
अमौर (पूर्णिया)। बिहार के पूर्णिया जिले से रिश्तों को कलंकित करने वाली और सामाजिक कुरीतियों की एक भयावह तस्वीर सामने आई है। अमौर प्रखंड के बालूगंज इलाके में एक 24 वर्षीय विवाहिता ने दहेज की अंतहीन मांग और ससुराल पक्ष के मानसिक उत्पीड़न से तंग आकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। मृतका की पहचान सुलोचना कुमारी के रूप में हुई है, जो दो मासूम बच्चियों की माँ थी। सुलोचना ने अपने मायके में घर के धरन से दुपट्टे का फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली। इस घटना के बाद से ही पूरे इलाके में मातम पसरा हुआ है और लोग इस बात से मर्माहत हैं कि कैसे दो छोटी बच्चियों के सिर से माँ का साया हमेशा के लिए उठ गया। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और मामले की छानबीन में जुट गई है।
शादी के बाद ही शुरू हो गया था प्रताड़ना का सिलसिला
जानकारी के अनुसार, सुलोचना कुमारी की शादी वर्ष 2020 में बागढर के रहने वाले सुजीत कुमार के साथ हुई थी। परिजनों का आरोप है कि निकाह के कुछ समय बाद ही सुलोचना के ससुराल वालों का असली चेहरा सामने आने लगा। मृतका की माँ चिमनी देवी ने रुंधे गले से बताया कि शादी के समय अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-दहेज दिया गया था, लेकिन सुजीत और उसके परिवार की लालच की भूख कभी कम नहीं हुई।
शादी के कुछ समय बाद ही सुलोचना से 3 लाख रुपये नगद लाने का दबाव बनाया जाने लगा। गरीब मायके वालों ने बेटी के सुखी संसार की खातिर किसी तरह जोड़-तोड़ कर डेढ़ लाख रुपये ससुराल वालों को दे भी दिए थे। लेकिन लालच की आग शांत नहीं हुई। बाकी बचे डेढ़ लाख रुपये के लिए सुलोचना को आए दिन शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था। उसे बात-बात पर ताने दिए जाते थे और अक्सर उसके साथ मारपीट की जाती थी।
मायके में रहने को मजबूर थी सुलोचना
ससुराल वालों की बर्बरता और लगातार बढ़ती मारपीट के कारण सुलोचना का जीना दूभर हो गया था। ससुराल में अपनी जान को खतरा महसूस करते हुए वह पिछले एक साल से अपने मायके बालूगंज में ही रह रही थी। परिजनों को उम्मीद थी कि समय बीतने के साथ सुजीत और उसके घर वालों के व्यवहार में बदलाव आएगा और वे अपनी बेटियों के भविष्य के बारे में सोचेंगे।
परन्तु, सुलोचना के मायके आने के बाद भी उसे फोन पर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता रहा। रुपये न मिलने की स्थिति में उसे गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियाँ दी जाती थीं। इस मानसिक दबाव और अपनी दो छोटी बच्चियों के अनिश्चित भविष्य की चिंता ने उसे भीतर से तोड़ दिया था। अंततः, निराशा के गहरे अंधेरे में डूबी सुलोचना ने शुक्रवार को वह आत्मघाती कदम उठा लिया जिसने एक बार फिर दहेज प्रथा के क्रूर चेहरे को समाज के सामने नंगा कर दिया।
दो मासूम बेटियों का क्या होगा कसूर?
इस पूरी त्रासदी में सबसे हृदयविदारक पहलू सुलोचना की वे दो मासूम बच्चियां हैं, जो अभी ठीक से यह भी नहीं समझतीं कि उनकी माँ अब कभी वापस नहीं लौटेगी। माँ की मौत के बाद बच्चियों का रो-रोकर बुरा हाल है। सुलोचना ने जिस समय फंदा लगाया, उस समय घर के अन्य सदस्य अपने कामों में व्यस्त थे। जब घर के लोग अंदर पहुँचे, तो सुलोचना का शव धरन से लटका देख चीख-पुकार मच गई।
ग्रामीणों का कहना है कि सुलोचना अपनी बेटियों के लिए जी रही थी, लेकिन ससुराल वालों के तानों और प्रताड़ना ने उसकी सहनशक्ति का अंत कर दिया। दहेज के लालच में एक माँ की बलि चढ़ा देने वाली इस घटना ने पूरे अमौर क्षेत्र को झकझोर दिया है।
अमौर पुलिस की कार्रवाई और परिजनों की मांग
घटना की सूचना मिलते ही अमौर थाना पुलिस दलबल के साथ मौके पर पहुँची। पुलिस ने घटनास्थल का मुआयना किया और सुलोचना के शव को फंदे से नीचे उतारकर कब्जे में ले लिया। कानूनी औपचारिकताओं के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए पूर्णिया राजकीय अस्पताल भेज दिया गया है।
मृतका की माँ चिमनी देवी और अन्य परिजनों ने पुलिस को दिए बयान में सुलोचना के पति सुजीत कुमार और उसके ससुराल पक्ष के अन्य सदस्यों को इस मौत का सीधा जिम्मेदार ठहराया है। परिजनों ने मांग की है कि दहेज प्रताड़ना के इन आरोपियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में किसी और की बेटी इस तरह दहेज की वेदी पर न चढ़ाई जाए।
दहेज प्रथा: समाज के माथे पर एक काला दाग
सुलोचना की यह संदिग्ध मौत केवल एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की उस सड़ी-गली मानसिकता का परिणाम है जहाँ बहू को घर की लक्ष्मी नहीं, बल्कि धन उगाही का जरिया माना जाता है। 2026 में भी दहेज के लिए एक 24 साल की युवती का आत्महत्या करने पर मजबूर होना यह बताता है कि हमारे कानून और जागरूकता अभियान अभी भी उन घरों की चहारदीवारी तक नहीं पहुँच पाए हैं जहाँ लालच का वास है।
पुलिस का पक्ष:
अमौर थानाध्यक्ष ने बताया कि परिजनों के आवेदन के आधार पर प्राथमिकी दर्ज करने की प्रक्रिया की जा रही है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद मौत के कारणों की और अधिक स्पष्टता होगी। पुलिस की टीमें आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी की योजना बना रही हैं।
अंततः, सुलोचना अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी मौत कई सवाल पीछे छोड़ गई है। क्या डेढ़ लाख रुपये की रकम दो जिंदगियों और दो बच्चियों के बचपन से ज्यादा कीमती थी? क्या सुजीत और उसके परिवार को कानून का कोई खौफ नहीं था? पूर्णिया की यह घटना सुशासन के दौर में उन महिलाओं की सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न है जो घर के भीतर ही तिल-तिल कर मरने को मजबूर हैं। अब सबकी नजरें पुलिस की जांच और न्यायालय के न्याय पर टिकी हैं।


