बिहार कृषि महाविद्यालय सबौर में जलवायु-अनुकूल धान पर प्रशिक्षण, किसानों को बांटे गए उन्नत बीज

बदलते मौसम और जलवायु परिवर्तन की बढ़ती चुनौतियों के बीच किसानों को सुरक्षित और टिकाऊ खेती की दिशा में आगे बढ़ाने के उद्देश्य से बिहार कृषि महाविद्यालय, सबौर में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर के अंतर्गत बिहार कृषि कॉलेज के आनुवंशिकी एवं पौध प्रजनन विभाग द्वारा बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन (BMGF) परियोजना के तहत एक दिवसीय प्रशिक्षण-सह-कृषि इनपुट वितरण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों को नव-विकसित जलवायु-अनुकूल धान की किस्मों, उनकी उन्नत उत्पादन तकनीकों तथा आधुनिक कृषि पद्धतियों की जानकारी देना था।

इस विशेष कार्यक्रम में भागलपुर और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में प्रगतिशील किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम में जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि क्षेत्र पर पड़ रहे प्रभावों, विशेषकर धान उत्पादन में आने वाली चुनौतियों और उनके समाधान पर विस्तार से चर्चा की गई। वैज्ञानिकों ने किसानों को ऐसी नई धान किस्मों के बारे में जानकारी दी जो कम पानी, सूखा, बाढ़ और अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन देने में सक्षम हैं।

कार्यक्रम का औपचारिक उद्घाटन द्वारा किया गया। अपने उद्घाटन संबोधन में उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन आज कृषि के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन चुका है। मौसम का अनिश्चित स्वरूप पारंपरिक खेती पद्धतियों को प्रभावित कर रहा है और इसका सबसे अधिक असर छोटे एवं सीमांत किसानों पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में वैज्ञानिकों द्वारा विकसित जलवायु-अनुकूल फसल किस्में किसानों के लिए सुरक्षा कवच का कार्य करेंगी।

प्राचार्य ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि गुणवत्तापूर्ण और प्रमाणित बीज हर किसान की पहुंच में होना चाहिए। उनके अनुसार यदि छोटे से छोटा किसान भी वैज्ञानिक तरीके से विकसित उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का उपयोग करेगा, तभी देश का कुल कृषि उत्पादन बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि यह तकनीक केवल फसल सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों की लागत कम कर उनकी आय बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाएगी।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. एस.पी. सिंह ने किसानों को बिहार कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित नई धान किस्मों की उन्नत खेती तकनीकों की जानकारी दी। उन्होंने भूमि और मौसम की स्थिति के अनुसार धान उत्पादन की आधुनिक पद्धतियों को समझाया। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण खेती के पारंपरिक मॉडल में बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे, इसलिए किसानों को वैज्ञानिक कृषि तकनीकों को अपनाना होगा।

परियोजना के सह मुख्य समन्वयक डॉ. आनंद कुमार ने किसानों को संबोधित करते हुए विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के संदर्भ में धान उत्पादन की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए कृषि क्षेत्र, विशेषकर खाद्यान्न उत्पादन, को मजबूत करना आवश्यक है। यदि किसान जलवायु संकट से सुरक्षित नहीं होंगे तो देश के विकास का लक्ष्य भी प्रभावित होगा।

उन्होंने विश्वविद्यालय द्वारा विकसित जलवायु-अनुकूल धान की किस्मों जैसे सबौर नरेंद्र, सबौर सोना, सबौर कुंवर, सबौर मनसूरी, सबौर सम्पन्न, सबौर प्रताप और सबौर विजय की विशेषताओं पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि इन किस्मों को इस तरह विकसित किया गया है कि ये बहु-तनाव सहिष्णु हों। यानी ये किस्में सूखे की स्थिति में भी टिक सकती हैं और 10 से 15 दिनों तक बाढ़ के पानी में डूबे रहने के बावजूद बेहतर उत्पादन देने की क्षमता रखती हैं।

डॉ. आनंद कुमार ने किसानों के सामने चार सूत्रीय रणनीति भी रखी। उन्होंने कहा कि अब समय केवल अधिक उत्पादन देने वाली फसलों का नहीं, बल्कि स्मार्ट किस्मों का है। भविष्य की खेती में ऐसी प्रजातियों की आवश्यकता होगी जो एक साथ कई चुनौतियों से लड़ सकें। उन्होंने कहा कि शोध प्रयोगशालाओं से निकलने वाली तकनीकों को सीधे खेतों तक पहुंचाना ही वास्तविक परिवर्तन की कुंजी है।

सस्य वैज्ञानिक डॉ. सौरभ कुमार चौधरी ने कहा कि भविष्य में पानी का संकट कृषि क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती बनने वाला है। उन्होंने किसानों को पारंपरिक जलभराव आधारित धान खेती की बजाय कम पानी वाली तकनीकों को अपनाने की सलाह दी। उन्होंने धान की सीधी बुआई (Direct Seeded Rice) जैसी तकनीकों पर जोर देते हुए कहा कि इससे 30 से 40 प्रतिशत तक पानी की बचत संभव है।

कार्यक्रम के दौरान डॉ. मंकेष कुमार ने किसानों को सबौर कतरनी धान-1 की खेती के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह किस्म बेहतर गुणवत्ता और बाजार मूल्य के कारण किसानों के लिए अधिक लाभकारी साबित हो सकती है। उन्होंने इसकी खेती के पैकेज, बीज दर, रोपण तकनीक और पोषण प्रबंधन पर विस्तृत जानकारी साझा की।

तकनीकी सत्र के दौरान किसानों को वैज्ञानिक नर्सरी प्रबंधन, सटीक जल प्रबंधन, उर्वरक उपयोग, कीट नियंत्रण और रोग प्रबंधन से संबंधित आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया। वैज्ञानिकों ने यह भी बताया कि मौसम आधारित कृषि योजना बनाकर नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

कार्यक्रम में भागलपुर के अकबरनगर, रतनगंज, जगदीशपुर, बिरनौध, गोराडीह और शंभूगंज सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए किसानों ने सक्रिय भागीदारी निभाई। किसानों ने वैज्ञानिकों से सीधे संवाद कर खेती से जुड़ी अपनी समस्याएं साझा कीं और समाधान प्राप्त किया। इस किसान-वैज्ञानिक संवाद ने कार्यक्रम को और उपयोगी बना दिया।

कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा कृषि इनपुट वितरण समारोह रहा। इसके तहत चयनित किसानों को नव-विकसित जलवायु-अनुकूल धान के उच्च गुणवत्ता वाले बीज वितरित किए गए। इनमें सबौर सोना, सबौर कतरनी धान-1 और सबौर श्री सब-1 प्रमुख रहे। इन बीजों का उद्देश्य किसानों को तुरंत उन्नत खेती अपनाने में सक्षम बनाना था।

विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्वी भारत में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए ऐसे कार्यक्रम बेहद महत्वपूर्ण हैं। यदि किसानों तक वैज्ञानिक शोध और उन्नत बीज समय पर पहुंचते हैं, तो कृषि उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय में उल्लेखनीय सुधार संभव है।

कुल मिलाकर, बिहार कृषि महाविद्यालय सबौर में आयोजित यह कार्यक्रम किसानों के लिए नई उम्मीद लेकर आया। जलवायु-अनुकूल धान की उन्नत किस्में और आधुनिक कृषि तकनीक आने वाले समय में खेती को अधिक सुरक्षित, टिकाऊ और लाभकारी बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। यह पहल बिहार की कृषि को नई दिशा देने वाला एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

  • ये भी पढ़े..

    आज का राशिफल और पंचांग: 25 जून 2026 का दिन किन राशियों के लिए रहेगा खास, जानें सभी 12 राशियों का विस्तृत भविष्यफल

    Share Add as a preferred…

    भागलपुर में नवविवाहिता की संदिग्ध मौत से सनसनी, परिजनों ने लगाया हत्या का आरोप; पति हिरासत में

    Share Add as a preferred…