पूर्णिया में ‘कमीशनखोरी’ के किला पर निगरानी का प्रहार: ट्रांसफर के बाद भी ‘वसूली’ के लिए पुराने ठिकाने पर डटा था सहायक अभियंता, घूस लेते रंगे हाथ गिरफ्तार

पूर्णिया। भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी और बेशर्म हो सकती हैं, इसका एक ज्वलंत उदाहरण आज सीमांचल के हृदय कहे जाने वाले पूर्णिया जिले में देखने को मिला। बिहार में एक ओर जहाँ प्रशासन की कार्यशैली को ‘जीरो टॉलरेंस’ के सांचे में ढालने की बात कही जा रही है, वहीं शिक्षा विभाग के कुछ अधिकारी भ्रष्टाचार की ऐसी लत पाल चुके हैं कि तबादला हो जाने के बाद भी वे ‘मलाई’ के चक्कर में पुराने ठिकानों को छोड़ने को तैयार नहीं हैं। गुरुवार को पटना से पहुँची निगरानी विभाग (विजिलेंस) की टीम ने एक बड़ी कार्रवाई को अंजाम देते हुए शिक्षा विभाग के सहायक अभियंता भूषण प्रसाद को 10,000 रुपये घूस लेते रंगे हाथ धर दबोचा। इस गिरफ्तारी ने विभाग के भीतर व्याप्त उस ‘प्रतिशत तंत्र’ (कमीशनखोरी) को बेनकाब कर दिया है, जहाँ बिना रिश्वत के विकास योजनाओं की फाइलें रेंगना भी बंद कर देती हैं। निगरानी की इस ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ ने जिले के अन्य रिश्वतखोर अधिकारियों के बीच हड़कंप मचा दिया है। पकड़ा गया सहायक अभियंता न केवल मौके पर घूस लेते पाया गया, बल्कि उसके पास से अतिरिक्त नकदी की बरामदगी ने मामले को और भी संगीन बना दिया है।

6 प्रतिशत का ‘अवैध टैक्स’: एमबी के नाम पर संवेदक की घेराबंदी

​भ्रष्टाचार की इस पूरी पटकथा की शुरुआत सरकारी योजनाओं के ‘मापन पुस्तिका’ यानी मेजरमेंट बुक (MB) से जुड़ी हुई है। सरकारी निर्माण कार्यों में एमबी वह महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है जिसके आधार पर संवेदक (ठेकेदार) के बिलों का भुगतान किया जाता है। सहायक अभियंता भूषण प्रसाद ने इसी एमबी को अपनी अवैध कमाई का हथियार बना लिया था। निगरानी विभाग के अनुसार, भूषण प्रसाद ने एक योजना के एमबी पर हस्ताक्षर करने और उसे आगे बढ़ाने के बदले संवेदक से योजना की कुल राशि का 6 प्रतिशत हिस्सा बतौर घूस मांगा था।

​यह केवल एक मांग नहीं थी, बल्कि एक निरंतर जारी रहने वाला शोषण था। पीड़ित संवेदक ने बताया कि भूषण प्रसाद पहले भी इसी योजना के एवज में दो बार अवैध वसूली कर चुका था। पहली बार उसने 16,000 रुपये और दूसरी बार 6,000 रुपये की राशि डकार ली थी। जब उसकी भूख यहीं शांत नहीं हुई और उसने तीसरी किस्त के रूप में फिर से 10,000 रुपये की मांग दोहराई, तब संवेदक ने इस अपमानजनक व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने का निर्णय लिया और पटना स्थित निगरानी अन्वेषण ब्यूरो के मुख्यालय में जाकर गुहार लगाई।

तबादला भी नहीं तोड़ सका ‘रिश्वत का मोह’

​इस मामले का सबसे हैरान करने वाला और विडंबनापूर्ण पहलू यह है कि भूषण प्रसाद का तबादला पूर्णिया से कटिहार जिले के लिए हो चुका था। प्रशासनिक नियमों के अनुसार, तबादला होने के बाद अधिकारी को अपने नए पदस्थापना स्थल पर योगदान देना चाहिए और पुराने क्षेत्र की फाइलों से दूर रहना चाहिए। लेकिन भूषण प्रसाद के मन में रिश्वत का मोह इस कदर हावी था कि वह कागजों पर कटिहार स्थानांतरित होने के बावजूद बार-बार पूर्णिया आ रहा था।

​उसका पूर्णिया आना किसी विभागीय काम के लिए नहीं, बल्कि उन ‘पुराने लेन-देन’ को पूरा करने के लिए था जो तबादले के कारण बीच में रह गए थे। निगरानी डीएसपी राजकुमार सिंह ने बताया कि वह कटिहार में पदस्थापित होने के बाद भी पूर्णिया में संवेदक से पैसे लेने पहुँचा था। यह इस बात का प्रमाण है कि कुछ अधिकारियों के लिए सरकारी पद केवल सेवा का माध्यम नहीं, बल्कि अवैध धन उगाही का एक लाइसेंस बन चुका है। पूर्णिया की सड़कों पर आज निगरानी टीम ने जब उसे पकड़ा, तो उसकी घबराहट ने ही उसकी संलिप्तता की गवाही दे दी।

धावा दल की कार्रवाई: रंगे हाथ गिरफ्तारी और 54 हजार का ‘बोनस’

​संवेदक की शिकायत मिलने के बाद निगरानी विभाग ने मामले का गुप्त सत्यापन कराया। जब यह पुष्टि हो गई कि घूस की मांग वास्तव में की गई है, तो पटना से एक विशेष ‘धावा दल’ को पूर्णिया भेजा गया। निगरानी डीएसपी राजकुमार सिंह के नेतृत्व में टीम ने बिछाई गई बिसात के अनुसार संवेदक को रसायन लगे हुए (फेनोल्फ्थेलिन पाउडर) 10,000 रुपये के नोट दिए।

​जैसे ही भूषण प्रसाद ने संवेदक से वे नोट थामे और अपनी जेब के हवाले किए, पहले से घात लगाकर बैठी निगरानी टीम ने उसे चारों तरफ से घेर लिया। उसके हाथ धुलवाए गए तो वे गुलाबी हो गए, जो इस बात का वैज्ञानिक प्रमाण था कि उसने रिश्वत के नोट छुए हैं। इसके बाद जब उसकी तलाशी ली गई, तो पुलिस के हाथ एक और बड़ी कामयाबी लगी। घूस के 10,000 रुपये के अलावा भूषण प्रसाद के पास से 54,000 रुपये अतिरिक्त बरामद हुए। इस बड़ी नकदी का वह कोई संतोषजनक हिसाब नहीं दे पाया। आशंका जताई जा रही है कि यह राशि भी किसी अन्य संवेदक से वसूली गई ‘कमीशन’ का हिस्सा हो सकती है।

बाढ़ से पूर्णिया तक का दागी सफर: कानून का बढ़ता शिकंजा

​गिरफ्तार सहायक अभियंता भूषण प्रसाद मूल रूप से पटना जिले के बाढ़ का निवासी है। उसकी इस गिरफ्तारी के बाद अब निगरानी विभाग उसके पैतृक आवास और वर्तमान ठिकानों पर भी छापेमारी की तैयारी कर रहा है। पुलिस यह जानना चाहती है कि अपनी सेवा अवधि के दौरान उसने अब तक कितनी बेनामी संपत्ति अर्जित की है। निगरानी डीएसपी राजकुमार सिंह ने स्पष्ट किया कि पटना स्थित निगरानी थाना में इस संबंध में पहले ही प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जा चुकी थी।

​आज की सफल कार्रवाई के बाद अब भूषण प्रसाद को विशेष निगरानी अदालत में पेश करने की तैयारी की जा रही है। भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत उस पर कानूनी शिकंजा कस दिया गया है। निगरानी विभाग का मानना है कि भूषण प्रसाद की गिरफ्तारी से शिक्षा विभाग के भीतर चल रहे अन्य सिंडिकेट्स का भी खुलासा हो सकता है। यह कार्रवाई उन संवेदकों के लिए एक बड़ी राहत है जो सरकारी विभागों में व्याप्त बाबूगिरी और अफसरशाही के जाल में फंसकर अपना काम नहीं करवा पाते।

शिक्षा विभाग की साख पर बट्टा और व्यवस्था की चुनौतियां

​शिक्षा विभाग, जिसका मुख्य कार्य समाज को रोशनी दिखाना है, उसके भीतर ऐसे अधिकारियों की मौजूदगी विभाग की साख को धूमिल करती है। भवनों के निर्माण और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए आने वाला पैसा जब 6 प्रतिशत के ‘अवैध टैक्स’ की भेंट चढ़ जाता है, तो निर्माण की गुणवत्ता पर भी इसका सीधा असर पड़ता है। जब संवेदक को रिश्वत देनी पड़ती है, तो वह उसकी भरपाई घटिया सामग्री का उपयोग करके करता है।

​पूर्णिया में हुई यह गिरफ्तारी इसी सड़े-गले तंत्र को साफ करने की एक कोशिश है। स्थानीय लोगों और प्रबुद्ध नागरिकों ने निगरानी विभाग की इस मुस्तैदी की सराहना की है। लोगों का कहना है कि भ्रष्टाचार के इस कैंसर को जड़ से मिटाने के लिए ऐसे ही ‘सख्त और रंगे हाथ’ पकड़ने वाले ऑपरेशनों की जरूरत है। हालांकि, सवाल यह भी उठता है कि क्या केवल एक अधिकारी की गिरफ्तारी से यह तंत्र सुधर जाएगा? इसके लिए विभाग के भीतर पारदर्शिता और जवाबदेही की एक नई संस्कृति विकसित करनी होगी।

निगरानी विभाग की चेतावनी: नहीं बचेंगे भ्रष्टाचार के सौदागर

​पटना निगरानी डीएसपी राजकुमार सिंह ने इस कार्रवाई के बाद एक कड़ा संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि विभाग भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरी तरह सतर्क है और किसी भी लोक सेवक को कानून से ऊपर नहीं रहने दिया जाएगा। उन्होंने आम जनता और संवेदकों से अपील की कि अगर कोई भी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी काम के बदले पैसे मांगता है, तो वे डरे नहीं बल्कि तुरंत निगरानी विभाग को सूचित करें।

​भूषण प्रसाद की गिरफ्तारी केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं है, बल्कि यह उन तमाम लोगों के लिए एक चेतावनी है जो सरकारी कुर्सी को निजी संपत्ति समझने की भूल कर रहे हैं। पूर्णिया से लेकर पटना तक इस केस की फाइल अब तेजी से बढ़ेगी। आने वाले दिनों में भूषण प्रसाद के मोबाइल रिकॉर्ड्स और अन्य संपर्कों को खंगाला जाएगा ताकि यह पता चल सके कि इस ‘वसूली’ के पैसे का हिस्सा ऊपर के किन अधिकारियों तक पहुँचता था। सीमांचल की धरती पर आज की यह शाम ईमानदारी की एक छोटी सी जीत और भ्रष्टाचार के एक बड़े अध्याय के अंत की गवाह बनी है।

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