​एनएच-133 पर रफ्तार का तांडव: दो बाइकों की भीषण भिड़ंत में 5 लहूलुहान, साहेबगंज के युवक का जबड़ा उखड़ा, मायागंज रेफर

भागलपुर/पीरपैंती। भागलपुर जिले की सड़कें इन दिनों खून से लाल हो रही हैं और रफ्तार का जुनून मासूम जिंदगियों पर भारी पड़ रहा है। ताजा मामला पीरपैंती से बाराहाट जाने वाली मुख्य सड़क एनएच-133 का है, जहां शुक्रवार को मौत की रफ्तार ने दो परिवारों की खुशियां छीनने की कोशिश की। ओवरब्रिज के समीप दो मोटरसाइकिलों के बीच हुई आमने-सामने की जोरदार टक्कर ने न केवल पांच लोगों को घायल कर दिया, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था के तमाम दावों को भी हवा में उड़ा दिया। 3 अप्रैल 2026 की यह दोपहर एनएच-133 पर चीख-पुकार और अफरा-तफरी की गवाह बनी, जहां मानवता और प्रशासनिक लापरवाही के दो अलग-अलग चेहरे एक साथ देखने को मिले।

हादसे का खौफनाक मंजर: जब सन्नाटे को चीर गई टक्कर की आवाज

​घटना के समय एनएच-133 पर यातायात सामान्य था, लेकिन ओवरब्रिज के पास पहुंचते ही दो बाइकों की गति ने मौत का खेल खेल दिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दोनों तरफ से आ रही मोटरसाइकिलें इतनी तेज रफ्तार में थीं कि मोड़ पर चालकों को संभलने का मौका ही नहीं मिला। टक्कर इतनी भीषण थी कि उसकी आवाज करीब आधा किलोमीटर दूर तक सुनी गई। भिड़ंत होते ही दोनों बाइकों के परखच्चे उड़ गए और उस पर सवार पांचों लोग सड़क पर दूर तक घिसटते चले गए।

​सड़क पर गिरे घायलों की तड़प देखकर वहां मौजूद राहगीरों का कलेजा कांप गया। लोहे और मांस की उस भिड़ंत में सड़क पर खून पसर गया। हादसे के तुरंत बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई और आने-जाने वाले वाहनों के पहिए थम गए। स्थानीय लोगों ने बताया कि अगर बाइकों की रफ्तार थोड़ी भी कम होती, तो शायद चोट इतनी गंभीर नहीं लगती। यह हादसा फिर से यह साबित करता है कि हाईवे पर ‘स्पीड’ ही सबसे बड़ा कातिल है।

घायलों की स्थिति: पूरन रविदास की हालत नाजुक

​इस दुर्घटना में साहेबगंज जिले के सकरीगली निवासी उमेश रविदास का पुत्र पूरन रविदास सबसे अधिक चोटिल हुआ है। पूरन रविदास अपनी पत्नी के साथ बाइक पर सवार था। टक्कर के दौरान वह सीधे जमीन पर मुंह के बल गिरा, जिससे उसका निचला जबड़ा पूरी तरह उखड़ गया। अत्यधिक रक्तस्राव और चेहरे की गंभीर हड्डी टूटने के कारण उसकी स्थिति नाजुक बनी हुई है। उसके पीछे बैठी उसकी पत्नी को भी चोटें आई हैं, हालांकि वह खतरे से बाहर बताई जा रही है, लेकिन अपने पति की हालत देखकर वह सदमे में है।

​अन्य घायलों की पहचान मोहम्मद जहांगीर, मुन्ना मंडल और सुदामा मंडल के रूप में हुई है। इन तीनों को भी शरीर के अलग-अलग हिस्सों में चोटें आई हैं। खुशनसीबी यह रही कि इन लोगों ने हेलमेट पहना था या गिरने का तरीका ऐसा था कि सिर पर सीधी चोट नहीं लगी, जिससे इनकी जान बच गई। हालांकि, पूरन रविदास के लिए आने वाले कुछ घंटे काफी चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं।

रेफरल अस्पताल से मायागंज तक की जद्दोजहद

​हादसे के बाद स्थानीय ग्रामीणों और राहगीरों ने जो सक्रियता दिखाई, वह काबिल-ए-तारीफ है। एम्बुलेंस का इंतजार करने के बजाय लोगों ने निजी वाहनों और ई-रिक्शा की मदद से सभी पांचों घायलों को तुरंत पीरपैंती रेफरल अस्पताल पहुंचाया। अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में प्राथमिक उपचार शुरू किया गया, लेकिन पूरन रविदास की स्थिति को देखकर वहां के चिकित्सक भी सकते में आ गए।

​जबड़े की गंभीर चोट और सांस लेने में आ रही तकलीफ को देखते हुए डॉक्टरों ने उसे प्राथमिक उपचार (First Aid) देने के बाद तुरंत बेहतर इलाज के लिए जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय अस्पताल (मायागंज), भागलपुर रेफर कर दिया। मायागंज अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम पूरन के चेहरे की सर्जरी और उसे स्थिर करने की कोशिश कर रही है। वहीं, मोहम्मद जहांगीर, मुन्ना मंडल और सुदामा मंडल को प्राथमिक पट्टी और दवाइयों के बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है, लेकिन वे अभी भी शारीरिक दर्द और मानसिक खौफ से उबर नहीं पाए हैं।

एनएच-133: मौत का गलियारा बनता जा रहा है यह मार्ग (विशेष विश्लेषण)

​भागलपुर से पीरपैंती और बाराहाट को जोड़ने वाला यह मार्ग सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन पिछले कुछ महीनों में इस मार्ग पर दुर्घटनाओं के आंकड़ों ने सबको डरा दिया है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ की पड़ताल के अनुसार, एनएच-133 पर हादसों के पीछे तीन मुख्य कारण हैं:

  1. अनियंत्रित रफ्तार और ओवरटेक: हाईवे खाली मिलने पर बाइकर्स अपनी गति 80 से 100 किलोमीटर प्रति घंटा तक ले जाते हैं। ओवरब्रिज के पास तीखे मोड़ और ढलान होने के कारण संतुलन बनाना मुश्किल हो जाता है।
  2. सड़क सुरक्षा मानकों की अनदेखी: पीरपैंती ओवरब्रिज के समीप न तो पर्याप्त साइन बोर्ड लगे हैं और न ही वहां कोई स्पीड ब्रेकर (Rumblers) दिया गया है। रात के समय वहां रोशनी की व्यवस्था भी अपर्याप्त है, जिससे चालक अक्सर भ्रमित हो जाते हैं।
  3. प्रशासनिक उदासीनता: एनएच पर गश्त करने वाली पुलिस का ध्यान अक्सर ट्रकों की जांच पर होता है, जबकि बाइक सवारों की रेंडम चेकिंग और गति सीमा का उल्लंघन करने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं होती।

स्थानीय लोगों का आक्रोश और प्रशासन से मांग

​हादसे के बाद पीरपैंती के स्थानीय निवासियों में गहरा रोष देखा जा रहा है। लोगों का कहना है कि उन्होंने कई बार प्रशासन से लिखित शिकायत की है कि इस विशेष मोड़ और ओवरब्रिज के पास सुरक्षा के इंतजाम किए जाएं। ग्रामीणों ने मांग की है कि यहां एक स्थायी पुलिस चेकपोस्ट या कम से कम गति अवरोधक (Speed Breakers) बनाए जाएं ताकि तेज रफ्तार वाहनों पर लगाम लग सके।

​ग्रामीणों का तर्क है कि पीरपैंती रेफरल अस्पताल में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। अगर कोई बड़ा हादसा होता है, तो मरीजों को मायागंज भेजने में लगने वाला समय (जो कि करीब 2 से 3 घंटे है) जानलेवा साबित हो सकता है। सरकार को चाहिए कि इस अस्पताल में कम से कम एक ट्रौमा सेंटर की व्यवस्था की जाए ताकि गंभीर घायलों को प्रारंभिक घंटों (Golden Hour) में ही सटीक इलाज मिल सके।

संतुलित नजरिया: चालक की जिम्मेदारी भी है महत्वपूर्ण

​हादसे के लिए केवल प्रशासन या सड़क को दोष देना पर्याप्त नहीं है। इस घटना में शामिल दोनों बाइकों की रफ्तार का तेज होना यह बताता है कि नागरिक स्वयं भी अपनी सुरक्षा को लेकर गंभीर नहीं हैं। एनएच-133 जैसे व्यस्त मार्ग पर बिना सोचे-समझे ओवरटेक करना और गति सीमा का उल्लंघन करना मौत को दावत देने जैसा है। पूरन रविदास के परिवार पर जो विपत्ति आई है, वह समाज के लिए एक सबक है कि घर से निकलते समय सुरक्षा उपकरणों और संयमित गति का ध्यान रखना कितना अनिवार्य है।

निष्कर्ष: समाधान की दिशा में बढ़ना होगा

​एनएच-133 पर हुआ यह हादसा भागलपुर जिला प्रशासन और सड़क परिवहन विभाग के लिए एक और चेतावनी है। पीरपैंती ओवरब्रिज के पास हुए इस खूनी खेल ने 5 लोगों को शारीरिक और मानसिक चोटें दी हैं। पूरन रविदास का जीवन अब डॉक्टरों के हाथ में है, लेकिन भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने की जिम्मेदारी शासन के हाथ में है।

द वॉयस ऑफ बिहार की टीम घायलों के जल्द स्वस्थ होने की कामना करती है और प्रशासन से अपील करती है कि वे केवल कागजी औपचारिकताओं तक सीमित न रहें, बल्कि धरातल पर सुरक्षा मानकों को दुरुस्त करें। सड़कों को सुरक्षित बनाने के लिए कड़े कानून और उनकी ईमानदारी से पालना ही एकमात्र समाधान है। जब तक रफ्तार पर लगाम नहीं लगेगी, तब तक भागलपुर की सड़कें इसी तरह मासूमों के खून से रंगती रहेंगी।

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