रेलवे ट्रैक बना बेज़ुबान मवेशियों का ‘डेथ ज़ोन’! 85 दिनों में 72 जानवरों की कटकर मौत; भागलपुर-बांका और किउल रूट सबसे संवेदनशील, ट्रेनों की रफ्तार पर भी लगा ब्रेक

समाचार के मुख्य बिंदु: रेल पटरियों पर ‘मौत का चारा’ और ग्रामीणों की लापरवाही

  • विचलित करने वाले आंकड़े: पूर्वी रेलवे (ER) के अधिकार क्षेत्र में 1 जनवरी 2026 से 25 मार्च 2026 के बीच मवेशियों के ट्रेन से कटने (Cattle Run-over) की कुल 72 घटनाएं दर्ज की गई हैं।
  • संवेदनशील हॉटस्पॉट्स: भागलपुर-बांका, किउल-भागलपुर, साहिबगंज-बरहरवा और देवघर-बांका जैसे रूट मवेशियों के लिए सबसे खतरनाक साबित हो रहे हैं।
  • ट्रेनों पर असर: मवेशियों के टकराने से न केवल निर्दोष जीवों की जान जा रही है, बल्कि इंजनों में तकनीकी खराबी और ट्रेनों के परिचालन में घंटों की देरी हो रही है।
  • रेलवे की अपील: पूर्वी रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी श्री शिबराम मांझी ने ग्रामीणों से अपने मवेशियों को ट्रैक से दूर रखने और ‘जिम्मेदार पशुपालन’ की अपील की है।
  • अवरोध बनाम जागरूकता: रेलवे पटरियों के किनारे बैरियर (अवरोध) तो लगा रहा है, लेकिन जब तक स्थानीय लोग जागरूक नहीं होंगे, तब तक इन हादसों को रोकना नामुमकिन है।
  • VOB इनसाइट: पटरियों के बीच उगे ‘ताज़ा चारे’ का मोह मवेशियों को खींच लाता है और पशुपालकों की ढिलाई इस मोह को मौत में बदल देती है। यह केवल पशुधन की हानि नहीं, बल्कि रेल यात्रियों की सुरक्षा के साथ भी खिलवाड़ है।

कोलकाता | 28 मार्च, 2026

​”आईना, ओ आईना! अब मुझे बताओ—लोग यह कसम क्यों नहीं खाते कि वे अपने मवेशियों को रेलवे लाइन पर नहीं चरने देंगे?” यह सवाल आज पूर्वी रेलवे के हर उस ड्राइवर और रेल अधिकारी के मन में है, जो पटरियों पर बेज़ुबान जानवरों के खून के धब्बे देखता है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, पूर्वी रेलवे में मवेशियों के कटने की घटनाओं ने इस साल सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं, जिससे रेल परिचालन और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

85 दिन और 72 मौतें: पटरियों पर बिछा मौत का जाल

​पूर्वी रेलवे द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, साल के शुरुआती तीन महीनों (25 मार्च तक) में ही 72 मवेशी ट्रेनों की चपेट में आकर अपनी जान गंवा चुके हैं। यह आंकड़ा यह बताने के लिए काफी है कि रेलवे ट्रैक अब केवल ट्रेनों के लिए नहीं, बल्कि चरगाहा के रूप में भी इस्तेमाल हो रहे हैं।

हादसों के पीछे का ‘स्वाद’ और ‘अज्ञानता’:

रेलवे ट्रैक पर बिछी गिट्टियों (Ballast) के बीच अक्सर दुर्लभ पौधों के बीज प्राकृतिक रूप से उग आते हैं। इन पौधों का ताज़ा स्वाद मवेशियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। पशुपालक चारे की तलाश में अपने मवेशियों को खुला छोड़ देते हैं, जो सीधे ट्रैक पर पहुँच जाते हैं। चूँकि बेज़ुबान जानवरों को ‘ट्रेन की गति’ और ‘रेलवे ट्रैक के अधिकार’ का ज्ञान नहीं होता, वे अक्सर काल के गाल में समा जाते हैं।

बिहार और बंगाल के ये रूट हैं ‘सबसे खतरनाक’

​पूर्वी रेलवे ने उन रेल खंडों की पहचान की है जहाँ मवेशियों के कटने की घटनाएं बार-बार रिकॉर्ड की गई हैं। इनमें से अधिकांश रूट बिहार के भागलपुर और आसपास के क्षेत्रों से जुड़े हैं:

  • भागलपुर-बांका और किउल-भागलपुर: इन रूट्स पर मवेशियों की आवाजाही सबसे अधिक दर्ज की गई है।
  • साहिबगंज-बरहरवा: गंगा तटीय इलाकों के पास चारे की तलाश में मवेशी ट्रैक पर आ जाते हैं।
  • देवघर-बांका और सैंथिया-नलहाटी: यहाँ ग्रामीण आबादी का ट्रैक के करीब होना मुख्य कारण है।
  • सीतारामपुर-मधुपुर और अंडाल-आसनसोल: औद्योगिक और ग्रामीण मिश्रित क्षेत्रों में भी घटनाएं बढ़ी हैं।

रेलवे की कार्रवाई: बैरियर से ज्यादा ‘जागरूकता’ पर जोर

​पूर्वी रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी (CPRO) श्री शिबराम मांझी ने इस गंभीर विषय पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि रेलवे अपनी ओर से पटरियों के किनारे ‘फेंसिंग’ और ‘बैरियर’ लगाने का काम कर रहा है। लेकिन, ये भौतिक अवरोध तब तक सफल नहीं होंगे जब तक स्थानीय ग्रामीण अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे।

CPRO की अपील के मुख्य बिंदु:

  1. पशुधन की सुरक्षा: एक मवेशी की मौत पशुपालक के लिए बड़ी आर्थिक हानि है। इसे बचाने के लिए मवेशियों को खूंटे से बांधकर रखें।
  2. ट्रेन परिचालन: मवेशी के टकराने से इंजन का ‘कैटल गार्ड’ मुड़ जाता है या ब्रेक पाइप फट जाता है, जिससे ट्रेन घंटों खड़ी रहती है और हजारों यात्रियों को परेशानी होती है।
  3. कानूनी अतिक्रमण: रेलवे ट्रैक पर मवेशी चराना कानूनी रूप से अतिक्रमण की श्रेणी में आता है, जिस पर दंडात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है।

VOB का नजरिया: सुशासन और नागरिक जिम्मेदारी

​’द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) का मानना है कि रेलवे की पटरियां ‘पब्लिक प्रॉपर्टी’ हैं, ‘पर्सनल चारागाह’ नहीं।

  • पंचायतों की भूमिका: स्थानीय ग्राम पंचायतों को इस दिशा में पहल करनी चाहिए। पशुपालकों को जागरूक करने के लिए गांव-गांव में मुनादी कराई जानी चाहिए।
  • पशु क्रूरता: मवेशियों को ट्रैक पर खुला छोड़ना एक तरह से उन्हें मौत के मुंह में धकेलना है, जो पशु क्रूरता के अंतर्गत आता है।
  • मुआवजा और दंड: रेलवे को ऐसे मामलों में सख्त रुख अपनाना चाहिए। जहाँ मवेशी के कारण ट्रेन को नुकसान हो, वहां मालिक की पहचान कर उन पर जुर्माना लगाना चाहिए ताकि एक उदाहरण पेश हो सके।

सुरक्षा आपकी, जिम्मेदारी सबकी

​ट्रेन की रफ्तार और मवेशियों की जान, दोनों ही कीमती हैं। पूर्वी रेलवे के ये आंकड़े एक चेतावनी हैं कि यदि हम आज नहीं चेते, तो पटरियों पर होने वाले ये हादसे किसी बड़ी रेल दुर्घटना का सबब बन सकते हैं। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) रेलवे द्वारा चलाए जा रहे नए जागरूकता अभियानों, चिन्हित हॉटस्पॉट्स पर लगने वाले नए बैरियर्स और रेल प्रशासन की अगली सख्त कार्रवाई की हर ताज़ा अपडेट आप तक सबसे पहले पहुँचाता रहेगा।

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