बिहार में लागू पूर्ण शराबबंदी कानून को दस साल पूरे होने के बाद अब इसकी प्रभावशीलता पर सवाल तेज हो गए हैं। विपक्ष के साथ-साथ अब सत्तारूढ़ दल के नेता भी सरकार से नीति की समीक्षा करने की मांग कर रहे हैं।
विनय बिहारी, जो लौरिया से बीजेपी विधायक हैं, ने बेतिया में बयान देते हुए कहा कि यदि शराबबंदी लागू है तो इसे पूरी सख्ती से लागू किया जाए, अन्यथा सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। उन्होंने भोजपुरी में तंज कसते हुए कहा, “जब शराब मिलता तबे ना लोगवा हिलता, शराब ना मिली तो लोगवा ना हिली।”
“बंदी का मतलब बंदी होना चाहिए”
विनय बिहारी ने आरोप लगाया कि प्रतिबंध के बावजूद अवैध शराब की बिक्री जारी है। उन्होंने कहा कि किसी भी बारात में जाने पर आधे से अधिक लोग शराब का सेवन करते मिल जाते हैं। उनका कहना था कि जब तक अवैध आपूर्ति पर रोक नहीं लगेगी, तब तक कानून का उद्देश्य पूरा नहीं होगा।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि लोग जेल जाने के बाद भी नहीं सुधर रहे हैं, तो सरकार को नीति की व्यवहारिकता पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
सहयोगी दलों ने भी उठाए सवाल
शराब नीति की समीक्षा की मांग केवल बीजेपी विधायक तक सीमित नहीं है। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के विधायक माधव आनंद ने भी शराबबंदी पर पुनर्विचार की बात कही है। मांझी ने कहा था कि प्रतिबंध के बावजूद पड़ोसी राज्यों से महंगी शराब की होम डिलीवरी हो रही है, जिससे राज्य को वित्तीय नुकसान हो रहा है।
उनका यह भी कहना था कि जहां संपन्न लोग महंगी शराब खरीद पा रहे हैं, वहीं गरीब वर्ग जहरीली शराब पीने को मजबूर हो जाता है, जिसका असर विशेष रूप से दलित समुदाय पर पड़ता है।
सरकार के सामने चुनौती
बिहार में पूर्ण शराबबंदी की शुरुआत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में हुई थी। अब जब सत्तापक्ष के भीतर से ही समीक्षा की आवाज उठने लगी है, तो राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार शराबबंदी कानून में सख्ती बढ़ाती है या व्यापक समीक्षा के बाद कोई बड़ा निर्णय लेती है। फिलहाल, शराब नीति को लेकर बिहार की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है।


