
रोहतास (द वॉयस ऑफ बिहार)।बिहार के रोहतास जिले से एक ऐसी रूह कंपा देने वाली वारदात सामने आई है, जिसने न केवल कानून-व्यवस्था को चुनौती दी है, बल्कि भारतीय समाज में पवित्र माने जाने वाले ‘मामा-भांजा’ के रिश्ते की गरिमा को भी तार-तार कर दिया है। नासरीगंज थाना क्षेत्र के पड़ुरी गांव में बुधवार की सुबह वह खूनी मंजर देखने को मिला, जिसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी। जहाँ एक मामा अपने भांजों की प्रगति की कामना करता है, वहीं उन्हीं भांजों ने अपने सगे मामा को मौत के घाट उतार दिया। इस घटना ने पूरे इलाके में न केवल सनसनी फैला दी है, बल्कि लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या अब खून के रिश्तों पर भरोसा करना भी जानलेवा हो सकता है?
सुबह की चाय और अचानक मौत का दस्तक
बुधवार की सुबह नासरीगंज-डेहरी मुख्य सड़क पर स्थित पड़ुरी गांव में जीवन अपनी सामान्य रफ़्तार से चल रहा था। गांव के 50 वर्षीय बैजनाथ सिंह अपने पुत्र सतीश सिंह के साथ घर से कुछ ही दूर मुख्य सड़क पर स्थित एक चाय-पान की दुकान पर गए थे। यह उनकी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा था—सुबह की ताजी हवा, चाय की चुस्की और गांव की कुछ चर्चाएं। पिता-पुत्र दुकान पर बैठकर बातचीत कर रहे थे, तभी किस्मत ने एक डरावनी करवट ली।
करीब नौ बजे का समय था, जब सड़क पर एक काले रंग की लग्जरी एक्सयूवी (XUV) गाड़ी तेज रफ़्तार से आती दिखी। दुकान पर मौजूद लोगों को लगा कि कोई मुसाफिर होगा, लेकिन उस गाड़ी में बैजनाथ सिंह की मौत सवार थी। गाड़ी ठीक दुकान के पास आकर रुकी और उसमें से दो युवक नीचे उतरे। वे कोई और नहीं, बल्कि बैजनाथ सिंह के सगे भांजे—गोपाल राय और रंजीत मउआर थे। इससे पहले कि बैजनाथ सिंह या उनका बेटा सतीश कुछ समझ पाते, भांजों ने अपनी कमर से पिस्तौल निकाली और अपने मामा को निशाना बनाकर फायरिंग शुरू कर दी।
नजदीक से दागी गोलियां: थर्रा उठा पूरा इलाका
चश्मदीदों के अनुसार, हमला इतना अचानक और सटीक था कि बैजनाथ सिंह को भागने या छिपने का मौका तक नहीं मिला। गोपाल और रंजीत ने बिल्कुल नजदीक से गोलियां चलाईं, जो सीधे बैजनाथ सिंह के शरीर के महत्वपूर्ण अंगों में जा लगीं। गोलियों की तड़तड़ाहट से पूरा इलाका गूँज उठा और चाय की दुकान पर मौजूद अन्य लोग अपनी जान बचाकर इधर-उधर भागने लगे। लहूलुहान होकर बैजनाथ सिंह वहीं जमीन पर गिर पड़े।
अपने पिता को खून से लथपथ देख बेटा सतीश चीखने लगा, लेकिन हमलावर भांजे वारदात को अंजाम देने के बाद उसी काली एक्सयूवी में सवार होकर डेहरी की ओर तेजी से फरार हो गए। दिनदहाड़े मुख्य सड़क पर हुई इस हत्या ने पुलिस के गश्ती दावों की भी पोल खोल दी है। हमलावरों का साहस इतना था कि उन्हें न तो दिन के उजाले का डर था और न ही मौके पर मौजूद भीड़ का।
अस्पताल में पसरा सन्नाटा: डॉक्टरों ने तोड़ा उम्मीद का धागा
घटना के तुरंत बाद सतीश और स्थानीय ग्रामीणों की मदद से बैजनाथ सिंह को आनन-फानन में नासरीगंज स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) ले जाया गया। अस्पताल के रास्ते भर सतीश अपने पिता की सांसों को थामे रखने की कोशिश करता रहा, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। पीएचसी पहुँचते ही डॉक्टरों की टीम ने उनका परीक्षण किया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। शरीर से अत्यधिक खून बह जाने के कारण बैजनाथ सिंह के प्राण पखेरू उड़ चुके थे।
डॉक्टरों द्वारा मृत घोषित किए जाने के बाद अस्पताल परिसर में कोहराम मच गया। बैजनाथ सिंह के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। गांव से बड़ी संख्या में लोग अस्पताल पहुँच गए, जहाँ माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया। सगे भांजों द्वारा मामा की हत्या की खबर ने अस्पताल में मौजूद मरीजों और स्वास्थ्य कर्मियों को भी स्तब्ध कर दिया।
रिश्तों की बलि: आखिर क्यों टूटी मर्यादा की दीवार?
समाज में मामा का स्थान पिता के समान माना जाता है। कहा जाता है कि ‘मामा’ का अर्थ है ‘मां-मां’, यानी मां के बराबर ममता देने वाला। लेकिन पड़ुरी गांव की इस घटना ने इस मिथक को लहूलुहान कर दिया है। आखिर ऐसी क्या वजह थी कि गोपाल राय और रंजीत मउआर ने उस शख्स की जान ले ली, जिसकी उंगली पकड़कर शायद उन्होंने कभी चलना सीखा होगा?
हालांकि पुलिस अभी अधिकारिक तौर पर हत्या के कारणों का खुलासा नहीं कर पाई है, लेकिन स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि यह विवाद किसी पुरानी रंजिश या संपत्ति से जुड़ा हो सकता है। ग्रामीण इलाकों में अक्सर देखा जाता है कि जमीन-जायदाद के छोटे से टुकड़े के लिए सगे रिश्तेदार भी एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं। गोपाल और रंजीत का इस कदर उग्र होना और योजनाबद्ध तरीके से हत्या करना यह दर्शाता है कि विवाद काफी गहरा और पुराना था।
पुलिस की कार्रवाई और फरार हमलावरों की तलाश
घटना की सूचना मिलते ही नासरीगंज थाना पुलिस सक्रिय हो गई है। पुलिस की एक टीम अस्पताल पहुँची, जहाँ उन्होंने शव को अपने कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए सासाराम सदर अस्पताल भेज दिया। दूसरी टीम पड़ुरी गांव और घटनास्थल पर पहुँचकर साक्ष्य जुटाने में लगी है। सतीश सिंह, जो इस पूरी वारदात का मुख्य गवाह है, उसके बयान के आधार पर गोपाल राय और रंजीत मउआर के खिलाफ नामजद प्राथमिकी दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
नासरीगंज थानाध्यक्ष ने बताया कि हमलावरों की गिरफ्तारी के लिए विशेष टीम का गठन किया गया है। काले रंग की उस एक्सयूवी गाड़ी की तलाश के लिए जिले के सभी मुख्य मार्गों पर नाकेबंदी कर दी गई है। पुलिस सीसीटीवी फुटेज भी खंगाल रही है ताकि यह पता चल सके कि अपराधी किस रास्ते से भागे हैं। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह एक जघन्य अपराध है और दोषियों को जल्द से जल्द सलाखों के पीछे पहुँचाया जाएगा।
पड़ुरी गांव में मातम और दहशत का माहौल
बैजनाथ सिंह की हत्या के बाद पड़ुरी गांव में चूल्हा तक नहीं जला है। ग्रामीण इस बात से डरे हुए हैं कि अगर सगे रिश्तेदार ही इस तरह दिनदहाड़े गोलीबारी कर सकते हैं, तो आम आदमी की सुरक्षा का क्या होगा? गांव के चौक-चौराहों पर केवल इसी हत्याकांड की चर्चा है। लोगों में इस बात को लेकर भी आक्रोश है कि अपराधी इतने बेखौफ कैसे हो गए कि मुख्य सड़क पर, जहाँ हमेशा पुलिस की मौजूदगी की बात कही जाती है, वहां उन्होंने इतनी बड़ी वारदात को अंजाम दे दिया।
मृतक बैजनाथ सिंह के घर पर सांत्वना देने वालों का ताँता लगा है, लेकिन उनके बेटे सतीश की आँखों में पिता को खोने के गम के साथ-साथ हमलावरों के प्रति गहरा गुस्सा भी साफ देखा जा सकता है। सतीश का कहना है कि उसने अपनी आँखों से अपने चचेरे भाइयों (भांजों) को पिता पर गोली चलाते देखा है और वह तब तक चैन से नहीं बैठेगा जब तक उन्हें कड़ी से कड़ी सजा नहीं मिल जाती।
निष्कर्ष: सुशासन और सामाजिक पतन पर खड़े होते सवाल
रोहतास की यह घटना केवल एक हत्या का मामला नहीं है, बल्कि यह हमारे सामाजिक ताने-बाने के टूटने का संकेत है। जब रिश्तों की ऊष्मा खत्म हो जाती है और स्वार्थ की आग धधकने लगती है, तो ऐसे ही परिणाम सामने आते हैं। नासरीगंज की सड़कों पर बिखरा बैजनाथ सिंह का खून व्यवस्था से न्याय की गुहार लगा रहा है। अब गेंद पुलिस के पाले में है कि वह कितनी जल्दी गोपाल और रंजीत को कानून के शिकंजे में कसती है।
’द वॉयस ऑफ बिहार’ की टीम इस दुखद घड़ी में पीड़ित परिवार के साथ खड़ी है और यह अपील करती है कि समाज में बढ़ती इस हिंसक प्रवृत्ति पर लगाम कसने के लिए न केवल प्रशासन, बल्कि नागरिकों को भी अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझनी होगी। क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ ‘रिश्ते’ केवल औपचारिक रह गए हैं और ‘प्रतिशोध’ ही जीवन का एकमात्र सत्य बन गया है? इस सवाल का जवाब हमें अपने भीतर तलाशना होगा।


