की बाजार कीमत वाले 16 बहुकीमती प्लॉट खरीदे हैं।
- भ्रष्टाचार के इस खेल में बेनामी निवेश के लिए अपने नाबालिग बेटे ऐश्वर्य भास्कर, बैंककर्मी पत्नी नेहा नंदनी और पिता ललित नारायण झा के नाम का सहारा लिया गया, ताकि सरकारी जांच एजेंसियों की नजरों से बचा जा सके।
- मुजफ्फरपुर में 14 प्लॉट और पटना के फुलवारीशरीफ जैसे व्यावसायिक केंद्र में 2 बेशकीमती भूखंडों की खरीद ने वैभव कुमार को एक अधिकारी से ज्यादा ‘रियल एस्टेट किंग’ के रूप में स्थापित कर दिया है।
मुजफ्फरपुर/पटना (द वॉयस ऑफ बिहार)।
सुशासन की आड़ में व्यक्तिगत ‘विकास’ का काला अध्याय
बिहार में ग्रामीण विकास की जिम्मेदारी जिन कंधों पर होती है, यदि वही कंधे भ्रष्टाचार के बोझ से दबने लगें, तो सरकारी योजनाओं का हश्र क्या होता है, इसका जीवंत उदाहरण वैभव कुमार का मामला है। मुजफ्फरपुर के मनियारी थाना क्षेत्र के मिश्रा मनियारी निवासी और वर्तमान में सहरसा के डीआरडीए निदेशक वैभव कुमार अब आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू) के रडार पर हैं। 2013 बैच के एक अधिकारी द्वारा 9 वर्षों के भीतर 10 करोड़ रुपये की जमीन का मालिक बन जाना, न केवल उनकी व्यक्तिगत विलासिता को दर्शाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि लोक सेवा के पद का उपयोग उन्होंने जनहित के बजाय निजी तिजोरी भरने के लिए किया। ईओयू की जांच ने यह साफ कर दिया है कि वैभव कुमार ने अपनी तैनाती के दौरान भ्रष्टाचार के नए प्रतिमान स्थापित किए थे।
करियर की शुरुआत और भ्रष्टाचार का ‘टेक-ऑफ’
वैभव कुमार की सेवा यात्रा 2013 में शुरू हुई थी। एक युवा अधिकारी से समाज को बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन दस्तावेजों की जांच बताती है कि ट्रेनिंग और प्रोबेशन के शुरुआती तीन साल बीतते ही उनके भीतर धन अर्जन की लालसा जाग उठी। 2016 वह वर्ष था जब उन्होंने पहली बार अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर अवैध संपत्तियों की नींव रखी। मुजफ्फरपुर के मिठनपुरा जैसे पॉश इलाके में 2.52 डिसमिल जमीन के साथ एक मंजिला मकान की खरीद उनके इस ‘काले सफर’ का पहला पड़ाव था। इसके बाद, अगले 9 वर्षों तक उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। जैसे-जैसे उनके पद बढ़ते गए, मुजफ्फरपुर और पटना की जमीनों के दस्तावेजों पर उनके परिजनों के नाम दर्ज होते गए।
नाबालिग बेटे और बैंककर्मी पत्नी के नाम का दुरुपयोग
ईओयू की छापेमारी और कागजों की पड़ताल में जो सबसे चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है, वह है संपत्तियों का स्वामित्व। वैभव कुमार ने कानून की आंखों में धूल झोंकने के लिए ‘बेनामी’ निवेश का सहारा लिया। उन्होंने मुजफ्फरपुर में कुल 14 प्लॉट खरीदे, जिनमें से अधिकांश उनके नाबालिग बेटे ऐश्वर्य भास्कर और उनके वृद्ध पिता ललित नारायण झा के नाम पर हैं। सबसे बड़ा निवेश उन्होंने अपनी पत्नी नेहा नंदनी के नाम पर किया, जिनके नाम कुल सात प्लॉट दर्ज पाए गए हैं। चूंकि नेहा नंदनी एक बैंककर्मी हैं, इसलिए वैभव कुमार को लगा होगा कि वे इसे वैध आय के रूप में दिखा पाएंगे। हालांकि, ईओयू ने उनकी आय और संपत्तियों के बीच के भारी अंतर को पकड़ लिया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि बैंक की नौकरी से इतनी करोड़ों की संपत्ति बनाना मुमकिन नहीं था।
पटना के फुलवारीशरीफ में व्यावसायिक साम्राज्य की नींव
वैभव कुमार का निवेश केवल आवासीय भूखंडों तक सीमित नहीं था। उनकी नजर पटना के उभरते व्यावसायिक क्षेत्रों पर भी थी। ईओयू के अनुसार, पटना के फुलवारीशरीफ इलाके में उन्होंने अपनी पत्नी के नाम पर दो बेहद कीमती व्यावसायिक प्लॉट खरीदे हैं। ये प्लॉट रणनीतिक रूप से ऐसी जगह स्थित हैं जहां भविष्य में करोड़ों का कारोबार या रेंटल इनकम सुनिश्चित की जा सके। ग्रामीण विकास विभाग में रहते हुए, जहाँ एक-एक रुपये का हिसाब गरीबों के उत्थान के लिए होना चाहिए था, वैभव कुमार ने उन रुपयों का रुख राजधानी की महंगी जमीनों की ओर मोड़ दिया। यह प्रशासनिक अक्षमता और नैतिक पतन की पराकाष्ठा है।
मुजफ्फरपुर: 14 प्लॉट और काली कमाई का मुख्य केंद्र
वैभव कुमार मूल रूप से मुजफ्फरपुर के ही रहने वाले हैं, इसलिए उन्होंने अपनी काली कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा अपने गृह जिले में ही लगाया। शहर के विभिन्न कोनों में फैले 14 प्लॉट यह बताते हैं कि उनकी रुचि प्रशासनिक कार्यों से ज्यादा जमीन की खरीद-बिक्री और कब्जे में थी। ईओयू की टीम अब उन संपत्तियों की वर्तमान बाजार कीमत का आकलन कर रही है, जो सरकारी दर (Registry Value) से कहीं अधिक है। कई ऐसे भूखंड भी जांच के दायरे में हैं जो उन्होंने अपने प्रभाव का उपयोग कर बाजार से काफी कम कीमत पर ‘प्रेशर’ देकर खरीदे होंगे। मिश्रा मनियारी स्थित उनका पैतृक घर भी अब जांच का हिस्सा है, जहां से कई महत्वपूर्ण दस्तावेज बरामद किए गए हैं।
ईओयू की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ और भविष्य की कार्रवाई
आर्थिक अपराध इकाई ने बुधवार को वैभव कुमार की संपत्तियों का जो कच्चा चिट्ठा जारी किया है, वह केवल एक शुरुआत है। ईओयू के अधिकारियों का मानना है कि यह तो केवल ‘जमीन’ का ब्योरा है; बैंक खातों, शेयर मार्केट में निवेश और सोने-चांदी के आभूषणों की जांच अभी बाकी है। वैभव कुमार की तैनाती के दौरान जिन ठेकेदारों और बिचौलियों को लाभ पहुंचाया गया, अब उन पर भी शिकंजा कसा जा रहा है। ईओयू ने भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया है और जल्द ही उनकी संपत्तियों को जब्त (Confiscation) करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। यह मामला उन तमाम अधिकारियों के लिए एक कड़ा संदेश है जो सरकारी कुर्सी को पैसे छापने की मशीन समझते हैं।
ग्रामीण विकास पर भ्रष्टाचार का साया: क्या होगा अंजाम?
सहरसा में डीआरडीए निदेशक के पद पर रहते हुए वैभव कुमार ने कई योजनाओं का क्रियान्वयन किया होगा। अब उन तमाम फाइलों को भी खंगाला जा रहा है जिन पर उनके हस्ताक्षर हैं। ग्रामीण सड़कों, आवास योजना और मनरेगा जैसे महत्वपूर्ण विभागों में यदि वैभव कुमार जैसा ‘रियल एस्टेट माइंडसेट’ वाला अधिकारी बैठा हो, तो योजनाओं की गुणवत्ता और पारदर्शिता पर सवाल उठना लाजिमी है। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि वैभव कुमार की पूरी सेवा अवधि की ‘स्पेशल ऑडिट’ कराई जाए। भ्रष्टाचार की इस कहानी ने यह साबित कर दिया है कि सुशासन के दावों के बीच भी वैभव कुमार जैसे लोग सिस्टम की जड़ों को खोखला कर रहे हैं।
रक्षक ही जब भक्षक बन जाए
वैभव कुमार का मामला एक व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक विफलता का प्रतीक है। एक अधिकारी जो 9 साल में 10 करोड़ की जमीन का मालिक बन जाता है, वह व्यवस्था की उन गलियों से वाकिफ होता है जहाँ से पैसा ‘लीक’ होता है। नाबालिग बेटे के नाम पर संपत्ति खरीदना उनकी भविष्य की योजना को दर्शाता है, लेकिन ईओयू की मुस्तैदी ने उस योजना को मिट्टी में मिला दिया है। अब देखना यह है कि न्यायालय और विभाग इस भ्रष्ट अधिकारी को क्या सजा देता है। मुजफ्फरपुर से पटना तक फैला उनका यह जमीन का साम्राज्य अब शायद उनके काम नहीं आएगा, बल्कि कानून की जद में आकर जब्त होगा। द वॉयस ऑफ बिहार की टीम इस मामले की हर छोटी-बड़ी अपडेट पर अपनी नजर बनाए रखेगी।


